Free IGNOU MJY-008 Assignment Answer Key
2025-26 PDF
1. सिंह, तुला राशियों का 12 भावों में फल के अनुसार
वर्णन कीजिए।
ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक राशि का फल 12 भावों के माध्यम से व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पक्षों—जैसे
व्यक्तित्व, धन, शिक्षा, परिवार, विवाह, स्वास्थ्य आदि—को प्रभावित करता है। यहाँ सिंह (Leo) और तुला (Libra) राशियों का 12 भावों के अनुसार
फलात्मक वर्णन प्रस्तुत है।
सिंह राशि का 12 भावों में फल
1. लग्न (प्रथम भाव): सिंह लग्न वाला व्यक्ति आत्मविश्वासी, नेतृत्व क्षमता से युक्त, साहसी
और प्रतिष्ठा-प्रिय होता है।
2. द्वितीय भाव: वाणी प्रभावशाली होती है। धन संग्रह की योग्यता तथा पारिवारिक
सम्मान मिलता है।
3. तृतीय भाव: साहस, पराक्रम और भाई-बहनों से सहयोग। व्यक्ति
कर्मठ और महत्वाकांक्षी होता है।
4. चतुर्थ भाव: मातृ सुख, संपत्ति और वाहन का
योग। घर में अनुशासन और सम्मान का वातावरण रहता है।
5. पंचम भाव: बुद्धि, संतान सुख और शिक्षा
में सफलता। व्यक्ति रचनात्मक और नेतृत्वशील होता है।
6. षष्ठ भाव: शत्रुओं पर विजय, प्रतियोगिताओं
में सफलता, परंतु अहंकार से विवाद संभव।
7. सप्तम भाव: दांपत्य जीवन में प्रभावशाली जीवनसाथी, परंतु अहंकार से मतभेद हो सकते हैं।
8. अष्टम भाव: अचानक परिवर्तन, गूढ़
विषयों में रुचि और दीर्घायु का योग।
9. नवम भाव: भाग्य प्रबल, धर्म और उच्च
आदर्शों में विश्वास।
10.
दशम भाव: उच्च
पद, प्रशासनिक या नेतृत्व वाले कार्यों में
सफलता।
11.
एकादश भाव: आय
में वृद्धि, मित्रों से लाभ और सामाजिक प्रतिष्ठा।
12.
द्वादश भाव: व्यय
अधिक, परंतु आध्यात्मिक प्रवृत्ति और विदेश
यात्रा के योग।
तुला राशि का 12 भावों में फल
1. लग्न (प्रथम भाव): तुला लग्न वाला व्यक्ति संतुलित, आकर्षक, कूटनीतिज्ञ और
सौंदर्य-प्रिय होता है।
2. द्वितीय भाव: मधुर वाणी, धन संचय की क्षमता
और पारिवारिक सौहार्द।
3. तृतीय भाव: संचार कौशल उत्तम, भाई-बहनों
से सहयोग और साहसिक निर्णय।
4. चतुर्थ भाव: घरेलू सुख, कला और सजावट में
रुचि, माता से स्नेह।
5. पंचम भाव: रचनात्मक बुद्धि, प्रेम
संबंधों में संतुलन और संतान सुख।
6. षष्ठ भाव: संघर्षों में धैर्य, न्यायप्रियता, परंतु निर्णय में विलंब की प्रवृत्ति।
7. सप्तम भाव: दांपत्य जीवन में सामंजस्य, जीवनसाथी
आकर्षक और सहयोगी।
8. अष्टम भाव: जीवन में उतार-चढ़ाव, परंतु
गूढ़ विषयों में रुचि और शोध प्रवृत्ति।
9. नवम भाव: भाग्य मध्यम से उत्तम, धर्म
और न्याय के प्रति झुकाव।
10.
दशम भाव: व्यवसाय, कानून, कला या कूटनीति से जुड़े कार्यों में
सफलता।
11.
एकादश भाव: मित्रों
से लाभ, सामाजिक नेटवर्क से आय और इच्छाओं की
पूर्ति।
12.
