Free IGNOU MCO-03 Assignment Solved 2025-26 : Fully Solved Answers

Free IGNOU MCO-03 Assignment Solution 2025-26 : Fully Solved Answers 

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1.(क) शोध प्रतिवेदन (रिसर्च रिपोर्ट) क्या है? एक अच्छे शोध प्रतिवेदन की विशेषताएँ/गुण क्या होते हैं?

शोध प्रतिवेदन (Research Report) किसी अनुसंधान कार्य का लिखित दस्तावेज़ होता है, जिसमें अनुसंधानकर्ता द्वारा किए गए अध्ययन, उसका विश्लेषण और निष्कर्ष व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किए जाते हैं। यह अनुसंधान की प्रक्रिया, प्रयुक्त विधियाँ और प्राप्त परिणामों का संक्षिप्त और स्पष्ट रूप प्रदान करता है। शोध प्रतिवेदन का मुख्य उद्देश्य अनुसंधान कार्य को दूसरों के लिए सुलभ और समझने योग्य बनाना है।

शोध प्रतिवेदन का अर्थ

शोध प्रतिवेदन वह औपचारिक दस्तावेज़ है, जिसमें अनुसंधान का उद्देश्य, पद्धति, आँकड़े, विश्लेषण और निष्कर्ष क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। यह केवल डेटा संग्रह का विवरण नहीं होता, बल्कि अनुसंधान की प्रक्रिया, दृष्टिकोण और परिणामों का वैज्ञानिक विवेचन भी प्रस्तुत करता है।

शोध प्रतिवेदन की संरचना

एक सामान्य शोध प्रतिवेदन निम्नलिखित भागों में विभाजित होता है:

1.     शीर्षक पृष्ठ (Title Page): अध्ययन का नाम, अनुसंधानकर्ता का नाम और तिथि।

2.     सारांश (Abstract): शोध का संक्षिप्त विवरण, उद्देश्य, पद्धति और मुख्य निष्कर्ष।

3.     परिचय (Introduction): अध्ययन का पृष्ठभूमि, समस्या का विवरण और अनुसंधान का उद्देश्य।

4.     साहित्य समीक्षा (Review of Literature): पूर्व में किए गए शोधों का संक्षिप्त विवेचन।

5.     अनुसंधान पद्धति (Research Methodology): डेटा संग्रह की विधियाँ, नमूना चयन, उपकरण और तकनीक।

6.     परिणाम और विश्लेषण (Results and Analysis): प्राप्त आँकड़ों का व्यवस्थित विश्लेषण, तालिकाएँ और ग्राफ।

7.     निष्कर्ष (Conclusion): शोध से प्राप्त मुख्य निष्कर्ष और सुझाव।

8.     संदर्भ सूची (References): प्रयुक्त पुस्तकें, लेख और अन्य स्रोत।

एक अच्छे शोध प्रतिवेदन की विशेषताएँ

1.     स्पष्टता और सटीकता: रिपोर्ट में विचारों और निष्कर्षों को सरल, स्पष्ट और सटीक भाषा में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

2.     वैज्ञानिकता: शोध प्रक्रिया, डेटा संग्रह और विश्लेषण वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित होने चाहिए।

3.     संगठित रूप: प्रतिवेदन का ढांचा सुव्यवस्थित और तार्किक क्रम में होना चाहिए।

4.     पूर्णता: सभी आवश्यक जानकारी—उद्देश्य, पद्धति, परिणाम और निष्कर्ष—प्रतिवेदन में समाहित हो।

निष्कर्ष

शोध प्रतिवेदन अनुसंधान कार्य का औपचारिक प्रस्तुतीकरण है। यह न केवल डेटा का संग्रह होता है, बल्कि अनुसंधान की प्रक्रिया, विश्लेषण और निष्कर्षों का वैज्ञानिक विवेचन भी प्रदान करता है। एक अच्छा शोध प्रतिवेदन स्पष्ट, संगठित, वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ और प्रमाणिक होना चाहिए। सही और प्रभावी शोध प्रतिवेदन अनुसंधान के महत्व को बढ़ाता है और अन्य शोधकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक का काम करता है।

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(ख) विषमता (Skewness) की धारणा को स्पष्ट कीजिए। यह समंकों के विश्लेषण में किस प्रकार सहायक है?

सांख्यिकी में डेटा का वितरण (Distribution) किसी भी शोध या अध्ययन का महत्वपूर्ण आधार होता है। किसी डेटा सेट का औसत, माध्यिका और बहुलक का अनुपात इसके वितरण की प्रकृति को दर्शाता है। इस संदर्भ में विषमता (Skewness) एक महत्वपूर्ण सांख्यिकीय उपाय है, जो यह बताता है कि डेटा का वितरण कितनी हद तक असंतुलित या तिरछा है।

विषमता का अर्थ

विषमता से तात्पर्य किसी डेटा वितरण की संतुलन की स्थिति से विचलन को मापना है। यदि डेटा का वितरण परिपूर्ण रूप से संतुलित (Symmetrical) होता है, तो इसे शून्य विषमता माना जाता है। परंतु यदि वितरण दाईं या बाईं ओर तिरछा होता है, तो इसे क्रमशः दायाँ विषमता (Positive Skewness) और बायाँ विषमता (Negative Skewness) कहा जाता है।

मुख्य प्रकार:

1.     शून्य विषमता (Zero Skewness): वितरण परिपूर्ण रूप से संतुलित, जैसे सामान्य वितरण (Normal Distribution)

2.     दायाँ विषमता (Positive Skewness): लंबी पूँछ दाईं ओर होती है; औसत > माध्यिका > बहुलक।

3.     बायाँ विषमता (Negative Skewness): लंबी पूँछ बाईं ओर होती है; बहुलक > माध्यिका > औसत।

