100% Free IGNOU BPSC-105 Solved Assignment 2024-25 Pdf / hardcopy

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सत्रीय कार्य - I

निम्न वर्णनात्मक श्रेणी प्रश्नों के उत्तर लगभग 500 शब्दों (प्रत्येक ) में दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 20 अंकों का है।

1.राजनीति विज्ञान के अध्ययन में प्रयुक्त होने वाली तुलनात्मक पद्धतियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए

राजनीति विज्ञान में तुलनात्मक पद्धतियाँ विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों, संस्थानों, और प्रक्रियाओं की तुलना करने के लिए उपयोग की जाती हैं। इन पद्धतियों से राजनीतिक नीतियों और संरचनाओं के बीच अंतर और समानताएँ समझने में मदद मिलती है। तुलनात्मक पद्धतियाँ राजनीति विज्ञान के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि वे विभिन्न राजनीतिक संदर्भों और प्रणालियों की गहरी समझ प्रदान करती हैं।

तुलनात्मक पद्धतियों के प्रकार:

वर्णात्मक पद्धति (Descriptive Method):

वर्णन: इस पद्धति में विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों, संस्थानों, और प्रक्रियाओं का वर्णन किया जाता है। इसका उद्देश्य विभिन्न राजनीतिक परिप्रेक्ष्यों को स्पष्ट और विस्तृत रूप से समझाना होता है।

उदाहरण: विभिन्न देशों के चुनावी प्रणालियों का वर्णन, विभिन्न शासन प्रणालियों (जैसे लोकतंत्र, अधिनायकवाद) का विवरण।

विश्लेषणात्मक पद्धति (Analytical Method):

विश्लेषण: इस पद्धति में विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों और उनके कार्यप्रणालियों का विश्लेषण किया जाता है। इसका उद्देश्य यह समझना होता है कि विभिन्न तत्व कैसे आपस में संबंधित हैं और किस प्रकार वे राजनीतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं।

उदाहरण: चुनावी प्रणाली का विश्लेषण करना कि कैसे यह चुनाव परिणामों को प्रभावित करता है, या विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनावी रणनीतियों का विश्लेषण।

मूल्यांकनात्मक पद्धति (Evaluative Method):

मूल्यांकन: इस पद्धति में विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों और प्रक्रियाओं का मूल्यांकन किया जाता है, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि वे कितनी प्रभावी या कुशल हैं। इसमें विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों की सफलता या विफलता का मूल्यांकन शामिल होता है।

उदाहरण: एक निश्चित चुनावी प्रणाली की सफलता का मूल्यांकन, विभिन्न सार्वजनिक नीतियों के प्रभाव का मूल्यांकन।

संगठित तुलनात्मक पद्धति (Systematic Comparative Method):

तुलना: इस पद्धति में विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों की संगठित और व्यवस्थित तुलना की जाती है। यह पद्धति सामान्यत: एक निर्धारित ढांचे के तहत की जाती है, ताकि विभिन्न प्रणालियों के बीच सुसंगत और सटीक तुलना की जा सके।

उदाहरण: विभिन्न देशों के राजनीतिक संस्थानों की तुलना, जैसे अमेरिका और ब्रिटेन के संसदीय प्रणाली की तुलना।

ऐतिहासिक तुलनात्मक पद्धति (Historical Comparative Method):

इतिहास: इस पद्धति में ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों और प्रक्रियाओं की तुलना की जाती है। यह पद्धति ऐतिहासिक घटनाओं और परिवर्तनों के आधार पर विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों की तुलना करती है।

उदाहरण: फ्रांसीसी और अमेरिकी क्रांतियों की तुलना, विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों में राजनीतिक परिवर्तनों की तुलना।

सांस्थानिक पद्धति (Institutional Method):

संस्थानों का अध्ययन: इस पद्धति में विभिन्न राजनीतिक संस्थानों (जैसे विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) की तुलना की जाती है। इसका उद्देश्य यह समझना होता है कि विभिन्न संस्थान कैसे कार्य करते हैं और उनके प्रभाव क्या होते हैं।

उदाहरण: विभिन्न देशों की विधायिका की संरचना और कार्यप्रणाली की तुलना।

संवैधानिक पद्धति (Constitutional Method):

संविधान: इस पद्धति में विभिन्न देशों के संविधान की तुलना की जाती है। इसमें संविधान की संरचना, प्रावधान, और राजनीतिक अधिकारों की तुलना शामिल होती है।

उदाहरण: भारत और अमेरिका के संविधान की तुलना, संविधान के विभिन्न प्रावधानों का विश्लेषण।

वैश्विक तुलनात्मक पद्धति (Global Comparative Method):

वैश्विक परिप्रेक्ष्य: इस पद्धति में विभिन्न देशों की राजनीतिक प्रणालियों और नीतियों की वैश्विक स्तर पर तुलना की जाती है। यह पद्धति वैश्विक संदर्भ में राजनीतिक प्रक्रियाओं को समझने में मदद करती है।

उदाहरण: विभिन्न देशों के मानवाधिकार नीतियों की वैश्विक तुलना, वैश्विक आर्थिक नीतियों की तुलना।

तुलनात्मक पद्धतियों के लाभ:

समझ में वृद्धि: तुलनात्मक पद्धतियाँ विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों और प्रक्रियाओं की गहरी समझ प्रदान करती हैं।