द्वादश भाव: खर्च
अधिक, विलासिता और विदेश संपर्क, साथ ही आध्यात्मिक झुकाव।
उपसंहार
सिंह राशि जहाँ नेतृत्व, आत्मविश्वास
और प्रतिष्ठा का प्रतीक है, वहीं तुला राशि संतुलन, सौंदर्य और कूटनीति का प्रतिनिधित्व करती है। दोनों राशियों
का 12 भावों में फल जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को
अलग-अलग ढंग से प्रभावित करता है। सिंह व्यक्ति शक्ति और नेतृत्व के माध्यम से
उन्नति करता है, जबकि तुला व्यक्ति सामंजस्य और
न्यायप्रियता से जीवन में सफलता प्राप्त करता है।
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2. भावगत ग्रहों में शनि के फल का 12 भावों के अनुसार विवेचन
कीजिए।
ज्योतिष शास्त्र में शनि को कर्म, अनुशासन, न्याय, संघर्ष, विलंब
और धैर्य का ग्रह माना गया है। शनि व्यक्ति को जीवन में कठिन परिश्रम, संयम और उत्तरदायित्व का पाठ पढ़ाता है।
यह शुभ हो या अशुभ—अपने फल धीरे-धीरे देता है,
परंतु
स्थायी प्रभाव छोड़ता है। जन्मकुंडली में शनि जिस भाव में स्थित होता है, उसी भाव से संबंधित विषयों में विशेष
प्रभाव दिखाता है। नीचे शनि के 12 भावों में स्थित होने
पर मिलने वाले फलों का विवेचन प्रस्तुत है।
प्रथम भाव (लग्न) में शनि
लग्न में शनि होने से व्यक्ति गंभीर, अनुशासित, परिश्रमी
और जिम्मेदार होता है। स्वभाव में संकोच और आत्मविश्वास की कमी हो सकती है। जीवन
में सफलता देर से मिलती है, पर स्थायी होती है।
स्वास्थ्य में कमजोरी या शारीरिक थकावट संभव है।
द्वितीय भाव में शनि
द्वितीय भाव में शनि धन,
वाणी
और परिवार को प्रभावित करता है। व्यक्ति धन संचय धीरे-धीरे करता है। वाणी कठोर या कम
बोलने वाली होती है। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ अधिक रहती हैं, परंतु वृद्धावस्था में आर्थिक स्थिरता
मिलती है।
तृतीय भाव में शनि
यह स्थिति साहस, पराक्रम और परिश्रम
को बढ़ाती है। व्यक्ति कर्मठ, धैर्यवान और
संघर्षशील होता है। भाई-बहनों से दूरी या जिम्मेदारी का भाव हो सकता है। लेखन, तकनीकी या श्रम आधारित कार्यों में
सफलता मिलती है।
चतुर्थ भाव में शनि
चतुर्थ भाव में शनि मातृ सुख, गृह
सुख और संपत्ति में विलंब देता है। व्यक्ति को घर-परिवार से दूर रहना पड़ सकता है।
माता के स्वास्थ्य की चिंता रहती है। भूमि,
भवन
या वाहन सुख देर से प्राप्त होते हैं।
पंचम भाव में शनि
यह भाव बुद्धि, शिक्षा और संतान से
संबंधित है। शनि यहाँ शिक्षा में बाधा, प्रेम संबंधों में
गंभीरता और संतान प्राप्ति में विलंब दे सकता है। व्यक्ति गंभीर चिंतन वाला और
व्यवहारिक बुद्धि वाला होता है।
षष्ठ भाव में शनि
षष्ठ भाव शनि के लिए अपेक्षाकृत शुभ माना जाता है। व्यक्ति
शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। रोगों से संघर्ष करने की शक्ति मिलती है। नौकरी, सेवा, प्रशासन
और न्याय से जुड़े क्षेत्रों में सफलता मिलती है।
सप्तम भाव में शनि
सप्तम भाव में शनि विवाह में विलंब या दांपत्य जीवन में
जिम्मेदारियाँ बढ़ाता है। जीवनसाथी गंभीर, परिश्रमी और
व्यावहारिक होता है। व्यवसाय में स्थिरता तो मिलती है, पर सफलता धीरे-धीरे आती है।
अष्टम भाव में शनि
यह स्थिति जीवन में अचानक कठिनाइयाँ, मानसिक
तनाव और परिवर्तन लाती है। व्यक्ति दीर्घायु हो सकता है, पर
संघर्षपूर्ण जीवन जीता है। गूढ़ विषयों, अनुसंधान और रहस्यवाद में रुचि हो सकती है।
नवम भाव में शनि
नवम भाव में शनि भाग्य में विलंब, धर्म में व्यावहारिकता और गुरु से मतभेद
दे सकता है। व्यक्ति कर्म को अधिक महत्व देता है। कठिन परिश्रम के बाद भाग्योदय
होता है, विशेषकर जीवन के
उत्तरार्ध में।
दशम भाव में शनि
दशम भाव शनि का कर्मक्षेत्र है और यहाँ यह अत्यंत प्रभावशाली
होता है। व्यक्ति कर्मठ, जिम्मेदार और उच्च पद