विषमता का मापन

विषमता को सांख्यिकीय सूत्रों और मानक मापों के माध्यम से मापा जाता है। प्रमुख माप हैं:Y

·         फ़िशर का माप (Fisher’s Skewness): केंद्रित तीसरे क्षण (Third Central Moment) के आधार पर

समंकों के विश्लेषण में विषमता का महत्व

1.     डेटा वितरण की समझ: विषमता के माध्यम से शोधकर्ता यह समझ सकता है कि डेटा संतुलित है या किसी दिशा में झुका हुआ है। यह निर्णय लेने में सहायक है कि औसत, माध्यिका या बहुलक को मुख्य प्रतिनिधि मान के रूप में लिया जाए।

2.     औसत और माध्यिका का चयन: दायाँ विषमता होने पर माध्यिका औसत की तुलना में डेटा का बेहतर प्रतिनिधि मान हो सकती है। इसी प्रकार, बायाँ विषमता में बहुलक या माध्यिका अधिक उपयुक्त होती है।

3.     आउटलेयर की पहचान: विषमता यह संकेत देती है कि डेटा में असामान्य मान (Outliers) मौजूद हैं या नहीं। अत्यधिक विषमता अक्सर आउटलेयर के कारण होती है।

निष्कर्ष

विषमता किसी भी डेटा सेट के वितरण की तिरछाई और असंतुलन को मापने का महत्वपूर्ण साधन है। यह न केवल औसत, माध्यिका और बहुलक के चयन में सहायक होती है, बल्कि आउटलेयर की पहचान, डेटा की विश्वसनीयता और अनुसंधान निष्कर्षों की सटीकता सुनिश्चित करने में भी मदद करती है। अतः समंकों के विश्लेषण में विषमता का ज्ञान शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

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2.(क) शोध कार्य में सांख्यिकीय डेटा की दृश्यात्मक प्रस्तुति का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।

सांख्यिकी और अनुसंधान में डेटा का संग्रह और विश्लेषण अनिवार्य होता है। परंतु केवल डेटा संग्रह करना पर्याप्त नहीं है; इसे इस प्रकार प्रस्तुत करना आवश्यक है कि पाठक या शोधकर्ता उसे सरलता से समझ सके। इसी संदर्भ में सांख्यिकीय डेटा की दृश्यात्मक प्रस्तुति (Graphical Presentation of Statistical Data) का महत्त्व स्पष्ट होता है। यह प्रक्रिया डेटा को केवल तालिकाओं और संख्याओं के माध्यम से नहीं, बल्कि ग्राफ, चार्ट, आरेख और चित्र के माध्यम से प्रस्तुत करने की तकनीक है।

सांख्यिकीय डेटा की दृश्यात्मक प्रस्तुति का अर्थ

सांख्यिकीय डेटा की दृश्यात्मक प्रस्तुति का अर्थ है आँकड़ों को दृश्य माध्यम—जैसे बार चार्ट, पाई चार्ट, लाइन ग्राफ, हिस्टोग्राम आदि—के माध्यम से प्रस्तुत करना। इसका उद्देश्य डेटा को अधिक स्पष्ट, संक्षिप्त और व्याख्यायित बनाना है। दृश्यात्मक प्रस्तुति से शोधकर्ता केवल संख्याओं के जाल में उलझे बिना पैटर्न, प्रवृत्तियों और सम्बन्धों को तुरंत पहचान सकते हैं।

महत्त्व

1.     डेटा को सरल और स्पष्ट बनाना
कभी-कभी अनुसंधान में बहुत बड़े और जटिल डेटा सेट होते हैं। यदि इन्हें केवल तालिकाओं में प्रस्तुत किया जाए तो उनकी व्याख्या कठिन हो सकती है। ग्राफ और चार्ट के माध्यम से डेटा की प्रवृत्तियाँ और पैटर्न तुरंत स्पष्ट हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, किसी वर्ष में औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि या कमी को लाइन ग्राफ के माध्यम से आसानी से देखा जा सकता है।

2.     तुलनात्मक विश्लेषण में सहायक
विभिन्न वर्गों, समूहों या समय अवधियों के बीच तुलना करना ग्राफिक प्रस्तुति के माध्यम से अधिक आसान होता है। बार चार्ट या स्तंभ चार्ट के माध्यम से विभिन्न शहरों की जनसंख्या, आय या उत्पादन स्तर की तुलना सरलता से की जा सकती है।

3.     निष्कर्ष निकालने में सुविधा
दृश्यात्मक प्रस्तुति से शोधकर्ता और पाठक दोनों ही डेटा का विश्लेषण आसानी से कर सकते हैं। यह उन्हें मुख्य प्रवृत्तियों और असमानताओं को पहचानने में मदद करता है।

4.     ध्यान आकर्षित करना
ग्राफ और चार्ट पाठक का ध्यान मुख्य तथ्यों और प्रवृत्तियों पर केन्द्रित करते हैं। यह शोध प्रतिवेदन, प्रस्तुति या अकादमिक पेपर को अधिक प्रभावशाली और आकर्षक बनाता है।

उपयुक्त उपकरण और प्रकार

सांख्यिकीय डेटा की दृश्यात्मक प्रस्तुति के लिए कई उपकरण उपयोग किए जाते हैं:

·         बार चार्ट (Bar Chart): विभिन्न वर्गों के बीच तुलना के लिए।

·         लाइन ग्राफ (Line Graph): समय श्रृंखला और प्रवृत्ति दिखाने के लिए।

·         पाई चार्ट (Pie Chart): कुल का अनुपात दर्शाने के लिए।

·         हिस्टोग्राम (Histogram): आवृत्ति वितरण को स्पष्ट रूप में दिखाने के लिए।