नीति निर्माण: ये पद्धतियाँ नीतिगत निर्णयों को बेहतर बनाने में मदद करती हैं, क्योंकि वे विभिन्न प्रणालियों की सफलताओं और विफलताओं का मूल्यांकन करती हैं।

सुधार: तुलनात्मक अध्ययन से प्राप्त जानकारी का उपयोग राजनीतिक सुधारों के लिए किया जा सकता है, ताकि विभिन्न प्रणालियों की दक्षता में सुधार किया जा सके।

आधिकारिक विचार: यह पद्धति विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों के बीच तुलनात्मक विचार प्रदान करती है, जिससे अधिकारियों और नीति निर्माताओं को बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलती है।

इन पद्धतियों के माध्यम से, राजनीति विज्ञान के अध्ययन में विविधता और गहराई प्राप्त की जाती है, जिससे विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों और प्रक्रियाओं की व्यापक समझ बनती है।

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2)उदार लोकतंत्र और पूंजीवाद के मध्य अर्न्तसंबंधों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए

उदार लोकतंत्र और पूंजीवाद के बीच का अर्न्तसंबंध एक जटिल और विवादास्पद विषय है। ये दोनों प्रणालियाँ स्वतंत्रता, व्यक्तिगत अधिकार, और आर्थिक वृद्धि पर जोर देती हैं, लेकिन उनके बीच अंतर्निहित संबंध और टकराव का विश्लेषण करना महत्वपूर्ण है। इस परीक्षण में हम समझेंगे कि कैसे उदार लोकतंत्र और पूंजीवाद एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और उनके बीच के संबंधों का समालोचनात्मक परीक्षण करेंगे।

उदार लोकतंत्र: परिभाषा और सिद्धांत

उदार लोकतंत्र (Liberal Democracy) एक ऐसा राजनीतिक व्यवस्था है जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं, मानव अधिकारों, और समानता पर जोर दिया जाता है। यह व्यवस्था स्वतंत्र चुनाव, बहुपरकारी सरकार, और विधायिका के अधिकारों की रक्षा करती है। उदार लोकतंत्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

·        स्वतंत्रता और अधिकार: व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा की जाती है, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता, और धार्मिक स्वतंत्रता शामिल हैं।

·        लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ: नियमित और स्वतंत्र चुनावों के माध्यम से जनता को प्रतिनिधित्व मिलता है। सरकार की चयन और कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही होती है।

·        विधायिका और न्यायपालिका: शक्ति का पृथक्करण सुनिश्चित किया जाता है, जहाँ विधायिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका स्वतंत्र और संतुलित ढंग से कार्य करती हैं।

पूंजीवाद: परिभाषा और सिद्धांत

पूंजीवाद (Capitalism) एक आर्थिक प्रणाली है जिसमें उत्पादन और वितरण के साधन निजी स्वामित्व में होते हैं और लाभ की प्राप्ति पर जोर दिया जाता है। पूंजीवाद की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

निजी स्वामित्व: उत्पादन के साधन, जैसे कि भूमि, पूंजी, और श्रम, निजी व्यक्तियों या कंपनियों के स्वामित्व में होते हैं।

मुक्त बाजार: बाजार में व्यापार और लेन-देन स्वतंत्र रूप से होते हैं, और मूल्य की निर्धारिती आपूर्ति और मांग के आधार पर होती है।

लाभ की प्रेरणा: कंपनियाँ और उद्यम लाभ प्राप्त करने के लिए कार्य करते हैं, जिससे आर्थिक विकास और नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है।

अर्न्तसंबंधों का विश्लेषण

1. आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता:

उदार लोकतंत्र और पूंजीवाद दोनों ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर देते हैं, लेकिन उनके दृष्टिकोण में अंतर होता है। उदार लोकतंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की रक्षा करने के लिए कानून और संस्थाएँ होती हैं, जबकि पूंजीवाद में आर्थिक स्वतंत्रता पर जोर होता है। पूंजीवादी व्यवस्था में, आर्थिक गतिविधियों की स्वतंत्रता व्यक्तिगत और व्यावसायिक अवसरों को बढ़ावा देती है, जबकि उदार लोकतंत्र में व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा करने के लिए कानूनी ढाँचा होता है।

2. सरकारी हस्तक्षेप और बाजार नियंत्रण:

उदार लोकतंत्र में सरकार की भूमिका केवल विधायिका और न्यायपालिका तक सीमित नहीं होती; इसमें सामाजिक न्याय और कल्याण की सुरक्षा भी शामिल होती है। इसलिए, सरकार कभी-कभी पूंजीवादी बाजार में हस्तक्षेप कर सकती है, जैसे कि सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन, और आय पुनर्वितरण के लिए नीतियाँ लागू करना। पूंजीवाद में, हालांकि, बाजार की स्वतंत्रता पर जोर दिया जाता है, और सरकारी हस्तक्षेप को न्यूनतम रखने का प्रयास किया जाता है।

3. सामाजिक असमानता:

उदार लोकतंत्र की नीतियाँ सामाजिक समानता और अवसर की समानता को बढ़ावा देती हैं। हालांकि, पूंजीवादी व्यवस्था में, आर्थिक असमानता का निर्माण होता है, क्योंकि बाजार में प्रतिस्पर्धा और लाभ की प्रेरणा से धनी और गरीब वर्ग के बीच अंतर बढ़ता है। उदार लोकतंत्र में, सामाजिक सुरक्षा और पुनर्वितरण नीतियों के माध्यम से इन असमानताओं को कम करने का प्रयास किया जाता है, जबकि पूंजीवाद इस प्रकार की असमानताओं को स्वाभाविक मानता है।