प्राप्त करने वाला होता है। राजनीति, प्रशासन, उद्योग या श्रम आधारित क्षेत्रों में सफलता
मिलती है।
एकादश भाव में शनि
यह स्थिति आय में स्थिरता और लाभ में विलंब देती है। मित्र कम
लेकिन विश्वसनीय होते हैं। दीर्घकालीन योजनाओं से अच्छा लाभ मिलता है। समाज में
सम्मान प्राप्त होता है।
द्वादश भाव में शनि
द्वादश भाव में शनि खर्च,
एकांत
और विदेश से जुड़ा होता है। व्यक्ति संयमी जीवन जीता है। आध्यात्मिक प्रवृत्ति
बढ़ती है। विदेश में कार्य या निवास के योग बन सकते हैं, पर मानसिक एकाकीपन संभव है।
उपसंहार
शनि एक न्यायप्रिय और कर्मफल दाता ग्रह है। यह व्यक्ति को
कठिनाइयों के माध्यम से परिपक्व बनाता है। जिस भाव में शनि स्थित होता है, वहाँ संघर्ष और विलंब के बाद स्थायी
सफलता देता है। शनि का सही प्रभाव व्यक्ति को अनुशासन, धैर्य और जिम्मेदारी के साथ जीवन में
ऊँचाइयों तक पहुँचाता है।
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3. तृतीय भाव में विषयों का विचार किस
आधार पर किया जाता है? विस्तार से लिखिए।
ज्योतिष शास्त्र में कुंडली के 12 भाव
मानव जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें तृतीय भाव को पराक्रम भाव कहा जाता है। यह भाव व्यक्ति के साहस, प्रयास, संचार
क्षमता, भाई-बहनों, कौशल और दैनिक परिश्रम से संबंधित
विषयों का संकेत देता है। तृतीय भाव के विषयों का विचार केवल भाव की स्थिति से ही
नहीं, बल्कि कई ज्योतिषीय
आधारों को ध्यान में रखकर किया जाता है। तृतीय भाव के फल निर्धारण में निम्नलिखित
मुख्य आधारों पर विचार किया जाता है।
1. तृतीय भाव का स्वभाव और मूल अर्थ
तृतीय भाव उपचय भाव है,
अर्थात
इसका फल समय के साथ बढ़ता है। इस भाव से व्यक्ति की इच्छाशक्ति, पराक्रम, साहस, आत्मबल, पहल
करने की क्षमता और संचार शक्ति का विचार किया जाता है। व्यक्ति अपने जीवन में
कितना संघर्ष करता है और स्वयं के प्रयास से कितनी सफलता प्राप्त करता है—यह सब
तृतीय भाव से देखा जाता है।
2. तृतीय भाव में स्थित ग्रह
तृतीय भाव में कौन-सा ग्रह स्थित है, यह विषयों के निर्धारण का सबसे
महत्वपूर्ण आधार है।
·
शुभ ग्रह (बृहस्पति, शुक्र, चंद्र)
होने पर साहस सकारात्मक, संवाद मधुर और
भाई-बहनों से सहयोग मिलता है।
·
पाप ग्रह (शनि, मंगल, राहु, केतु) होने पर संघर्ष अधिक, परंतु अत्यधिक परिश्रम और जोखिम लेने की
क्षमता मिलती है।
ग्रह
की प्रकृति के अनुसार व्यक्ति की कार्यशैली और मानसिक दृढ़ता का मूल्यांकन किया
जाता है।
3. तृतीय भाव के स्वामी की स्थिति
तृतीय भाव के स्वामी की स्थिति, राशि
और भाव विशेष महत्व रखते हैं।
·
यदि तृतीय भाव का स्वामी शुभ भावों
(केंद्र या त्रिकोण) में हो, तो साहस और प्रयास
सफल होते हैं।
·
यदि वह षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो प्रयासों में बाधा और भाई-बहनों से
मतभेद संभव होते हैं।
तृतीय
भाव के स्वामी की दशा-अंतरदशा भी फल निर्धारण में सहायक होती है।
4. तृतीय भाव पर दृष्टि
अन्य ग्रहों की दृष्टि तृतीय भाव के विषयों को प्रभावित करती
है।
·
गुरु की दृष्टि साहस को धर्म और नीति से
जोड़ती है।
·
मंगल की दृष्टि साहस को आक्रामक बनाती
है।
·
शनि की दृष्टि परिश्रम और धैर्य बढ़ाती
है।
इस
आधार पर व्यक्ति के प्रयासों की दिशा और परिणाम का मूल्यांकन किया जाता है।
5. तृतीय भाव की राशि
तृतीय भाव में कौन-सी राशि स्थित है, उससे साहस और संचार की प्रकृति समझी
जाती है।
·
अग्नि राशि में तृतीय भाव होने पर साहस
तीव्र और नेतृत्व गुण प्रबल होते हैं।
·
वायु राशि में संचार, लेखन और बौद्धिक क्षमता बढ़ती है।
·
पृथ्वी राशि में व्यावहारिक और
धैर्यपूर्ण प्रयास दिखाई देते हैं।
·
जल राशि में भावनात्मक साहस और