·         स्कैटर प्लॉट (Scatter Plot): दो चर के बीच सम्बन्ध को दर्शाने के लिए।

निष्कर्ष

सांख्यिकीय डेटा की दृश्यात्मक प्रस्तुति शोध कार्य का एक अत्यंत आवश्यक अंग है। यह डेटा को स्पष्ट, संक्षिप्त, तुलनात्मक और व्याख्यायित बनाती है। इसके माध्यम से अनुसंधान के निष्कर्ष अधिक प्रभावशाली और समझने योग्य बनते हैं। इसलिए शोधकर्ता को डेटा की दृश्यात्मक प्रस्तुति का अधिकतम उपयोग करना चाहिए, ताकि निष्कर्ष सही, सटीक और निर्णय लेने में सहायक हों।

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(ख) X² (काई-स्क्वायर) परीक्षण को लागू करने की शर्तों को स्पष्ट कीजिए।

सांख्यिकी में X² (काई-स्क्वायर) परीक्षण एक गैर-पैरामीट्रिक (Non-Parametric) परीक्षण है, जिसका उपयोग परिणामों में वास्तविक और अपेक्षित आवृत्तियों के बीच भिन्नता की जाँच करने के लिए किया जाता है। इसे मुख्यतः गुणात्मक (Categorical) डेटा के विश्लेषण में प्रयोग किया जाता है। हालांकि यह परीक्षण सरल है, इसे लागू करने के लिए कुछ आवश्यक शर्तों का पालन करना अनिवार्य है।

परीक्षण का उद्देश्य

परीक्षण का मुख्य उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि कोई डेटा सेट स्वतंत्रता (Independence) या समानुपात (Goodness of Fit) की शर्तों के अनुसार है या नहीं। उदाहरण के लिए:

1.     विभिन्न वर्गों में जनसंख्या का वितरण अपेक्षित वितरण के अनुरूप है या नहीं।

2.     दो चर (Variables) एक-दूसरे पर स्वतंत्र हैं या संबंधित।

परीक्षण लागू करने की शर्तें

1.     डेटा गुणात्मक होना चाहिए (Categorical Data)
परीक्षण केवल गुणात्मक या वर्गीकृत डेटा पर लागू होता है। इसमें डेटा को श्रेणियों (Categories) में विभाजित किया जाता है। जैसे लिंग (पुरुष/महिला), रंग (लाल/नीला/हरा), शिक्षा स्तर (प्राथमिक/माध्यमिक/स्नातक)।

2.     परिणाम स्वतंत्र होने चाहिए (Independence of Observations)
प्रत्येक अवलोकन (Observation) स्वतंत्र होना चाहिए। इसका अर्थ है कि किसी एक व्यक्ति या इकाई का परिणाम दूसरे के परिणाम को प्रभावित नहीं करता।

3.     प्रत्येक श्रेणी में अपेक्षित आवृत्ति पर्याप्त होनी चाहिए (Expected Frequency)
परीक्षण की विश्वसनीयता के लिए प्रत्येक श्रेणी में अपेक्षित आवृत्ति कम से कम 5 होनी चाहिए। यदि अपेक्षित आवृत्ति 5 से कम है, तो परिणाम कम विश्वसनीय होंगे और संशोधित या समूहबद्ध श्रेणियों का उपयोग करना आवश्यक हो सकता है।

4.     नमूना आकार पर्याप्त होना चाहिए (Adequate Sample Size)
चूँकि परीक्षण आवृत्तियों पर आधारित है, अतः पर्याप्त नमूना आकार आवश्यक है। बहुत छोटे नमूने परीक्षण की संवेदनशीलता और निष्कर्षों की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकते हैं।

निष्कर्ष

परीक्षण सांख्यिकी में गुणात्मक डेटा के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है। हालांकि, इसे लागू करने के लिए आवश्यक शर्तों—जैसे स्वतंत्र अवलोकन, पर्याप्त अपेक्षित आवृत्ति, उपयुक्त नमूना आकार और श्रेणियों की स्पष्टता—का पालन अनिवार्य है। इन शर्तों को पूरा करने से ही परीक्षण के निष्कर्ष विश्वसनीय और सही माने जाते हैं।

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3. निम्नलिखित पर संक्षेप टिप्पणी कीजिए:

(क) “डेटा वर्गीकरण, डेटा सारणीकरण का आधार प्रदान करता है।"

डेटा (आँकड़े) किसी भी सामाजिक, आर्थिक अथवा वैज्ञानिक अनुसंधान का मूल आधार होते हैं। प्रारंभिक अवस्था में उपलब्ध डेटा प्रायः कच्चा, असंगठित और जटिल होता है। ऐसे डेटा को अर्थपूर्ण बनाने तथा उसके विश्लेषण को सरल करने के लिए डेटा वर्गीकरण और डेटा सारणीकरण की प्रक्रियाएँ अपनाई जाती हैं। इन दोनों के बीच गहरा और अविभाज्य संबंध है।

डेटा वर्गीकरण का अर्थ

डेटा वर्गीकरण (Data Classification) से आशय समान विशेषताओं वाले आँकड़ों को विभिन्न वर्गों या समूहों में बाँटने से है। यह वर्गीकरण गुणात्मक, मात्रात्मक, कालानुक्रमिक या भौगोलिक आधार पर किया जा सकता है। वर्गीकरण का मुख्य उद्देश्य विशाल और अव्यवस्थित डेटा को सुव्यवस्थित तथा समझने योग्य बनाना है।

डेटा सारणीकरण का अर्थ

डेटा सारणीकरण (Data Tabulation) वह प्रक्रिया है, जिसमें वर्गीकृत डेटा को पंक्तियों और स्तंभों के माध्यम से तालिका के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सारणीकरण से डेटा संक्षिप्त, स्पष्ट और तुलनात्मक रूप में सामने आता है, जिससे उसका अध्ययन और विश्लेषण सरल हो जाता है।