4. लोकतांत्रिक स्थिरता और पूंजीवादी विकास:

उदार लोकतंत्र और पूंजीवाद के बीच अर्न्तसंबंध की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि दोनों ही आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करते हैं। एक स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था पूंजीवाद को प्रोत्साहित करती है क्योंकि यह कानूनी और नीतिगत सुरक्षा प्रदान करती है, जो व्यापार और निवेश को बढ़ावा देती है। दूसरी ओर, आर्थिक अस्थिरता और पूंजीवादी संकट राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे सकते हैं, जो लोकतांत्रिक संस्थानों और प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है।

5. नवाचार और सामाजिक समावेश:

पूंजीवादी व्यवस्था नवाचार और उद्यमिता को प्रोत्साहित करती है, जिससे आर्थिक विकास और नई तकनीकों की खोज होती है। यह नवाचार और विकास उदार लोकतंत्र के अंतर्गत सामाजिक समावेश और समान अवसरों को बढ़ावा देने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि नवाचार और विकास सभी वर्गों के लिए समान रूप से लाभकारी नहीं हो सकते हैं, और असमानता को बढ़ावा दे सकते हैं।

6. वैश्विक प्रभाव और अंतर्राष्ट्रीय संबंध:

उदार लोकतंत्र और पूंजीवाद के बीच अर्न्तसंबंध अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण होते हैं। पूंजीवादी देशों की वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जबकि उदार लोकतांत्रिक देशों की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख स्थान होता है। वैश्विक आर्थिक नीतियाँ और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ, जैसे कि विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करती हैं, जबकि उदार लोकतंत्र मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मानकों को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देती हैं।

समालोचनात्मक दृष्टिकोण

उदार लोकतंत्र और पूंजीवाद के बीच अर्न्तसंबंध की समालोचनात्मक समीक्षा में यह देखा जा सकता है कि:

संतुलन की आवश्यकता: दोनों प्रणालियों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। अत्यधिक पूंजीवाद सामाजिक असमानता को बढ़ा सकता है, जबकि अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप आर्थिक स्वतंत्रता को प्रतिबंधित कर सकता है।

समाज की समृद्धि: एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था और एक कुशल पूंजीवादी प्रणाली दोनों ही समाज की समृद्धि में योगदान कर सकती हैं, बशर्ते कि उनके बीच संतुलन और पारदर्शिता बनी रहे।

नीतिगत सुधार: नीतियों और संस्थानों को समय-समय पर सुधारने की आवश्यकता होती है ताकि दोनों प्रणालियाँ एक-दूसरे की ताकतों का समर्थन कर सकें और कमजोरियों को दूर कर सकें।

इस प्रकार, उदार लोकतंत्र और पूंजीवाद के बीच अर्न्तसंबंध जटिल और विविधतापूर्ण हैं। दोनों प्रणालियों की ताकत और सीमाओं को समझते हुए, एक संतुलित और समृद्ध समाज का निर्माण संभव है।

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सत्रीय कार्य - II

1)संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण क्या है? इसकी क्या सीमायें हैं?

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण (Structural Functional Analysis) समाजशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान में एक महत्वपूर्ण पद्धति है, जिसका उद्देश्य सामाजिक संरचनाओं और उनके कार्यों को समझना होता है। यह विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण समाज की संरचनाओं और उनके कार्यात्मक पहलुओं के बीच संबंधों को अध्ययन करता है।

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण: परिभाषा और सिद्धांत

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण एक ऐसा दृष्टिकोण है जो यह मानता है कि समाज एक जटिल प्रणाली है जिसमें विभिन्न घटक (संरचनाएँ) होते हैं, और इन घटकों के कार्य (फंक्शन्स) समाज के समग्र संतुलन और स्थिरता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस पद्धति के अनुसार, प्रत्येक सामाजिक संरचना (जैसे परिवार, शिक्षा प्रणाली, सरकार) समाज के समग्र कार्य को बनाए रखने के लिए विशिष्ट कार्य करती है।

प्रमुख तत्व:

संरचनाएँ:

संरचनाएँ समाज के विभिन्न घटक या संस्थाएँ होती हैं जैसे परिवार, शिक्षा प्रणाली, धार्मिक संगठन, और सरकार। ये संरचनाएँ समाज की नींव होती हैं और समाज के विभिन्न पहलुओं को प्रबंधित करती हैं।

कार्य (फंक्शन):

प्रत्येक संरचना या संस्था के पास एक विशेष कार्य होता है जो समाज के समग्र संतुलन और स्थिरता को बनाए रखने में योगदान करता है। उदाहरण के लिए, शिक्षा प्रणाली का कार्य ज्ञान और कौशल का प्रसार करना होता है, जबकि सरकार का कार्य कानूनों को लागू करना और समाज की व्यवस्था को बनाए रखना होता है।

सामाजिक स्थिरता:

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण यह मानता है कि समाज में स्थिरता और संतुलन बनाए रखने के लिए विभिन्न संरचनाएँ और उनके कार्य परस्पर निर्भर होते हैं। यदि एक संरचना ठीक से कार्य नहीं करती है, तो इससे पूरे समाज की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