अंतर्ज्ञान प्रमुख होता है।
उपसंहार
तृतीय भाव में विषयों का विचार केवल भाव की उपस्थिति तक सीमित
नहीं है, बल्कि ग्रहों की
स्थिति, दृष्टि, राशि, भाव
स्वामी और दशा-अंतरदशा जैसे अनेक आधारों पर किया जाता है। यह भाव व्यक्ति के
आत्मबल और स्वयं के प्रयासों का दर्पण है। सुदृढ़ तृतीय भाव व्यक्ति को संघर्षों
से लड़ने की शक्ति देता है और उसे जीवन में आत्मनिर्भर बनाता है।
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4. अष्टम भाव में विषयों का विचार किस
आधार पर किया जाता है? विस्तार से लिखिए।
ज्योतिष शास्त्र में जन्मकुंडली के बारह भावों में अष्टम भाव
को अत्यंत महत्वपूर्ण और रहस्यमय माना गया है। इसे आयु भाव या रहस्य भाव भी कहा जाता है। यह भाव जीवन की
गहराइयों, अचानक होने वाली
घटनाओं, परिवर्तन, संकट, गूढ़
ज्ञान तथा मृत्यु-संबंधी विषयों का प्रतिनिधित्व करता है। अष्टम भाव के विषयों का
विचार केवल भाव की स्थिति से नहीं, बल्कि अनेक ज्योतिषीय
आधारों पर किया जाता है। नीचे इन्हीं आधारों का विस्तार से विवेचन प्रस्तुत है।
1. अष्टम भाव का मूल स्वरूप
अष्टम भाव दीर्घायु, मृत्यु, दुर्घटना, रोग, कष्ट, आकस्मिक
लाभ-हानि, गुप्त बातें, रहस्य, शोध, तंत्र-मंत्र और विरासत से संबंधित
विषयों को दर्शाता है। यह भाव जीवन में अचानक परिवर्तन लाने वाला माना जाता है।
अतः इसके फल प्रायः अप्रत्याशित होते हैं।
2. अष्टम भाव में स्थित ग्रह
अष्टम भाव में स्थित ग्रह उसके विषयों को गहराई से प्रभावित
करते हैं।
·
शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, चंद्र) हों तो व्यक्ति को दीर्घायु, गूढ़ ज्ञान में रुचि और संकटों से उबरने
की शक्ति मिलती है।
·
पाप ग्रह (मंगल, शनि, राहु, केतु)
होने पर दुर्घटना, मानसिक तनाव, रोग या अचानक बाधाएँ संभव होती हैं।
ग्रह
की प्रकृति के अनुसार जीवन में संकट या परिवर्तन का स्वरूप तय किया जाता है।
3. अष्टम भाव के स्वामी की स्थिति
अष्टम भाव के स्वामी की कुंडली में स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण
होती है।
·
यदि अष्टमेश केंद्र या त्रिकोण में हो, तो कठिन परिस्थितियों के बाद सफलता और
सुरक्षा मिलती है।
·
यदि वह षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो आयु, स्वास्थ्य
और मानसिक शांति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
अष्टम
भाव के स्वामी की शक्ति से व्यक्ति की जीवन-शक्ति और संकट सहन करने की क्षमता का
अनुमान लगाया जाता है।
4. अष्टम भाव पर ग्रहों की दृष्टि
अष्टम भाव पर पड़ने वाली दृष्टियाँ उसके फलों को बदल देती हैं।
·
गुरु की दृष्टि संकटों में रक्षा और नैतिक बल देती है।
·
शनि की दृष्टि दीर्घायु तो देती है, पर जीवन में संघर्ष और विलंब भी लाती
है।
·
मंगल की दृष्टि दुर्घटना और आकस्मिक घटनाओं की संभावना
बढ़ाती है।
इस
प्रकार दृष्टियों से संकटों की प्रकृति और तीव्रता का विचार किया जाता है।
5. अष्टम भाव की राशि
अष्टम भाव में स्थित राशि भी विषयों के निर्धारण में सहायक
होती है।
·
अग्नि राशि में अष्टम भाव होने पर अचानक और तीव्र घटनाएँ
होती हैं।
·
पृथ्वी राशि में संकट धीरे-धीरे आते हैं और
व्यावहारिक समाधान संभव होते हैं।
·
वायु राशि में मानसिक तनाव और विचारों का द्वंद्व
अधिक होता है।
·
जल राशि में भावनात्मक संकट और अंतर्ज्ञान प्रबल
होता है।
उपसंहार
अष्टम भाव के विषयों का विचार भाव, ग्रह, भावेश, राशि, दृष्टि
और दशा-अंतरदशा जैसे अनेक आधारों पर किया जाता है। यह भाव जीवन के उतार-चढ़ाव और
रहस्यमय पक्षों का प्रतिनिधित्व करता है। मजबूत अष्टम भाव व्यक्ति को संकटों से
उबरने की क्षमता देता है और उसे मानसिक रूप से परिपक्व बनाता है, जबकि कमजोर अष्टम भाव जीवन में