वर्गीकरण और सारणीकरण का संबंध

डेटा सारणीकरण की प्रक्रिया डेटा वर्गीकरण पर पूर्णतः आधारित होती है। जब तक डेटा को पहले उपयुक्त वर्गों में विभाजित नहीं किया जाता, तब तक उसे सारणीबद्ध करना संभव नहीं होता। वर्गीकरण यह तय करता है कि सारणी की पंक्तियाँ और स्तंभ किन आधारों पर होंगे। इस प्रकार वर्गीकरण सारणीकरण की रूपरेखा प्रदान करता है।

निष्कर्ष

अतः स्पष्ट है कि डेटा वर्गीकरण एक मौलिक और अनिवार्य प्रक्रिया है, जो डेटा सारणीकरण को संभव, व्यवस्थित और प्रभावी बनाती है। बिना वर्गीकरण के सारणीकरण अर्थहीन हो जाएगा। इसलिए यह कथन पूर्णतः उचित है कि डेटा वर्गीकरण, डेटा सारणीकरण का आधार प्रदान करता है।”

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(ख) "किसी डेटा सेट का प्रतिनिधि मान, उस डेटा का केंद्रीय मान दर्शाने वाली संख्या होती है।"

सांख्यिकी में डेटा सेट का विश्लेषण करने के लिए यह आवश्यक होता है कि उसके समग्र स्वरूप को संक्षेप में समझा जा सके। बड़े और बिखरे हुए आँकड़ों को समझने के लिए किसी एक ऐसी संख्या की आवश्यकता होती है, जो पूरे डेटा का प्रतिनिधित्व कर सके। इसी संदर्भ में प्रतिनिधि मान (Representative Value) अथवा केंद्रीय प्रवृत्ति का मान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

प्रतिनिधि मान का अर्थ

प्रतिनिधि मान से आशय उस संख्या से है, जो किसी डेटा सेट के केंद्रीय या सामान्य मान को दर्शाती है। यह वह मान होता है जिसके आसपास अधिकांश आँकड़े केंद्रित होते हैं। प्रतिनिधि मान पूरे डेटा सेट का संक्षिप्त और सार्थक रूप प्रस्तुत करता है, जिससे डेटा की मुख्य प्रवृत्ति को समझना आसान हो जाता है।

प्रतिनिधि मान के प्रमुख प्रकार

प्रतिनिधि मान को सामान्यतः केंद्रीय प्रवृत्ति के मापों के रूप में समझा जाता है। इसके प्रमुख प्रकार हैं—अंकगणितीय माध्य (Arithmetic Mean), माध्यिका (Median) और बहुलक (Mode)। अंकगणितीय माध्य सभी मानों का औसत होता है, माध्यिका वह मान है जो डेटा को दो समान भागों में बाँट देता है, जबकि बहुलक वह मान होता है जो सबसे अधिक बार आता है। परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त प्रतिनिधि मान का चयन किया जाता है।

प्रतिनिधि मान का महत्व

प्रतिनिधि मान डेटा को सरल, संक्षिप्त और तुलनात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। इससे विभिन्न डेटा सेटों की तुलना करना आसान हो जाता है। सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक एवं वैज्ञानिक अनुसंधानों में प्रतिनिधि मानों का व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है।

निष्कर्ष

अतः यह स्पष्ट है कि किसी डेटा सेट का प्रतिनिधि मान उस डेटा की केंद्रीय प्रवृत्ति को दर्शाने वाली एक महत्वपूर्ण संख्या होती है। यह डेटा के समग्र स्वरूप को समझने और विश्लेषण करने में सहायक होता है, इसलिए सांख्यिकीय अध्ययन में इसका विशेष महत्व है।

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(ग) “सांख्यिकी मिट्टी की तरह है, जिससे देवता भी बनाया जा सकता है और राक्षस भी।"

सांख्यिकी आधुनिक युग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विज्ञान है, जिसका उपयोग सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में व्यापक रूप से किया जाता है। यह कथन कि “सांख्यिकी मिट्टी की तरह है, जिससे देवता भी बनाया जा सकता है और राक्षस भी” सांख्यिकी की दोहरी प्रकृति को उजागर करता है। इसका आशय यह है कि सांख्यिकी का उपयोग सही उद्देश्य और विधि से किया जाए तो यह अत्यंत लाभकारी सिद्ध होती है, किंतु गलत या पक्षपातपूर्ण उपयोग से यह हानिकारक भी बन सकती है।

सांख्यिकी का सकारात्मक उपयोग (देवता)

सांख्यिकी का सही और वैज्ञानिक उपयोग समाज और राष्ट्र के विकास में सहायक होता है। सरकारें जनगणना, योजना निर्माण, नीति निर्धारण और संसाधनों के उचित वितरण के लिए सांख्यिकीय आँकड़ों का सहारा लेती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और उद्योग के क्षेत्र में भी सांख्यिकी तथ्यों पर आधारित निर्णय लेने में मदद करती है। इस प्रकार, जब सांख्यिकी का प्रयोग निष्पक्षता, सत्यता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किया जाता है, तो यह समाज के लिए वरदान सिद्ध होती है।

सांख्यिकी का नकारात्मक उपयोग (राक्षस)

इसके विपरीत, यदि आँकड़ों का संग्रह, वर्गीकरण या प्रस्तुतीकरण जानबूझकर गलत ढंग से किया जाए, तो सांख्यिकी भ्रम और धोखे का साधन बन सकती है। अपूर्ण आँकड़े, गलत निष्कर्ष, भ्रामक ग्राफ और पक्षपातपूर्ण व्याख्या लोगों को गुमराह कर सकती है। राजनीति, विज्ञापन और व्यापार में कई बार सांख्यिकी का दुरुपयोग जनमत को प्रभावित करने के लिए किया जाता है, जिससे यह “राक्षस” का रूप धारण कर लेती है।