समाज की गतिशीलता:

यह दृष्टिकोण यह भी मानता है कि समाज में बदलाव और विकास की प्रक्रिया में भी संरचनाएँ और उनके कार्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण समाज के विभिन्न पहलुओं में बदलाव की प्रक्रिया को समझने में सहायक होता है।

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण की सीमाएँ

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण की कुछ प्रमुख सीमाएँ हैं:

अधिकांश ध्यान स्थिरता पर:

इस पद्धति का मुख्य ध्यान समाज की स्थिरता और संतुलन बनाए रखने पर होता है, लेकिन यह समाज में बदलाव और संघर्ष की प्रक्रियाओं पर कम ध्यान देती है। इसका मतलब है कि यह समाज के विकासशील पहलुओं और परिवर्तनशील स्थितियों को पूरी तरह से नहीं समझ सकती है।

संघर्ष और असमानता की अनदेखी:

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण सामाजिक संघर्ष और असमानताओं को अनदेखा कर सकती है। यह दृष्टिकोण समाज के विभिन्न वर्गों और समूहों के बीच असमानताओं और संघर्षों को कम महत्व देता है, जिससे इन महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी होती है।

अत्यधिक सामान्यीकरण:

यह पद्धति समाज की संरचनाओं और उनके कार्यों को अत्यधिक सामान्यीकृत कर सकती है। कभी-कभी यह विश्लेषण सामाजिक वास्तविकताओं की जटिलताओं को पूरी तरह से नहीं पकड़ पाती है, जिससे विश्लेषण की सटीकता प्रभावित हो सकती है।

निश्चितता और स्थिरता का आदर्शकरण:

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण समाज को एक स्थिर और निश्चित प्रणाली के रूप में देखने की प्रवृत्ति रखती है, जो वास्तव में समाज की गतिशीलता और परिवर्तनशीलता को पूरी तरह से दर्शा नहीं सकती है।

संस्थाओं का निरंतरता पर जोर:

यह दृष्टिकोण सामाजिक संस्थाओं की निरंतरता और स्थिरता पर जोर देता है, लेकिन कभी-कभी यह बदलाव और संस्थागत नवाचार की प्रक्रिया को समझने में असमर्थ होता है।

अन्य दृष्टिकोणों की उपेक्षा:

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण सामाजिक व्यवहार और संरचनाओं को केवल एक दृष्टिकोण से देखने की प्रवृत्ति रखती है, जबकि अन्य दृष्टिकोण जैसे संघर्षात्मक दृष्टिकोण और आलोचनात्मक दृष्टिकोण भी समाज की जटिलताओं को समझने में सहायक हो सकते हैं।

निष्कर्ष

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण समाज की संरचनाओं और उनके कार्यों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण पद्धति है। यह पद्धति समाज की स्थिरता और संतुलन को बनाए रखने के लिए विभिन्न संरचनाओं और उनके कार्यों के बीच के संबंधों को स्पष्ट करती है। हालांकि, इसकी सीमाएँ भी हैं, जैसे कि स्थिरता और संतुलन पर अत्यधिक ध्यान देना, संघर्ष और असमानताओं की अनदेखी करना, और बदलाव और नवाचार की प्रक्रिया को पूरी तरह से समझने में असमर्थता। इन सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण को अन्य दृष्टिकोणों के साथ मिलाकर समाज का एक समग्र और विविध दृष्टिकोण प्राप्त किया जा सकता है।

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2)एशिया में समाजवादी राज्यों की कार्यप्रणाली का वर्णन कीजिए

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण (Structural Functional Analysis) समाजशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान में एक महत्वपूर्ण पद्धति है, जिसका उद्देश्य सामाजिक संरचनाओं और उनके कार्यों को समझना होता है। यह विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण समाज की संरचनाओं और उनके कार्यात्मक पहलुओं के बीच संबंधों को अध्ययन करता है।

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण: परिभाषा और सिद्धांत

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण एक ऐसा दृष्टिकोण है जो यह मानता है कि समाज एक जटिल प्रणाली है जिसमें विभिन्न घटक (संरचनाएँ) होते हैं, और इन घटकों के कार्य (फंक्शन्स) समाज के समग्र संतुलन और स्थिरता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस पद्धति के अनुसार, प्रत्येक सामाजिक संरचना (जैसे परिवार, शिक्षा प्रणाली, सरकार) समाज के समग्र कार्य को बनाए रखने के लिए विशिष्ट कार्य करती है।

संरचनाएँ:

संरचनाएँ समाज के विभिन्न घटक या संस्थाएँ होती हैं जैसे परिवार, शिक्षा प्रणाली, धार्मिक संगठन, और सरकार। ये संरचनाएँ समाज की नींव होती हैं और समाज के विभिन्न पहलुओं को प्रबंधित करती हैं।

कार्य (फंक्शन):

प्रत्येक संरचना या संस्था के पास एक विशेष कार्य होता है जो समाज के समग्र संतुलन और स्थिरता को बनाए रखने में योगदान करता है। उदाहरण के लिए, शिक्षा प्रणाली का कार्य ज्ञान और कौशल का प्रसार करना होता है, जबकि सरकार का कार्य कानूनों को लागू करना और समाज की व्यवस्था को बनाए रखना होता है।

सामाजिक स्थिरता:

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण यह मानता है कि समाज में स्थिरता और संतुलन बनाए रखने के लिए विभिन्न संरचनाएँ और उनके कार्य परस्पर निर्भर होते हैं। यदि एक संरचना ठीक से कार्य नहीं करती है, तो इससे पूरे समाज की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

समाज की गतिशीलता:

यह दृष्टिकोण यह भी मानता है कि समाज में बदलाव और विकास की प्रक्रिया में भी संरचनाएँ और उनके कार्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण समाज के विभिन्न पहलुओं में बदलाव की प्रक्रिया को समझने में सहायक होता है।

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण की सीमाएँ

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण की कुछ प्रमुख सीमाएँ हैं:

अधिकांश ध्यान स्थिरता पर:

इस पद्धति का मुख्य ध्यान समाज की स्थिरता और संतुलन बनाए रखने पर होता है, लेकिन यह समाज में बदलाव और संघर्ष की प्रक्रियाओं पर कम ध्यान देती है। इसका मतलब है कि यह समाज के विकासशील पहलुओं और परिवर्तनशील स्थितियों को पूरी तरह से नहीं समझ सकती है।

संघर्ष और असमानता की अनदेखी:

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण सामाजिक संघर्ष और असमानताओं को अनदेखा कर सकती है। यह दृष्टिकोण समाज के विभिन्न वर्गों और समूहों के बीच असमानताओं और संघर्षों को कम महत्व देता है, जिससे इन महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी होती है।

अत्यधिक सामान्यीकरण:

यह पद्धति समाज की संरचनाओं और उनके कार्यों को अत्यधिक सामान्यीकृत कर सकती है। कभी-कभी यह विश्लेषण सामाजिक वास्तविकताओं की जटिलताओं को पूरी तरह से नहीं पकड़ पाती है, जिससे विश्लेषण की सटीकता प्रभावित हो सकती है।

निश्चितता और स्थिरता का आदर्शकरण:

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण समाज को एक स्थिर और निश्चित प्रणाली के रूप में देखने की प्रवृत्ति रखती है, जो वास्तव में समाज की गतिशीलता और परिवर्तनशीलता को पूरी तरह से दर्शा नहीं सकती है।

संस्थाओं का निरंतरता पर जोर:

यह दृष्टिकोण सामाजिक संस्थाओं की निरंतरता और स्थिरता पर जोर देता है, लेकिन कभी-कभी यह बदलाव और संस्थागत नवाचार की प्रक्रिया को समझने में असमर्थ होता है।

अन्य दृष्टिकोणों की उपेक्षा:

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण सामाजिक व्यवहार और संरचनाओं को केवल एक दृष्टिकोण से देखने की प्रवृत्ति रखती है, जबकि अन्य दृष्टिकोण जैसे संघर्षात्मक दृष्टिकोण और आलोचनात्मक दृष्टिकोण भी समाज की जटिलताओं को समझने में सहायक हो सकते हैं।

निष्कर्ष

संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण समाज की संरचनाओं और उनके कार्यों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण पद्धति है। यह पद्धति समाज की स्थिरता और संतुलन को बनाए रखने के लिए विभिन्न संरचनाओं और उनके कार्यों के बीच के संबंधों को स्पष्ट करती है। हालांकि, इसकी सीमाएँ भी हैं, जैसे कि स्थिरता और संतुलन पर अत्यधिक ध्यान देना, संघर्ष और असमानताओं की अनदेखी करना, और बदलाव और नवाचार की प्रक्रिया को पूरी तरह से समझने में असमर्थता। इन सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण को अन्य दृष्टिकोणों के साथ मिलाकर समाज का एक समग्र और विविध दृष्टिकोण प्राप्त किया जा सकता है।

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3.ब्राज़ील में संघवाद की मूलभूत विशेषताओं का संक्षेप वर्णन कीजिए

ब्राज़ील में संघवाद की संरचना और कार्यप्रणाली उसकी विशेष राजनीतिक और संवैधानिक विशेषताओं के माध्यम से समझी जाती है। ब्राज़ील एक संघीय गणराज्य है, जिसमें संघीय सरकार और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण होता है। संघवाद की यह प्रणाली देश की विशालता, विविधता और भौगोलिक विविधताओं को समझने और प्रबंधित करने के लिए महत्वपूर्ण है।

संघवाद की मूलभूत विशेषताएँ

संविधानिक ढाँचा:

संविधान: ब्राज़ील का संघीय ढाँचा उसके संविधान के आधार पर काम करता है, जो 1988 में अपनाया गया था। इस संविधान ने संघीय प्रणाली को स्थापित किया और संघीय सरकार और राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण को परिभाषित किया।

संविधानिक प्रावधान: संविधान संघीय और राज्य स्तर पर विभिन्न शक्तियों और जिम्मेदारियों का स्पष्ट रूप से वर्णन करता है, जिससे संघीय सरकार और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।

संघीय संरचना:

संघीय सरकार: ब्राज़ील में संघीय सरकार तीन प्रमुख अंगों में विभाजित होती हैकार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका। संघीय सरकार राष्ट्रीय मामलों की जिम्मेदार होती है, जैसे विदेश नीति, रक्षा, और केंद्रीय वित्तीय मुद्दे।

राज्य सरकारें: ब्राज़ील के 26 राज्य और 1 संघीय जिला होते हैं। प्रत्येक राज्य की अपनी सरकार होती है, जिसमें कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका शामिल होते हैं। राज्य सरकारें स्थानीय मुद्दों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, और परिवहन के लिए जिम्मेदार होती हैं।

