Saturday, September 11, 2021

सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति और विस्तरा की आलोचनात्मक


सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति 
और विस्तरा की आलोचनात्मक 

तुलनात्मक राजनीति राजनीति विज्ञान की एक शाखा एवं विधि है जो तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित है। तुलनात्मक राजनीति में दो या अधिक देशों की राजनीति की तुलना की जाती है या एक ही देश की अलग-अलग समय की राजनीति की तुलना की जाती है और देखा जाता है कि इनमें समानता क्या है और अन्तर क्या है।

 राजनीति विज्ञान में तुलनात्मक अध्ययन क्रान्तिकारी और नया नहीं है। राजनीति में प्रारम्भ से ही तुलनात्मक अध्ययन का प्रयोग किया जाता रहा है। सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति  और विस्तरा की आलोचनात्मकइसीलिए ब्लौंडेल ने कहा है कि "तुलनात्मक सरकारों का अध्ययन प्राचीनतम, अत्यन्त कठिन और अत्यधिक महत्वपूर्ण है सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति  और विस्तरा की आलोचनात्मकतथा शुरू से ही मनुष्य के ध्यान के आकर्षण का केन्द्र रहा है।" किन्तु तुलनात्मक राजनीतिक के व्यवस्थित अध्ययन का श्रेय अरस्तू को है। अरस्तू ने ही सबसे पहले तत्कालीन राजनीतिक की व्यवस्थाओं में उपस्थित निरंकुश तंत्रों, श्रेणी तंत्रों और प्रजातंत्र की विशेषताओं और अन्तरों का तुलनात्मक दृष्टि से विशद् विवेचन किया था। सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति  और विस्तरा की आलोचनात्मकअरस्तू से लेकर आधुनिक राजनीतिशास्त्र के विद्वानों तक ने राजनीतिक व्यवहार को समझने के लिए राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन, विश्लेषण और वर्गीकरण किया है और नयेनये शोध उपकरणो के माध्यम से नये दृष्टिकोणों की व्याख्या की है।

राजनीति और शासन के तुलनात्मक अध्ययन की परम्परा हम अरस्तू और उसके पहले भी पाते हैं। बाद में मेकियावेलीमान्टेस्क्यूब्राइसलास्कीफाइनर आदि विचारकों ने इस पद्धति को अपनाया। सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति  और विस्तरा की आलोचनात्मक दूसरे महायुद्ध के पहले तक इसका विकास छोटे स्तर पर ही होता रहा। लेकिन, उसके बाद तुलनात्मक राजनीति के क्षेत्र में क्रान्तिकारी विकास हुए और इसे एक नये अनुशासन के रूप में विकसित किया जाने लगा। आज सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से राजनीतिशास्त्र का यह एक महत्वपूर्ण अंग बन गया है और इसके अन्तर्गत अनेकों सिद्धांतों अवधारणाओं को जन्म दिया गया है।

पुराने विचारों मे अरस्तू पहला राजनीतिक दार्शनिक था जिसने राजनीति को विज्ञान का दर्जा देना चाहा। उसने इस प्रकार की समस्याओं का चिन्तन तथा ऐसी विधियों का प्रयोग किया जो आज भी राजनीतिक के अध्ययन के क्षेत्र में बहुत कुछ मान्य है। सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति  और विस्तरा की आलोचनात्मकउसने 158 संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन कर वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया। अरस्तू ने ही पहली बार राजनीतिशास्त्र में आगमनात्मक पद्धति को अपनाया।