निष्कर्ष

अतः यह स्पष्ट है कि सांख्यिकी स्वयं न तो अच्छी है और न बुरी, बल्कि उसका स्वरूप उसके उपयोग पर निर्भर करता है। सही हाथों में यह देवता बनती है और गलत हाथों में राक्षस। इसलिए सांख्यिकी का प्रयोग सदैव ईमानदारी, सावधानी और वैज्ञानिक विवेक के साथ किया जाना चाहिए।

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(घ) “अंक कभी झूठ नहीं बोलते, लेकिन झूठे व्यक्ति अंक बदलते है।"

सांख्यिकी और आँकड़ों का उद्देश्य वास्तविक तथ्यों को संक्षिप्त, स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ रूप में प्रस्तुत करना होता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि अंक या आँकड़े सत्य का प्रतिनिधित्व करते हैं और स्वयं में निष्पक्ष होते हैं। इसी संदर्भ में यह कथन कि “अंक कभी झूठ नहीं बोलते, लेकिन झूठे व्यक्ति अंक बदलते हैं” आँकड़ों की निष्पक्षता और मानव की पक्षपातपूर्ण प्रवृत्ति के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है।

अंकों की सत्यता और निष्पक्षता

अंक स्वयं में न तो अच्छे होते हैं और न ही बुरे। वे केवल वास्तविक घटनाओं, स्थितियों या तथ्यों का संख्यात्मक रूप होते हैं। यदि आँकड़ों का संग्रह वैज्ञानिक पद्धति से, बिना किसी पूर्वाग्रह के किया जाए, तो वे वास्तविकता को सही रूप में दर्शाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि अंक कभी झूठ नहीं बोलते, क्योंकि वे वस्तुनिष्ठ सत्य पर आधारित होते हैं।

अंकों का दुरुपयोग

हालाँकि, आँकड़ों की प्रस्तुति और व्याख्या मानव द्वारा की जाती है। यदि व्यक्ति स्वार्थ, अज्ञानता या दुर्भावना से प्रेरित होकर आँकड़ों में हेरफेर करता है, चयनात्मक डेटा प्रस्तुत करता है या गलत निष्कर्ष निकालता है, तो वही अंक झूठ का माध्यम बन जाते हैं। आँकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना या भ्रामक ग्राफ बनाना इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

सांख्यिकी में नैतिकता का महत्व

इस कथन से यह भी स्पष्ट होता है कि सांख्यिकी में नैतिकता और ईमानदारी का विशेष महत्व है। सही निष्कर्षों के लिए आवश्यक है कि आँकड़ों का संग्रह, वर्गीकरण, विश्लेषण और प्रस्तुतीकरण सत्यनिष्ठा से किया जाए। अन्यथा, आँकड़े समाज को गुमराह कर सकते हैं।

निष्कर्ष

अतः यह कथन पूर्णतः सत्य है कि अंक स्वयं कभी झूठ नहीं बोलते, किंतु उन्हें प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति यदि ईमानदार न हो, तो वही अंक झूठ का रूप ले सकते हैं। इसलिए आँकड़ों का प्रयोग सदैव सत्य, विवेक और नैतिकता के साथ किया जाना चाहिए।

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4. निम्नलिखित व्यक्तव्यो की व्याख्या संक्षेप में कीजिये :

(क) समय श्रंखला (Time Series)

सांख्यिकी में समय श्रंखला (Time Series) का विशेष महत्व है। जब किसी घटना, तथ्य या चर से संबंधित आँकड़े विभिन्न समय अवधियों में एकत्र किए जाते हैं और उन्हें समय के क्रम में व्यवस्थित किया जाता है, तो उसे समय श्रंखला कहा जाता है। यह आर्थिक, सामाजिक और व्यावसायिक अध्ययनों में प्रवृत्तियों और परिवर्तनों को समझने का एक महत्वपूर्ण साधन है।

समय श्रंखला का अर्थ

समय श्रंखला से तात्पर्य उन आँकड़ों से है, जो किसी निश्चित चर के मानों को अलग-अलग समय बिंदुओं या समय अंतरालों—जैसे दिन, माह, वर्ष आदि—में दर्शाते हैं। इसमें समय को स्वतंत्र चर माना जाता है, जबकि अन्य चर समय के अनुसार बदलते हैं। उदाहरण के रूप में, किसी देश की वार्षिक जनसंख्या, मासिक उत्पादन या दैनिक तापमान एक समय श्रंखला के उदाहरण हैं।

समय श्रंखला के घटक

समय श्रंखला के प्रमुख चार घटक माने जाते हैं—

1.     प्रवृत्ति (Trend): दीर्घकालीन अवधि में आँकड़ों की सामान्य दिशा।

2.     मौसमी परिवर्तन (Seasonal Variation): वर्ष के भीतर नियमित रूप से होने वाले परिवर्तन।

3.     चक्रीय परिवर्तन (Cyclical Variation): लंबी अवधि में होने वाले उतार-चढ़ाव, जो प्रायः आर्थिक चक्रों से संबंधित होते हैं।

समय श्रंखला का महत्व

समय श्रंखला के अध्ययन से भविष्य की प्रवृत्तियों का अनुमान लगाया जा सकता है। यह योजना निर्माण, पूर्वानुमान, नीति निर्धारण तथा व्यावसायिक निर्णयों में सहायक होती है।

निष्कर्ष

अतः समय श्रंखला आँकड़ों के विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण साधन है, जिसके माध्यम से समय के साथ होने वाले परिवर्तनों को समझा और भविष्य के लिए उपयुक्त निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

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(ख) सूचकांक संख्याओं के निर्माण में समस्याएँ

सूचकांक संख्याएँ (Index Numbers) सांख्यिकी का एक महत्वपूर्ण उपकरण हैं, जिनका उपयोग मूल्य स्तर, उत्पादन, जीवन-यापन लागत तथा आर्थिक परिवर्तनों को मापने के लिए किया जाता है। यद्यपि सूचकांक संख्याएँ जटिल आर्थिक घटनाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करती हैं, तथापि इनके निर्माण में अनेक व्यावहारिक और सैद्धांतिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