शक्तियों का वितरण:

संघीय और राज्य शक्तियाँ: संविधान संघीय और राज्य शक्तियों के बीच स्पष्ट रूप से विभाजित करता है। संघीय सरकार को कुछ विशिष्ट शक्तियाँ प्रदान की जाती हैं, जबकि राज्य सरकारें उन शक्तियों का प्रयोग करती हैं जो संविधान में निर्दिष्ट हैं।

सहकारी संघवाद: ब्राज़ील में संघीय और राज्य सरकारों के बीच सहयोग और समन्वय की आवश्यकता होती है। यह सहकारी संघवाद विभिन्न सरकारी स्तरों के बीच सहयोग सुनिश्चित करता है ताकि संयुक्त प्रयासों से समस्याओं का समाधान किया जा सके।

विधायिका:

संघीय विधायिका: ब्राज़ील की संघीय विधायिका नेशनल कांग्रेस (Congresso Nacional) के दो सदनों में बंटी होती हैसुप्रीम कोर्ट (Senado Federal) और प्रतिनिधि सभा (Câmara dos Deputados) ये दोनों सदन संघीय कानूनों को पारित करने, बजट को मंजूरी देने, और संघीय कार्यपालिका की निगरानी करने का कार्य करते हैं।

राज्य विधायिका: प्रत्येक राज्य की अपनी विधायिका होती है, जिसे राज्य विधान सभा (Assembleias Legislativas) कहा जाता है। राज्य विधान सभाएँ राज्य स्तर पर कानून बनाने और नीतियाँ लागू करने के लिए जिम्मेदार होती हैं।

न्यायपालिका:

संघीय न्यायपालिका: ब्राज़ील की संघीय न्यायपालिका उच्च न्यायालयों और संघीय न्यायालयों से मिलकर बनती है, जिसमें संघीय सुप्रीम कोर्ट (Supremo Tribunal Federal) सर्वोच्च न्यायालय होता है। यह न्यायपालिका संघीय कानूनों की व्याख्या करती है और संविधान की रक्षा करती है।

राज्य न्यायपालिका: प्रत्येक राज्य की अपनी न्यायपालिका होती है, जो राज्य स्तर पर न्यायिक मामलों को देखती है। राज्य न्यायालयों का कार्य राज्य कानूनों की व्याख्या और उनके प्रवर्तन में मदद करना होता है।

आर्थिक व्यवस्था:

राजस्व और वित्त: संघीय और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय संसाधनों का वितरण एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। संघीय सरकार और राज्य सरकारों को विभिन्न प्रकार के राजस्व प्राप्त होते हैं, जिसमें कर और अनुदान शामिल हैं। संविधान वित्तीय संसाधनों के वितरण और प्रबंधन के लिए प्रावधान करता है, लेकिन कभी-कभी वित्तीय असमानताओं और संघर्षों का सामना करना पड़ता है।

स्थानीय स्वायत्तता:

स्थानीय प्रशासन: प्रत्येक राज्य को अपनी प्रशासनिक और शासकीय प्रणाली स्थापित करने का अधिकार होता है, जो स्थानीय स्वायत्तता को बढ़ावा देती है। यह स्वायत्तता राज्य सरकारों को स्थानीय मुद्दों और समस्याओं को बेहतर तरीके से संबोधित करने की स्वतंत्रता प्रदान करती है।

संघवाद की सीमाएँ और चुनौतियाँ

वित्तीय असंतुलन:

संघीय और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय संसाधनों का वितरण अक्सर असंतुलित हो सकता है। राज्य सरकारों को केंद्रीय सरकार से वित्तीय सहायता पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे वित्तीय असमानता उत्पन्न हो सकती है।

संघीय और राज्य संघर्ष:

संघीय और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का वितरण कभी-कभी संघर्ष का कारण बन सकता है। यह संघर्ष राजनीतिक और कानूनी विवादों को जन्म दे सकता है, जिससे प्रशासनिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

सहकारी संघवाद की चुनौतियाँ:

सहकारी संघवाद के सिद्धांत को लागू करने में अक्सर चुनौतियाँ आती हैं। विभिन्न सरकारी स्तरों के बीच प्रभावी समन्वय और सहयोग की कमी से विकासात्मक योजनाओं और नीतियों का कार्यान्वयन प्रभावित हो सकता है।

स्थानीय स्वायत्तता का संकट:

कुछ राज्यों में स्थानीय स्वायत्तता की अत्यधिक स्वतंत्रता से अनियंत्रित प्रशासनिक प्रक्रियाओं और भ्रष्टाचार की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

निष्कर्ष

ब्राज़ील में संघवाद की मूलभूत विशेषताएँ उसकी संविधानिक संरचना, शक्तियों के वितरण, और प्रशासनिक ढाँचे के माध्यम से स्पष्ट होती हैं। संघीय और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन और सहकारी संघवाद के सिद्धांत की उपस्थिति, देश की विशालता और विविधता को प्रबंधित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, वित्तीय असंतुलन, संघीय और राज्य संघर्ष, और सहकारी संघवाद की चुनौतियाँ संघीय प्रणाली की सीमाएँ भी दर्शाती हैं। इन विशेषताओं और सीमाओं के माध्यम से, ब्राज़ील में संघवाद का विश्लेषण देश की राजनीतिक और प्रशासनिक प्रणाली को समझने में सहायता करता है।

