Thursday, September 16, 2021

1950-60 के दशक में भारतीय समाजशास्त्रियों का मुख्य केंद्रबिंदु विलेज इडिया था

 

1950-60 के दशक में भारतीय समाजशास्त्रियों का मुख्य केंद्रबिंदु विलेज इडिया था

हम शुरुआत करते हैं कुछ सुझावों से जो प्रायः आप जैसे युवा विद्यार्थियों के सम्मुख रखे जाते हैं। एक सुझाव प्रायः दिया जाता है कि 'मेहनत से पढ़ाई करोगे तो जीवन में सफलता पाओगे।' दूसरा सुझाव यह होता है कि 'यदि आप इस विषय अथवा विषयों के समूह की पढ़ाई करेंगे तो भविष्य में अच्छी नौकरी मिलने की ज्यादा संभावना रहेगी।' तीसरा सुझाव इस प्रकार हो सकता है कि 'किसी लड़के के लिए यह विषय ज्यादा उपयुक्त नहीं दिखता' अथवा 'एक लड़की के तौर पर क्या आपके विषयों का चुनाव व्यावहारिक है?' चौथा सुझाव, 'आपके परिवार को आपकी नौकरी की शीघ्र आवश्कता है तो ऐसा व्यवसाय चुनें जिसमें बहुत ज्यादा समय लगता हो' अथवा 'आपको अपने पारिवारिक व्यवसाय में कार्य करना है तो आप इस विषय को पढ़ने की इच्छा क्यों रखते हैं?'

सुझावों का खंडन करता है? क्योंकि पहला सुझाव दर्शाता है कि यदि आप कठिन परिश्रम करेंगे, तो आप अच्छा कार्य करेंगे और अच्छी नौकरी पाएँगे। इसका दारोमदार स्वयं पर है। दूसरा सुझाव यह दर्शाता है कि आपके व्यक्तिगत प्रयास के अलावा नौकरी का एक बाज़ार है और वह बाज़ार यह निश्चित करता है कि किस विषय की पढ़ाई करने से नौकरी के अवसर ज्यादा हैं या कम है। तीसरा और चौथा सुझाव इस विषय को और भी जटिल बना देता है। यहाँ केवल हमारे व्यक्तिगत प्रयास और नौकरी का बाजार ही नहीं बल्कि लिंग, परिवार और सामाजिक परिवेश भी मायने रखते हैं। यद्यपि व्यक्तिगत प्रयासों का बहुत अधिक महत्त्व है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वे परिणाम को निश्चित करें। जैसाकि हम देखते हैं कुछ अन्य सामाजिक कारक भी हैं जो परिणाम को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हमने केवल 'नौकरी का बाज़ार', 'सामाजिकआर्थिक पृष्ठभूमि' एवं 'लिंग' का जिक्र किया है।

मोहनदास करमचंद गांधी ने 12 मार्च 1930 को  salt Satyagraha यानी कि नमक का कानून तोड़ा था।  ब्रिटिश सरकार ने भारत के लोगों को नमक बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया था, इसके कारण गांधी जी इसके खिलाफ  थे। नमक एक ऐसा पदार्थ है जो अमीर से लेकर गरीब के उपयोग में आता है। उस समय गरीब लोगों को कर ( tax ) के कारण अधिक नुकसान हुआ करता था। इसलिए गांधी जी ने निश्चय किया कि अब वह नमक के ऊपर का कानून तोड़ेंगे। महात्मा गांधी और उनके साथ 78 अनुयायियों  ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से था तट तक 390 किलोमीटर तक चल कर नमक का कानून तोड़ा था। यह salt Satyagraha के नाम से प्रसिद्ध हुआ था।

यात्रा के दौरान दिन भर  दिन लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी, 5 अप्रैल को जब गांधी जी दांडी पहुंचे तब हजारों लोगों की भीड़ के मुख्य बन चुके थे। सभी लोगों ने साथ मिलकर दूसरे दिन  सुबह के समय समुद्र के तट पर नमक बनाया और नमक का कानून तोड़ा था। साबरमती आश्रम से दांडी तक पहुंचने के लिए उन्हें लगभग 25 दिन लगे थे।

1930 के समय में महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार से स्वतंत्रता दिलाने के लिए आंदोलन शुरू किया था। यह आंदोलन स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सबसे बड़े जन आंदोलनों में से एक था। 1929 लाहौर में जब कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से पूर्ण स्वराज की मांग की थी तब ब्रिटिश सरकार ने उनकी मांगें स्वीकार नहीं की थी। इसी कारण से स्वाधीनता प्राप्ति के लिए महात्मा गांधी जी ने 12 मार्च 1930 को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जन आंदोलन की शुरुआत की थी। यह आंदोलन salt Satyagraha के नाम से प्रचलित हुआ।

यह आंदोलन का मुख्य उद्देश्य नमक का कानून तोड़ना था, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने भारतीय लोगों को नमक बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। नमक एक ऐसा पदार्थ है जो मनुष्य को भोजन के लिए बहुत ही अनिवार्य होता है। ब्रिटिश कानून ने इसके ऊपर कर लगाया तो गरीब लोगों को काफी ज्यादा नुकसान होता था। यहां से की शुरुआत हुई थी।

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