आधार वर्ष का चयन

सूचकांक संख्या के निर्माण में सबसे पहली समस्या उपयुक्त आधार वर्ष (Base Year) का चयन है। आधार वर्ष सामान्य, स्थिर और प्रतिनिधिक होना चाहिए। यदि आधार वर्ष असामान्य हो—जैसे अकाल या युद्ध का समय—तो सूचकांक संख्या वास्तविक परिवर्तनों को सही ढंग से नहीं दर्शा पाएगी।

वस्तुओं का चयन

सूचकांक में शामिल की जाने वाली वस्तुओं का चयन भी एक कठिन समस्या है। वस्तुएँ प्रतिनिधिक और सामान्य उपभोग की होनी चाहिए। सीमित या पक्षपातपूर्ण चयन से सूचकांक संख्या भ्रामक हो सकती है।

मूल्य और आँकड़ों की उपलब्धता

विश्वसनीय और तुलनीय मूल्य आँकड़ों का संग्रह एक बड़ी समस्या है। विभिन्न स्थानों और समयों पर गुणवत्ता, पैकिंग और माप की इकाइयों में अंतर होने से आँकड़ों की शुद्धता प्रभावित होती है।

भार (Weights) का निर्धारण

सूचकांक में वस्तुओं को दिए जाने वाले भारों का निर्धारण भी जटिल होता है। गलत या पुराने भार वास्तविक उपभोग संरचना को नहीं दर्शाते, जिससे सूचकांक की उपयोगिता कम हो जाती है।

सूत्र का चयन

विभिन्न प्रकार के सूत्र—जैसे लास्पेयर्स, पास्चे, फिशर—उपलब्ध हैं। किस सूत्र का चयन किया जाए, यह भी एक समस्या है, क्योंकि प्रत्येक सूत्र के अपने गुण और सीमाएँ होती हैं।

निष्कर्ष

अतः स्पष्ट है कि सूचकांक संख्याओं का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें आधार वर्ष, वस्तु चयन, भार निर्धारण और सूत्र चयन जैसी अनेक समस्याएँ सम्मिलित हैं। फिर भी सावधानी और वैज्ञानिक विधि से इन समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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(ग) प्रायिकता के बेयस प्रमेय के उपयोग

प्रायिकता (Probability) सांख्यिकी और गणित का एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो किसी घटना के घटित होने की संभावना को मापती है। बेयस प्रमेय (Bayes’ Theorem) थॉमस बेयस द्वारा प्रतिपादित एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसका उपयोग अप्रत्यक्ष या पूर्व जानकारी (Prior Information) के आधार पर किसी घटना की संभाव्यता (Posterior Probability) ज्ञात करने के लिए किया जाता है। यह प्रमेय विशेष रूप से उन परिस्थितियों में उपयोगी है जहाँ डेटा या जानकारी आंशिक रूप से उपलब्ध हो।

बेयस प्रमेय का सिद्धांत

बेयस प्रमेय का मूल विचार यह है कि किसी घटना AAA की संभावना को, जब यह ज्ञात हो कि दूसरी घटना BBB घटित हो चुकी है, निम्नलिखित सूत्र द्वारा ज्ञात किया जा सकता है:

प्रमेय के उपयोग

1.     चिकित्सा क्षेत्र में: किसी रोग की संभावना को जांच परिणाम के आधार पर निर्धारित करने के लिए। उदाहरण: किसी टेस्ट के पॉजिटिव परिणाम पर रोग की वास्तविक संभावना ज्ञात करना।

2.     वित्तीय विश्लेषण में: निवेश या जोखिम प्रबंधन में भविष्यवाणी और निर्णय लेने के लिए।

3.     मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में: स्पैम फिल्टर, वर्गीकरण और पैटर्न पहचान में प्रयोग।

4.     गुणवत्ता नियंत्रण: उत्पादन प्रक्रिया में दोष की संभावना का अनुमान लगाने के लिए।

निष्कर्ष

बेयस प्रमेय वास्तविक जीवन में जटिल निर्णयों और अनुमान के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह अप्रत्यक्ष और आंशिक जानकारी से सही निष्कर्ष निकालने की क्षमता प्रदान करता है। इस प्रकार, प्रायिकता के अध्ययन और अनुप्रयोग में बेयस प्रमेय एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में कार्य करता है।

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(घ) सांख्यिकीय परिकल्पना परीक्षण की प्रक्रिया

सांख्यिकीय परिकल्पना परीक्षण (Statistical Hypothesis Testing) सांख्यिकी का एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जिसका उपयोग किसी दावे या अनुमान (Hypothesis) की सच्चाई का परीक्षण करने के लिए किया जाता है। यह विधि अनुसंधान, विज्ञान, अर्थशास्त्र और सामाजिक विज्ञान में निर्णय लेने में सहायक होती है।

परिकल्पना परीक्षण का अर्थ

परिकल्पना परीक्षण में किसी जनसंख्या (Population) के गुण या औसत के संबंध में पूर्वनिर्धारित दावे की सत्यता का आंकड़ों के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है। इसे दो प्रकार की परिकल्पनाओं के रूप में व्यक्त किया जाता है:

1.     शून्य परिकल्पना (Null Hypothesis, H₀): यह सामान्यतः मौजूदा स्थिति या कोई पूर्व मान्यता को दर्शाती है।

2.     वैकल्पिक परिकल्पना (Alternative Hypothesis, H₁): यह शून्य परिकल्पना का प्रतिवाद करती है और अनुसंधानकर्ता द्वारा साबित की जाने वाली धारणा होती है।

परिकल्पना परीक्षण की प्रक्रिया

सांख्यिकीय परिकल्पना परीक्षण निम्नलिखित चरणों में किया जाता है:

1.     परिकल्पना का निर्धारण: शून्य और वैकल्पिक परिकल्पना स्पष्ट रूप से स्थापित की जाती है।

2.     प्रयाप्त डेटा का संग्रह: नमूना (Sample) एकत्रित कर सांख्यिकीय परीक्षण के लिए तैयार किया जाता है।

3.     उपयुक्त परीक्षण का चयन: डेटा के प्रकार और परीक्षण के उद्देश्य के अनुसार t-टेस्ट, z-टेस्ट, χ²-टेस्ट आदि का चयन किया जाता है।

निष्कर्ष

सांख्यिकीय परिकल्पना परीक्षण एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जो अनुसंधान निष्कर्षों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करती है। यह किसी दावे को मात्र अनुमान से सटीक सत्यापित परिणाम में बदलने का उपकरण प्रदान करता है।

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5. निम्नलिखित में अंतर कीजिए :

(क) सर्वेक्षण विधि और प्रयोगात्मक विधि

सांख्यिकी और अनुसंधान में डेटा संग्रह और विश्लेषण के लिए विभिन्न विधियों का उपयोग किया जाता है। इनमें सर्वेक्षण विधि (Survey Method) और प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) प्रमुख हैं। दोनों विधियाँ अनुसंधान उद्देश्यों, डेटा प्रकार और अध्ययन परिस्थितियों के अनुसार अपनाई जाती हैं।

सर्वेक्षण विधि

सर्वेक्षण विधि में किसी जनसंख्या या समूह के बारे में जानकारी सीधे उनसे प्राप्त की जाती है। यह विधि प्रायः सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, जनसांख्यिकी और व्यवसायिक अध्ययन में उपयोग की जाती है।

मुख्य विशेषताएँ:

1.     डेटा का संग्रह प्रश्नावली, साक्षात्कार या प्रेक्षण के माध्यम से किया जाता है।

2.     उद्देश्य जनसंख्या की वर्तमान स्थिति, व्यवहार और राय का अवलोकन करना होता है।

3.     निष्कर्ष सामान्यतः वर्णनात्मक और सांख्यिकीय विश्लेषण पर आधारित होते हैं।

उदाहरण: किसी शहर में बेरोजगारी दर का सर्वेक्षण।

प्रयोगात्मक विधि

प्रयोगात्मक विधि में नियंत्रित परिस्थितियों के तहत किसी घटना या चर का अध्ययन किया जाता है। यह मुख्यतः विज्ञान, शिक्षा और मनोविज्ञान में प्रयोग होती है।

मुख्य विशेषताएँ:

1.     प्रयोगकर्ता स्वतंत्र चर (Independent Variable) को नियंत्रित करता है और निर्भर चर (Dependent Variable) पर प्रभाव का अध्ययन करता है।

2.     यह कारण-प्रभाव (Cause-Effect) संबंध स्थापित करने में सहायक होती है।

3.     परिणाम अधिक सटीक और विश्वसनीय होते हैं, क्योंकि अन्य कारकों को नियंत्रित किया जाता है।

उदाहरण: किसी दवा का प्रभाव परीक्षण करने के लिए प्रयोगशाला में नियंत्रित प्रयोग।

निष्कर्ष

सर्वेक्षण विधि और प्रयोगात्मक विधि दोनों अनुसंधान के महत्वपूर्ण उपकरण हैं। सर्वेक्षण विधि समाज और जनसंख्या के व्यवहार को समझने में सहायक है, जबकि प्रयोगात्मक विधि कारण-प्रभाव संबंध स्थापित करने में उपयोगी है। अनुसंधान के उद्देश्य और परिस्थितियों के अनुसार दोनों विधियों का चयन किया जाता है।

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(ख) अनुसूची और प्रश्नावली

सांख्यिकी और अनुसंधान में डेटा एकत्र करने के लिए विभिन्न उपकरणों का उपयोग किया जाता है। अनुसूची (Schedule) और प्रश्नावली (Questionnaire) दो प्रमुख उपकरण हैं, जिनके माध्यम से अनुसंधानकर्ता आवश्यक जानकारी संग्रहीत करते हैं। दोनों का उद्देश्य समान होता है—अर्थात, अध्ययन की जनसंख्या से तथ्यात्मक डेटा प्राप्त करना—लेकिन इनके उपयोग और संरचना में अंतर होता है।

अनुसूची (Schedule)

अनुसूची वह डेटा संग्रह उपकरण है जिसे अनुसंधानकर्ता स्वयं या प्रशिक्षित सहायक द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रश्न पूछकर भरता है। यह विधि उन परिस्थितियों में उपयोगी होती है जहाँ उत्तरदाता प्रश्नों का उत्तर स्वयं देने में असमर्थ हों या साक्षात्कार आवश्यक हो।

मुख्य विशेषताएँ:

1.     अनुसूची अनुसंधानकर्ता द्वारा भरी जाती है।

2.     उत्तरदाता और अनुसंधानकर्ता के बीच प्रत्यक्ष संवाद होता है।

3.     यह कठिनाई वाले, जटिल या तकनीकी प्रश्नों के लिए अधिक उपयुक्त है।

उदाहरण: किसी परिवार में आय और खर्च के विवरण के लिए घर-घर जाकर अनुसूची भरना।

प्रश्नावली (Questionnaire)

प्रश्नावली एक लिखित उपकरण है, जिसमें उत्तरदाता स्वयं प्रश्नों का उत्तर लिखता है। यह विधि तब अधिक उपयुक्त होती है जब उत्तरदाता साक्षात्कार के लिए उपलब्ध हों या बड़े जनसंख्या समूह से डेटा संग्रह करना हो।

मुख्य विशेषताएँ:

1.     प्रश्नावली स्वयं उत्तरदाता द्वारा भरी जाती है।

2.     अनुसंधानकर्ता की प्रत्यक्ष उपस्थिति आवश्यक नहीं।

3.     प्रश्न स्पष्ट, संक्षिप्त और समझने योग्य होने चाहिए।

उदाहरण: किसी विश्वविद्यालय के छात्रों में अध्ययन आदतों पर लिखित प्रश्नावली भरवाना।

निष्कर्ष

अनुसूची और प्रश्नावली दोनों ही अनुसंधान के महत्वपूर्ण उपकरण हैं। अनुसूची तब उपयोगी है जब प्रत्यक्ष साक्षात्कार संभव हो, जबकि प्रश्नावली बड़े जनसंख्या समूहों से डेटा संग्रह में सहायक होती है। अनुसंधान का उद्देश्य, उत्तरदाता की क्षमता और परिस्थितियों के अनुसार सही उपकरण का चयन किया जाता है।

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(ग) सहसंबंध और प्रतीपगमन

सांख्यिकी और अनुसंधान में दो महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं—सहसंबंध (Correlation) और प्रतीपगमन (Regression)। ये दोनों तकनीकें किसी डेटा सेट में दो या दो से अधिक चर के बीच संबंधों को समझने और विश्लेषित करने में सहायक होती हैं। यद्यपि दोनों संबंधित हैं, परंतु उद्देश्य और उपयोग में अंतर है।

सहसंबंध (Correlation)

सहसंबंध से आशय दो या दो से अधिक चर (Variables) के बीच संबंध की दिशा और तीव्रता को मापने से है। यह बताता है कि यदि एक चर में परिवर्तन होता है तो दूसरा चर किस प्रकार प्रभावित होता है।

मुख्य विशेषताएँ:

1.     सहसंबंध मात्र संबंध की दिशा और शक्ति को बताता है, कारण-प्रभाव नहीं।

2.     इसे सहसंबंध गुणांक (Correlation Coefficient) से मापा जाता है।

3.     सहसंबंध सकारात्मक (Positive) या नकारात्मक (Negative) हो सकता है।

उदाहरण: छात्रों के अध्ययन समय और परीक्षा में प्राप्त अंकों के बीच संबंध।

प्रतीपगमन (Regression)

प्रतीपगमन एक सांख्यिकीय तकनीक है, जिसका उपयोग किसी निर्भर चर (Dependent Variable) पर स्वतंत्र चर (Independent Variable) के प्रभाव को मापने और भविष्यवाणी करने के लिए किया जाता है।

मुख्य विशेषताएँ:

1.     प्रतीपगमन कारण-प्रभाव संबंध को दर्शाता है।

2.     यह भविष्यवाणी और निर्णय लेने में सहायक होता है।

3.     साधारण प्रतीपगमन में एक स्वतंत्र और एक निर्भर चर होता है, जबकि बहु-प्रतीपगमन में कई स्वतंत्र चर शामिल होते हैं।

उदाहरण: किसी छात्र के अध्ययन घंटे के आधार पर भविष्य में प्राप्त अंकों का अनुमान।

निष्कर्ष

सहसंबंध और प्रतीपगमन दोनों सांख्यिकी में महत्वपूर्ण उपकरण हैं। सहसंबंध केवल संबंध को मापता है, जबकि प्रतीपगमन कारण-प्रभाव और भविष्यवाणी में सहायक होता है। अनुसंधान के उद्देश्य के अनुसार इनका चयन किया जाता है।

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(घ) खण्डित और सतत आवृति वितरण

सांख्यिकी में डेटा का विश्लेषण करने के लिए उसे विभिन्न प्रकार के आवृति वितरण (Frequency Distribution) में व्यवस्थित किया जाता है। आवृति वितरण डेटा को समझने और विश्लेषित करने का एक महत्वपूर्ण साधन है। मुख्यतः इसे दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है—खण्डित (Discrete) और सतत (Continuous) आवृति वितरण

खण्डित आवृति वितरण (Discrete Frequency Distribution)

खण्डित आवृति वितरण में केवल उन मानों को शामिल किया जाता है जो निश्चित और गिनती योग्य होते हैं। यानी, इनमें बीच के कोई मान नहीं होते।

मुख्य विशेषताएँ:

1.     मान केवल पूर्णांक या गिनती योग्य संख्या होते हैं।

2.     डेटा के प्रत्येक मान के लिए अलग-अलग आवृत्तियाँ (Frequency) निर्धारित की जाती हैं।

3.     यह वितरण सरल और स्पष्ट होता है, जो मुख्यतः गुणात्मक या गिनती योग्य डेटा के लिए उपयुक्त है।

उदाहरण: किसी कक्षा में छात्रों की संख्या, किसी परिवार के बच्चों की संख्या।

सतत आवृति वितरण (Continuous Frequency Distribution)

सतत आवृति वितरण में मान किसी निश्चित सीमा के भीतर किसी भी वास्तविक संख्या हो सकते हैं। इसे आम तौर पर वर्गांतर (Class Intervals) में विभाजित किया जाता है।

मुख्य विशेषताएँ:

1.     मान किसी भी वास्तविक संख्या (Integer या Decimal) के रूप में हो सकते हैं।

2.     आवृत्तियाँ वर्गों में प्रदर्शित की जाती हैं।

3.     यह वितरण अधिक जटिल डेटा जैसे लंबाई, वजन, आयु आदि के लिए उपयुक्त है।

उदाहरण: किसी शहर में लोगों की आयु, किसी वस्तु का वजन।

निष्कर्ष

खण्डित और सतत आवृति वितरण दोनों ही डेटा के संगठन और विश्लेषण में महत्वपूर्ण हैं। खण्डित वितरण गिनती योग्य डेटा के लिए उपयुक्त है, जबकि सतत वितरण मापनीय और जटिल डेटा के लिए। अनुसंधान और विश्लेषण के उद्देश्य के अनुसार इनके उपयोग का चयन किया जाता है।

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