Wednesday, September 15, 2021

लिंग और विकास के बिच क्या सबंद है सपषट कीजिए

 लिंग और विकास के बिच क्या सबंद है सपषट कीजिए

संवाद सहयोगी, शिमला : समाज का विकास तभी संभव है जब लिंग भेद की धारणा को पूरी तरह से मिटा दिया जाए। महिलाएं भी समाज का आधार हैं और उनके बिना समाज का विकास नहीं हो सकता। समय बदलता जा रहा है मगर समाज की मानसिकता आज भी पुरानी है। यह बात कुलपति प्रो. एडीएन वाजपेयी ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में शुक्रवार को विवि कैनेडियन अध्ययन केंद्र और इंडो-कनाडा शास्त्री संस्थान और भारतीय समाज विज्ञान परिषद् नई दिल्ली के संयुक्त तत्वाधान में 'भारत और कनाडा लिंग न्याय में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चिंतन विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में कही।

उन्होंने कहा कि लिंग न्याय के लिए आज प्रशासक न्यायविद, शिक्षाविद सभी एक मंच पर एकत्रित हुए हैं। यह गौरव का विषय है। विश्वभर में लिंग भेद को लेकर जो असमानताएं और विषमताएं हैं और उन्हें दूर करने के लिए सार्थक प्रयास किए जा सकते हैं। खासतौर पर शोधार्थियों के लिए यह एक उचित अवसर होगा जहा से वे पर्याप्त शोध सूचना सामग्री प्राप्त कर सकते हैं। लिंग भेद का अध्ययन करते समय सभी विषयों को समानता दी जानी चाहिए।

प्रदेश प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वीके शर्मा ने स्पष्ट किया कि लिंग भेद के अध्ययन और मंथन के समय महिलाओं को उसके केंद्र में भी रखा जाना चाहिए। अन्यथा यह अध्ययन अधूरा है। समाज में महिलाओं का आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहता है।

प्रदेश पुलिस महानिदेशक डॉ. सीता राम मरढ़ी ने लिंग न्याय को लेकर महिलाओं की स्थिति को चिंताजनक बताया।नियम और कानून महिलाओं के खिलाफ किसी प्रकार की प्रताड़ना की आज्ञा नहीं देता लेकिन स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करने की आवयश्कता है। साथ ही उनके साथ होने वाले अपराध के लिए कानून और नियम कठोरता से लागू होने चाहिए।

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की अध्यक्ष प्रो. चंद्रकला ने कहा कि किसी भी समाज में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं का मान-सम्मान एक महत्वपूर्ण लिंग न्याय के रुप में माना जाता है। मगर समय तो बदलता जा रहा है लेकिन मानसिकता आज भी वही है। कनाडा की कौंसिल जनरल डॉ. रजनी एलेग्जैंडर ने लिंग न्याय में मानवाधिकारों के बारे में बताया। महिलाएं कई सामाजिक व्यवस्थाओं में आर्थिकी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कोई भी निर्णय लेने में महिलाओं की सहभागिता को प्रमुखता दी जानी चाहिए। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय कैनेडियन अध्ययन केंद्र की निदेशक डॉ. अनुपमा सिंह द्वारा लिखित पुस्तक का भी विमोचन भी हुआ।

लिंग पुरुषों और महिलाओं, लड़कों और लड़कियों के बीच जैविक अंतर से अधिक है। लिंग परिभाषित करता है कि किसी दिए गए समाज में एक पुरुष या महिला, लड़का या लड़की होने का क्या मतलब है, और सीखे गए पुरुषों और महिलाओं के बीच सामाजिक अंतर को संदर्भित करता है, और हालांकि हर संस्कृति में गहराई से निहित है, समय के साथ परिवर्तनशील और व्यापक है संस्कृतियों के बीच और भीतर बदलाव। वर्ग, जाति और अन्य सामाजिक कारकों के साथ "लिंग" किसी भी संस्कृति में महिलाओं, पुरुषों, लड़कों और लड़कियों के लिए भूमिका, शक्ति और संसाधन निर्धारित करता है, क्योंकि व्यक्तियों की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अवसरों तक अलग-अलग पहुंच है और वे किस स्थिति में हैं आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संस्थानों के भीतर पकड़।

इस मौके पर प्रति-कुलपति प्रो राजेंद्र सिंह चौहान, अधिष्ठाता अध्ययन प्रो. टीसी भल्ला, कुलसचिव मोहन झारटा, विभागाध्यक्ष, शोध संस्थानों के निदेशक विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

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