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सत्रीय कार्य - III

निम्न लघु श्रेणी प्रश्नों के उत्तर लगभग 100 शब्दों (प्रत्येक) में दीजिए प्रत्येक प्रश्न 6 अंकों का है।

1)वैश्विक पूंजीवाद पर फुकुयामा

फ्रांसिस फुकुयामा, अपने प्रमुख काम "एंड ऑफ हिस्ट्री" में वैश्विक पूंजीवाद को एक महत्वपूर्ण विचार के रूप में प्रस्तुत करते हैं। फुकुयामा का तर्क है कि वैश्विक पूंजीवाद ने इतिहास की अंतिम अवस्था को प्रस्तुत किया है, जहाँ उदार लोकतंत्र और मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था ने वैश्विक मान्यता प्राप्त की है। उनके अनुसार, यह प्रणाली मानवीय विकास और सामाजिक प्रगति की चरम स्थिति को दर्शाती है, जहाँ राजनीतिक और आर्थिक सुधारों का प्रभाव सबसे व्यापक और स्थिर है।

फुकुयामा का मानना है कि वैश्विक पूंजीवाद ने बड़े पैमाने पर लोकतंत्र और आर्थिक समृद्धि को प्रोत्साहित किया है, लेकिन इसके साथ ही यह सामाजिक असमानता और आर्थिक अस्थिरता की समस्याओं को भी जन्म दे सकता है।

2)अतिविकसित राज्य की अवधारणा

अतिविकसित राज्य की अवधारणा

अतिविकसित राज्य (Overdeveloped State) की अवधारणा, राज्य के विकास के विभिन्न आयामों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। यह अवधारणा विशेष रूप से उन देशों या राज्यों के संदर्भ में प्रयोग होती है जो अत्यधिक आर्थिक, सामाजिक, और राजनीतिक विकास की अवस्था में होते हैं। अतिविकसित राज्य, आमतौर पर उन विशेषताओं के माध्यम से पहचाना जाता है जो उसे अन्य देशों या राज्यों से अलग करती हैं। इस अवधारणा को समझने के लिए, हमें अतिविकसित राज्य की विभिन्न विशेषताओं, विकास के प्रभावों, और इससे जुड़ी चुनौतियों की समीक्षा करनी होगी।

1. अतिविकसित राज्य की विशेषताएँ

1.1. उच्च जीवन स्तर: अतिविकसित राज्यों में नागरिकों के जीवन स्तर की गुणवत्ता बहुत उच्च होती है। यहाँ पर उच्च आय, बेहतर स्वास्थ्य देखभाल, और उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध होते हैं। इन राज्यों में जीवन की सुविधाओं और सुख-साधनों की उपलब्धता सामान्य से अधिक होती है, जो नागरिकों की समग्र भलाई को बेहतर बनाती है।

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3)चीन में दल प्रणाली

चीन की राजनीतिक संरचना और शासन व्यवस्था में दल प्रणाली का केंद्रीय स्थान है। चीन की राजनीति में एकमात्र सत्ताधारी दल, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP), का पूर्ण नियंत्रण है। यह दल प्रणाली चीन की राजनीतिक व्यवस्था को परिभाषित करती है और इसके शासन के तरीके, निर्णय लेने की प्रक्रिया, और नीतियों के कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

1. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP)

1.1. एकपार्टी शासन: चीन में एकपार्टी शासन व्यवस्था है, जहाँ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ही सत्ता का एकमात्र केंद्र है। इस प्रणाली में पार्टी के पास सभी महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय लेने का अधिकार होता है, और अन्य राजनीतिक दलों की अनुमति केवल परामर्श या सलाह देने की भूमिका में होती है।

1.2. पार्टी संरचना: CCP की संरचना बहुत ही केंद्रीकृत और अनुशासित है। पार्टी के सर्वोच्च निर्णय लेने वाले अंग पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी होते हैं। पार्टी की सर्वोच्च शक्ति सेंट्रल कमेटी के पास होती है, और पोलित ब्यूरो इसके भीतर एक महत्वपूर्ण निर्णयकारी निकाय होता है।

1.3. पार्टी के नेता: पार्टी के नेतृत्व में सबसे प्रमुख पद सामान्य सचिव का होता है, जो पार्टी का प्रमुख होता है और राजनीतिक निर्णयों की दिशा को निर्धारित करता है। वर्तमान में, शी जिनपिंग CCP के सामान्य सचिव और चीनी राष्ट्रपति के रूप में कार्यरत हैं।

2. दल प्रणाली की विशेषताएँ

2.1. पार्टी की भूमिका: CCP का प्रमुख उद्देश्य समाजवाद और साम्यवादी सिद्धांतों को लागू करना है। पार्टी ने अपनी शक्ति को केंद्रित किया है और सभी महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय, प्रशासनिक कामकाज, और राजनीतिक गतिविधियों पर पूर्ण नियंत्रण रखा है।

2.2. राजनीतिक नियंत्रण: पार्टी का नियंत्रण केवल राजनीतिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह समाज के विभिन्न पहलुओं, जैसे कि मीडिया, शिक्षा, और संस्कृति, पर भी प्रभाव डालती है। CCP के द्वारा लागू की गई नीतियाँ और कार्यक्रम समाज के हर हिस्से में देखे जा सकते हैं।