अप्रत्याशित कठिनाइयाँ उत्पन्न कर सकता है।
खण्ड-2
निर्देशः अधोलिखित प्रश्नों में से
किन्ही चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
1. दाम्पत्य जीवन के सुखों का ज्योतिष
शास्त्रीय विवेचन कीजिए।
ज्योतिष शास्त्र में दाम्पत्य जीवन को मानव जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण
और संवेदनशील पक्ष माना गया है। विवाह केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक
और आध्यात्मिक संबंध का आधार है। कुंडली के माध्यम से दाम्पत्य सुख, वैवाहिक सामंजस्य, जीवनसाथी का स्वभाव, विवाह का समय तथा वैवाहिक समस्याओं का
सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है। दाम्पत्य जीवन के सुखों का ज्योतिषीय विवेचन
निम्नलिखित आधारों पर किया जाता है।
1. सप्तम भाव का महत्व
कुंडली में सप्तम भाव को दाम्पत्य भाव कहा जाता है। यह भाव विवाह, जीवनसाथी, साझेदारी
और वैवाहिक संबंधों का प्रतिनिधित्व करता है। यदि सप्तम भाव मजबूत हो, शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो दाम्पत्य जीवन सुखमय, स्थिर और सहयोगपूर्ण रहता है। कमजोर या
पाप ग्रहों से पीड़ित सप्तम भाव वैवाहिक कलह,
विलंब
या अलगाव का कारण बन सकता है।
2. सप्तम भाव के स्वामी (सप्तमेश) की स्थिति
सप्तम भाव के स्वामी की स्थिति दाम्पत्य सुख के निर्धारण में
अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
·
यदि सप्तमेश केंद्र (1, 4, 7, 10) या त्रिकोण (5, 9) में स्थित हो, तो विवाह सफल और सुखी होता है।
·
यदि सप्तमेश षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो दाम्पत्य जीवन में संघर्ष, दूरी या तनाव की संभावना बढ़ जाती है।
सप्तमेश
की शक्ति जीवनसाथी के स्वास्थ्य, व्यवहार और संबंधों
की स्थिरता को दर्शाती है।
3. शुक्र ग्रह की भूमिका
शुक्र को विवाह, प्रेम, आकर्षण और भोग-विलास का कारक ग्रह माना
गया है। पुरुष कुंडली में शुक्र पत्नी का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि स्त्री कुंडली में बृहस्पति पति का
कारक होता है।
·
मजबूत और शुभ स्थिति में स्थित शुक्र
दाम्पत्य सुख, प्रेम, सामंजस्य और शारीरिक संतोष प्रदान करता
है।
·
पीड़ित शुक्र वैवाहिक असंतोष, आकर्षण की कमी और संबंधों में तनाव
उत्पन्न कर सकता है।
4. बृहस्पति का प्रभाव
बृहस्पति को धर्म, नैतिकता और संरक्षण
का ग्रह माना गया है। स्त्री कुंडली में बृहस्पति पति का कारक होता है।
शुभ
बृहस्पति जीवनसाथी को समझदार, सहयोगी और नैतिक
बनाता है। यह दाम्पत्य जीवन में धैर्य, सम्मान और स्थायित्व
प्रदान करता है।
5. लग्न और लग्नेश का योगदान
लग्न और लग्नेश व्यक्ति के स्वभाव और व्यवहार को दर्शाते हैं।
यदि लग्न और सप्तम भाव में संतुलन हो, तो दाम्पत्य जीवन में
आपसी समझ और सामंजस्य बना रहता है। अत्यधिक अहंकार, स्वार्थ
या कठोर स्वभाव वैवाहिक सुख को प्रभावित कर सकता है।
उपसंहार
ज्योतिष शास्त्र में दाम्पत्य जीवन के सुखों का विवेचन
बहुआयामी है। सप्तम भाव, उसके स्वामी, शुक्र, बृहस्पति, नवांश कुंडली और दशा-अंतरदशा—ये सभी
तत्व मिलकर वैवाहिक जीवन की गुणवत्ता निर्धारित करते हैं। सुदृढ़ और संतुलित ग्रह
योग व्यक्ति को प्रेमपूर्ण, सहयोगी और सुखी
दाम्पत्य जीवन प्रदान करते हैं, जबकि ग्रहों की अशुभ
स्थिति संघर्ष और असंतोष का कारण बन सकती है। अतः दाम्पत्य सुख के लिए कुंडली का
समग्र अध्ययन आवश्यक है।
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2. विवाह और संतान का विचार किन भावों
से होता है? उल्लेख कीजिए।
ज्योतिष शास्त्र में मानव जीवन की प्रमुख घटनाओं—जैसे विवाह और
संतान—का गहन अध्ययन जन्मकुंडली के विभिन्न भावों के माध्यम से किया जाता है।