तुलनात्मक राजनीति के विकास का दूसरा चिन्ह मैकयावली और पुनर्जागरण के युग में मिलता है। राज्य की उत्पत्ति, राजनीतिक व्यवस्था शासन कला के विषय में निगमनात्मक पद्धति का परित्याग कर दिया गया तथा मैकयावली जैसे विचारकों ने वैज्ञानिक तटस्थता की नीति को अपनाते हुए उन दिनों की परिस्थितियों का गंभीरता से अध्ययन किया। सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति  और विस्तरा की आलोचनात्मक अपने युग की समस्याओं को समझा और फिर निष्कर्ष पर पहुंचे। इस तरह उन्होंने अपनी अध्ययन पद्धति मे अनुभववाद और इतिहास वाद का समन्वय किया। उसने राजनीति के अध्ययन में इतिहास और तर्क का सहारा लिया। मॉण्टेस्क्यू और इतिहासवादी युग के कुछ लेखकों में हम राजनीति के तुलनात्मक अध्ययन का उदय होते देखते है। हेरी एक्सटीन का तो निष्कर्ष है कि आधुनिक तुलनात्मक राजनीति से सम्बन्धित कोई भी पाठक सरलता से अनुमान लगा सकता है कि माण्टेस्क्यू द्वारा विचार किये गये विषय उसके अध्ययन क्षेत्र में आते है। सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति  और विस्तरा की आलोचनात्मकमॉण्टेस्क्यू के विचारों में राजनीतिशास्त्र का सम्पूर्ण मानवीय संबधों के साथ अध्ययन किया जाना चाहिए जिसमें धर्मशास्त्र, भूगोल, इतिहास, मनोविज्ञान, मानवशास्त्र आदि सभी विषय का अध्ययन शामिल है।

इतिहासवादी विचारकों के कई प्रमुख उदाहरण हमारे सामने हैं, जैसे विवेक और प्रजातन्त्र के साथसाथ विकास में विश्वास करने वाला काण्ट, विवेक और स्वतन्त्रता को बुनियादी मानते वाला हीगेल, वैज्ञानिक प्रवृति को बुनियादी मानने वाला काम्टे और वर्गसंघर्ष के माध्यम से स्वतंत्रता की प्राप्ति में विश्वास करने वाला मार्क्स। इन इतिहासवादियों की सबसे बडी देन यह थी कि उन्होंने सामाजिक गतिशीलता में, खास कर विकासवादी सिद्धान्त में, राजनीतिक इतिहासकारों की रूचि जाग्रत की, जिसके कारण राजनीति के विस्तृत सिद्धान्तों का जन्म हुआ। उन्होंने उन समस्याओं की ओर भी ध्यान दिया जो राजनीति और आर्थिक विकास, राजनीति और शिक्षा, सामाजिक संस्कृति और राजनीति के बीच सम्बंध जैसी समस्याओं से सम्बन्धित है।

दूसरे महायुद्ध के बाद तुलनात्मक राजनीतिक के क्षेत्र में सही दिशा का विकास हु आ। पहले तो मंथर गति से विकास हुआ, फिर तेजी से नयी प्रवृतियाँ उभरने लगीं। सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति  और विस्तरा की आलोचनात्मक पहले तुलनात्मक अध्ययन के महत्व को समझते हुए नये तकनीक की खोज की, फिर नई अवधारणाओं जैसे राजनीतिक विश्लेषण, राजनीतिक समाजशास्त्र आदि का विकास हुआ। पिछले दो दशकों में राजनीति के क्षेत्र में तुलनात्मक अध्ययन का विकास विशेष रूप से और बडी तेजी से हुआ। ईस्टन. आमंड, कार्ल डॉ॰ एच., कोलमन आदि ने व्यवस्था सिद्धान्त के अन्तर्गत तुलनात्मक विश्लेषण को नयी दिशा दी। व्यवस्था के सिद्धान्त बहुत ही महत्वपूर्ण और उपयोगी सिद्ध हुए। सिद्धान्त के द्वारा राज्य और राज्य से परे सभी प्रकार की सामाजिक व्यवस्थाओं की तुलना संभव हुई। लगभग सभी विद्वानों ने अपनीअपनी विशेष शब्दावली और भाषा का विकास किया। 'इनपुट', 'आउटपुट', 'फीडबैक', 'साईबरनेटिक्स', आदि इसका उदाहरण है। सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति  और विस्तरा की आलोचनात्मकतुलनात्मक राजनीति के शोध के लिए कई नयी पद्धतियाँ अपनायी गयीं, जैसे 'बोटिंग स्टडी', 'स्केलिंग टेकनीक', 'कन्टेन्ट एनालायसिसआदि। तुलनात्मक राजनीति के विकास में हाल के वर्षों में डेल, एप्टर रोस्टो, लुसियन पाई, सिडनी वर्बा, मायरन विनर आदि के योगदान अपना विशेष महत्व रखते हैं। उन्होंने केवल पश्चिमी देशों का ही अध्ययन नहीं किया, बल्कि नवोदित राष्ट्रों और तीसरे विश्व के अध्ययन को ही विशेष महत्व दिया।

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