विवाह और संतान दोनों ही जीवन के अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार हैं, जिनसे व्यक्ति का सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक जीवन जुड़ा होता
है। इन विषयों का विचार केवल एक भाव से नहीं,
बल्कि
अनेक भावों, ग्रहों और उनके
पारस्परिक संबंधों के आधार पर किया जाता है। विश्वविद्यालय स्तर के उत्तर के रूप
में नीचे इसका क्रमबद्ध विवेचन प्रस्तुत है।
(क) विवाह का विचार
किन भावों से होता है
1. सप्तम
भाव
सप्तम भाव को विवाह भाव या दाम्पत्य भाव कहा जाता है। यह भाव विवाह, जीवनसाथी, दाम्पत्य
सुख, साझेदारी और वैवाहिक
संबंधों का मुख्य संकेतक है।
·
सप्तम भाव की स्थिति, उसमें स्थित ग्रह और उस पर पड़ने वाली
दृष्टियाँ विवाह की प्रकृति को दर्शाती हैं।
·
यदि सप्तम भाव शुभ और सुदृढ़ हो, तो विवाह सुखी और स्थिर होता है।
2. सप्तम
भाव का स्वामी (सप्तमेश)
सप्तमेश की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
·
सप्तमेश यदि केंद्र या त्रिकोण भावों
में स्थित हो, तो विवाह सफल रहता
है।
·
यदि वह षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो विवाह में विलंब, कलह या अलगाव की संभावना रहती है।
3. द्वितीय
भाव
द्वितीय भाव को
कुटुंब
भाव कहा जाता है। विवाह
के बाद बनने वाले परिवार और दांपत्य जीवन की स्थिरता का विचार इस भाव से किया जाता
है।
सप्तम
और द्वितीय भाव का संबंध वैवाहिक जीवन की निरंतरता को दर्शाता है।
4. चतुर्थ
भाव
चतुर्थ भाव गृहस्थ जीवन,
घरेलू
सुख और पारिवारिक शांति का सूचक है। विवाह के पश्चात गृहस्थ सुख का मूल्यांकन इस
भाव से किया जाता है।
5. द्वादश
भाव
द्वादश भाव शय्या सुख, भोग-विलास और निजी
जीवन से संबंधित है। यह भाव दाम्पत्य जीवन के शारीरिक और भावनात्मक सुखों का संकेत
देता है।
6. कारक
ग्रह
·
शुक्र विवाह, प्रेम
और आकर्षण का प्रमुख कारक ग्रह है।
·
पुरुष कुंडली में शुक्र पत्नी का, जबकि स्त्री कुंडली में बृहस्पति पति का कारक माना जाता है।
इन
ग्रहों की स्थिति विवाह सुख के निर्धारण में विशेष महत्व रखती है।
(ख) संतान का विचार
किन भावों से होता है
1. पंचम
भाव
पंचम भाव को संतान भाव कहा जाता है। यह संतान, बुद्धि, शिक्षा
और रचनात्मकता का प्रतिनिधित्व करता है।
·
पंचम भाव की स्थिति, उसमें स्थित ग्रह और उसकी शक्ति से
संतान सुख का विचार किया जाता है।
·
मजबूत पंचम भाव संतान प्राप्ति और संतान
से सुख देता है।
2. पंचम भाव का स्वामी (पंचमेश)
पंचमेश की स्थिति संतान सुख में निर्णायक भूमिका निभाती है।
·
पंचमेश यदि शुभ भावों में स्थित हो, तो संतान सुख उत्तम होता है।
·
यदि पंचमेश पाप भावों में स्थित हो या
पीड़ित हो, तो संतान में विलंब
या कष्ट संभव होता है।
3. सप्तम भाव
संतान उत्पत्ति के लिए विवाह आवश्यक है, अतः सप्तम भाव का पंचम भाव से संबंध
संतान योग को मजबूत करता है।
4. नवम भाव
नवम भाव को भाग्य भाव कहा जाता है। संतान को भी पूर्व जन्म के
पुण्य से जोड़ा जाता है, इसलिए पंचम और नवम
भाव का संबंध संतान सुख में वृद्धि करता है।
5. अष्टम भाव
अष्टम भाव से संतान में बाधा, गर्भपात
या संतान संबंधी कष्टों का विचार किया जाता है,
विशेषकर
जब यह पंचम भाव से संबंधित हो।
उपसंहार
ज्योतिष शास्त्र में विवाह और संतान का विचार बहु-भावीय और
समग्र दृष्टिकोण से किया जाता है। विवाह के लिए सप्तम भाव प्रमुख है, जबकि संतान के लिए पंचम भाव का विशेष
महत्व है। साथ ही द्वितीय, चतुर्थ, द्वादश, नवम
और अष्टम भाव, संबंधित भावों के
स्वामी, कारक ग्रह तथा नवांश
कुंडली—सभी मिलकर विवाह और संतान सुख का निर्धारण करते हैं। अतः सही फलादेश के लिए
कुंडली का समग्र और संतुलित अध्ययन आवश्यक है।
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3. रोग का विचार किस भाव से करते हैं? फल के आधार पर वर्णन कीजिए।
ज्योतिष शास्त्र में मानव जीवन के सुख-दुःख का सूक्ष्म अध्ययन
जन्मकुंडली के बारह भावों के माध्यम से किया जाता है। इनमें रोग (बीमारी), शारीरिक कष्ट, मानसिक
तनाव तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का विचार मुख्यतः षष्ठ भाव से किया जाता है, परंतु केवल एक ही भाव पर्याप्त नहीं होता। रोग का सम्यक
विवेचन करते समय कई भावों, ग्रहों और उनके परस्पर संबंधों का फलात्मक
आधार पर अध्ययन आवश्यक होता है। नीचे रोग विचार से संबंधित भावों का क्रमबद्ध विवेचन
प्रस्तुत है।
1. षष्ठ भाव (रोग भाव)
षष्ठ भाव को स्पष्ट रूप से रोग भाव कहा गया है।
इस भाव से रोग, शत्रु, ऋण, विवाद, संघर्ष और सेवा का विचार किया जाता है।
फल के आधार पर विचार
- यदि षष्ठ भाव
मजबूत हो और शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो व्यक्ति रोगों से शीघ्र उबर जाता है।
- यदि षष्ठ भाव
पाप ग्रहों (मंगल, शनि, राहु, केतु) से पीड़ित हो, तो बार-बार बीमारी, दीर्घकालीन रोग या शारीरिक कष्ट हो सकते हैं।
- षष्ठ भाव में
शुभ ग्रह रोग तो देते हैं, पर शीघ्र उपचार और विजय भी प्रदान करते हैं।
2. लग्न और लग्नेश
लग्न शरीर का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि लग्नेश शरीर की जीवन शक्ति को
दर्शाता है।
फल के आधार पर विचार
- मजबूत लग्न और
बलवान लग्नेश अच्छे स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता देते हैं।
- कमजोर लग्न या
पीड़ित लग्नेश बार-बार बीमारी, कमजोरी और मानसिक तनाव का कारण बनता है।
- यदि लग्न और
षष्ठ भाव में संबंध हो, तो रोग जीवन का स्थायी भाग बन सकता है।
3. अष्टम भाव
अष्टम भाव को आयु भाव कहा
जाता है। यह दीर्घकालीन रोग, गंभीर बीमारी, दुर्घटना और ऑपरेशन का संकेत देता है।
फल के आधार पर विचार
- अष्टम भाव पीड़ित होने पर गुप्त, अचानक या असाध्य रोगों की संभावना रहती है।
- शुभ ग्रह अष्टम भाव में हों, तो व्यक्ति गंभीर रोग से भी बच निकलता है।
- षष्ठ और अष्टम भाव का परस्पर संबंध रोग को जटिल बनाता है।
4. द्वादश भाव
द्वादश भाव अस्पताल, शैय्या, व्यय और रोग से होने वाले खर्च का भाव है।
फल के आधार पर विचार
- द्वादश भाव पीड़ित होने पर लंबे इलाज, अस्पताल में भर्ती और अधिक चिकित्सा व्यय होता है।
- शुभ ग्रह होने पर विदेश या आधुनिक चिकित्सा से लाभ मिलता है।
5. ग्रहों के अनुसार रोग विचार
ज्योतिष में ग्रहों से विशेष प्रकार के रोग देखे जाते हैं—
- सूर्य : हृदय, नेत्र, रक्तचाप
- चंद्र : मानसिक रोग, जुकाम, जल विकार
- मंगल : चोट, रक्त, ऑपरेशन
- बुध : त्वचा, स्नायु, नर्वस सिस्टम
- बृहस्पति : मोटापा, मधुमेह
- शुक्र : मूत्र, प्रजनन अंग
- शनि : पुराना, असाध्य, हड्डी रोग
- राहु-केतु : रहस्यमय, एलर्जी, मानसिक रोग
इन ग्रहों की षष्ठ, अष्टम
या द्वादश भाव में स्थिति से रोग का प्रकार निश्चित किया जाता है।
उपसंहार
ज्योतिष शास्त्र में रोग का विचार मुख्यतः षष्ठ भाव से किया
जाता है, किंतु लग्न, अष्टम
और द्वादश भाव के बिना रोग का पूर्ण विश्लेषण संभव नहीं है। ग्रहों की स्थिति, भावों का बल, दृष्टि और दशा-अंतरदशा
के फल के आधार पर रोग की प्रकृति, अवधि और उपचार की
संभावना का निर्धारण किया जाता है। इस प्रकार रोग विचार एक समग्र और फलात्मक
प्रक्रिया है, जो कुंडली के सूक्ष्म अध्ययन पर आधारित
होती है।
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4. मित्रता का और कुटुम्ब का, फल के आधार पर भावगत विवेचन
कीजिए।
ज्योतिष शास्त्र में मानव जीवन के सामाजिक संबंधों—विशेषतः
मित्रता और कुटुम्ब—का विश्लेषण जन्मकुंडली के विभिन्न भावों के माध्यम से किया
जाता है। मित्रता व्यक्ति के सामाजिक दायरे,
सहयोग
और लाभ से जुड़ी होती है, जबकि कुटुम्ब व्यक्ति
की पारिवारिक पृष्ठभूमि, संस्कार, आर्थिक स्थिरता और भावनात्मक सुरक्षा का
आधार होता है। इन दोनों विषयों का विचार अलग-अलग भावों से किया जाता है तथा ग्रहों
की स्थिति के अनुसार इनके शुभ-अशुभ फल निर्धारित होते हैं। नीचे मित्रता और
कुटुम्ब का भावगत विवेचन फल के आधार पर प्रस्तुत है।
(क) मित्रता का भावगत
विवेचन
1. एकादश
भाव (मित्र भाव / लाभ भाव)
एकादश
भाव को मित्रता, सामाजिक संबंध, बड़े भाई-बहन, लाभ और इच्छापूर्ति का प्रमुख भाव माना
गया है।
फल
के आधार पर—
·
यदि एकादश भाव बलवान हो और शुभ ग्रहों
से युक्त या दृष्ट हो, तो व्यक्ति को अच्छे, सहयोगी और लाभदायक मित्र मिलते हैं।
·
पाप ग्रहों के प्रभाव से मित्र स्वार्थी, अस्थायी या धोखा देने वाले हो सकते हैं।
·
मजबूत एकादश भाव सामाजिक प्रतिष्ठा और
मित्रों से आर्थिक लाभ देता है।
2. एकादश
भाव के स्वामी (एकादशेश)
एकादशेश की स्थिति मित्रता की गुणवत्ता निर्धारित करती है।
·
यदि एकादशेश केंद्र या त्रिकोण में हो, तो मित्रता स्थायी और सहयोगपूर्ण होती
है।
·
यदि वह षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो मित्रों से विवाद या विश्वासघात संभव
होता है।
3. तृतीय
भाव
तृतीय भाव छोटे भाई-बहन,
साहस
और निकट संबंधों का भाव है। कई बार मित्रों का संबंध भी भाई-बहनों जैसा हो जाता
है।
फल
के आधार पर—
·
शुभ ग्रह होने पर मित्रों से सहयोग और
साहस में वृद्धि होती है।
·
पाप ग्रह होने पर प्रतिस्पर्धा और मतभेद
बढ़ सकते हैं।
4. सप्तम
भाव
सप्तम भाव साझेदारी और सामाजिक संपर्क का भाव है।
यह
भाव मित्रता को व्यावसायिक या साझेदारी के रूप में दर्शाता है। शुभ स्थिति में
मित्र सहयोगी होते हैं, अशुभ स्थिति में
विवाद उत्पन्न हो सकता है।
(ख) कुटुम्ब का भावगत
विवेचन
1. द्वितीय
भाव (कुटुम्ब भाव)
द्वितीय भाव को स्पष्ट रूप से कुटुम्ब भाव कहा गया है।
यह
परिवार, वाणी, संस्कार और पारिवारिक संपत्ति का
प्रतिनिधित्व करता है।
फल
के आधार पर—
·
द्वितीय भाव मजबूत हो तो व्यक्ति को
अच्छा पारिवारिक सहयोग, सम्मान और आर्थिक
स्थिरता मिलती है।
·
पाप ग्रहों से पीड़ित होने पर पारिवारिक
कलह, धन विवाद और कटु वाणी
देखी जाती है।
2. द्वितीय
भाव के स्वामी (द्वितीयेश)
द्वितीयेश की स्थिति परिवार की स्थिरता को दर्शाती है।
·
यदि द्वितीयेश शुभ भावों में हो, तो परिवार सुखी और समृद्ध रहता है।
·
अशुभ भावों में होने पर पारिवारिक
उत्तरदायित्व बढ़ते हैं और तनाव रहता है।
3. चतुर्थ
भाव
चतुर्थ भाव गृह सुख, माता, घर और पारिवारिक शांति का भाव है।
फल
के आधार पर—
·
शुभ ग्रहों से युक्त चतुर्थ भाव घरेलू
सुख, भावनात्मक सुरक्षा और
शांत वातावरण देता है।
·
पीड़ित चतुर्थ भाव घर-परिवार में अशांति
और मानसिक तनाव का कारण बनता है।
4. नवम
भाव
नवम भाव पूर्वजों, पारिवारिक परंपरा और
भाग्य से जुड़ा होता है।
यह
भाव परिवार के संस्कार और नैतिक मूल्यों को दर्शाता है।
शुभ
नवम भाव व्यक्ति को श्रेष्ठ पारिवारिक परंपरा और पूर्वजों का आशीर्वाद देता है।
ग्रहों का प्रभाव
·
गुरु परिवार में सद्भाव और मित्रता में
विश्वास देता है।
·
शुक्र मधुर संबंध और सामाजिक सौहार्द बढ़ाता
है।
·
शनि संबंधों में गंभीरता और जिम्मेदारी लाता
है, पर दूरी भी दे सकता
है।
·
राहु-केतु मित्रता और परिवार दोनों में अचानक
उतार-चढ़ाव ला सकते हैं।
उपसंहार
ज्योतिष शास्त्र में मित्रता का विचार मुख्यतः एकादश भाव से और
कुटुम्ब का विचार द्वितीय भाव से किया जाता है,
किंतु
तृतीय, सप्तम, चतुर्थ और नवम भाव भी महत्वपूर्ण भूमिका
निभाते हैं। ग्रहों की शुभ-अशुभ स्थिति के अनुसार मित्र और परिवार सहयोगी या बाधक
बन सकते हैं।
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