2.3. राजनीति और प्रशासन: चीन की राजनीति में, पार्टी के नेतृत्व का ढाँचा प्रशासनिक स्तर पर भी फैलता है। स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के अधिकारी और कार्यकर्ता प्रशासनिक पदों पर नियुक्त होते हैं, जिससे नीतियों और योजनाओं का कार्यान्वयन सुनिश्चित होता है।

2.4. वैकल्पिक दलों की भूमिका: चीन में कुछ अन्य राजनीतिक दल भी हैं, जैसे कि चीन की डेमोक्रेटिक लीग और चीन के किसानों और श्रमिकों का दल, लेकिन ये दल केवल सलाहकार भूमिकाओं में होते हैं और उनका वास्तविक राजनीतिक प्रभाव बहुत सीमित होता है। इन दलों को पार्टी के अधीन रहने और पार्टी की नीतियों के अनुसार काम करने की अनुमति होती है।

3. दल प्रणाली की चुनौतियाँ

3.1. राजनीतिक असंतोष: चीन में एकपार्टी शासन के कारण, राजनीतिक असंतोष और विरोध को दबाने की प्रवृत्ति होती है। स्वतंत्र राजनीतिक दलों और विरोधी आवाज़ों के प्रति कठोर नीतियाँ और नियंत्रण लागू किए जाते हैं, जिससे राजनीतिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की सीमाएँ होती हैं।

3.2. सूचना और मीडिया पर नियंत्रण: पार्टी का नियंत्रण मीडिया और सूचना पर भी होता है। राज्य मीडिया और सूचना नियंत्रण प्रणाली के माध्यम से, पार्टी अपनी नीतियों और दृष्टिकोणों को फैलाने का प्रयास करती है और अन्य स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं पर नियंत्रण रखती है।

3.3. भ्रष्टाचार और प्रशासनिक समस्याएँ: एकपार्टी शासन में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक समस्याएँ एक चुनौती होती हैं। पार्टी और सरकारी अधिकारियों के बीच सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण से भ्रष्टाचार की संभावनाएँ बढ़ सकती हैं, और इसका प्रभाव प्रशासनिक दक्षता पर भी पड़ सकता है।

3.4. सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ: चीन की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और सामाजिक परिवर्तनों के बावजूद, सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ बनी रहती हैं। गरीब और अमीर के बीच अंतर, और ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच विकास की असमानता, चीन के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

निष्कर्ष

चीन की दल प्रणाली एकपार्टी शासन पर आधारित है, जिसमें CCP का पूर्ण नियंत्रण है। यह प्रणाली चीन की राजनीतिक और प्रशासनिक संरचना को परिभाषित करती है और समाज के विभिन्न पहलुओं पर प्रभाव डालती है। हालांकि, दल प्रणाली की संरचना और नियंत्रण के लाभों के साथ-साथ, इसके साथ चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं, जैसे कि राजनीतिक असंतोष, सूचना और मीडिया पर नियंत्रण, और सामाजिक असमानताएँ। इन विशेषताओं और चुनौतियों के माध्यम से, चीन की दल प्रणाली की समझ में गहराई प्राप्त की जा सकती है।

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4)सर्वहारा वर्ग की तानाशाही

सर्वहारा वर्ग की तानाशाही (Dictatorship of the Proletariat) एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक अवधारणा है जिसे मार्क्सवाद और साम्यवाद के सिद्धांतों में समझाया गया है। यह अवधारणा कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा विकसित की गई थी, और यह साम्यवादी क्रांतियों और समाजवादी आंदोलनों का एक केंद्रीय तत्व है। सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का तात्पर्य उस राजनीतिक व्यवस्था से है जिसमें श्रमिक वर्ग (प्रोलिटेरियट) सत्ता पर नियंत्रण प्राप्त करता है और समाज के सभी अन्य वर्गों की शासन पर आधारित व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयास करता है।

1. सर्वहारा वर्ग की तानाशाही की परिभाषा

सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का सिद्धांत उस स्थिति को वर्णित करता है जिसमें श्रमिक वर्ग, जो पूंजीवादी समाज में उत्पीड़ित और शोषित होता है, सत्ता पर कब्जा कर लेता है। यह सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया की एक क्रांतिकारी अवस्था है, जहाँ श्रमिक वर्ग समाजवादी समाज की स्थापना के लिए शासन करता है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार, इस प्रकार की तानाशाही एक संक्रमणकालीन अवधि को दर्शाती है जो पूंजीवाद के पतन और साम्यवाद की स्थापना के बीच होती है।

2. सर्वहारा वर्ग की तानाशाही की विशेषताएँ

2.1. सत्ता का श्रमिक वर्ग के हाथों में केंद्रीकरण: सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के अंतर्गत, राजनीतिक और आर्थिक सत्ता श्रमिक वर्ग के हाथों में होती है। इसका उद्देश्य पूंजीवादी व्यवस्था की सभी सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को समाप्त करना और एक वर्गहीन समाज की दिशा में अग्रसर होना होता है।

2.2. क्रांतिकारी परिवर्तनों का कार्यान्वयन: इस तानाशाही के दौरान, श्रमिक वर्ग सरकार और समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लागू करता है। इसमें संपत्ति का समाजीकरण, उत्पादन के साधनों का सार्वजनिक स्वामित्व, और सामाजिक न्याय की दिशा में सुधार शामिल होते हैं।

2.3. वर्ग संघर्ष का केंद्र: सर्वहारा वर्ग की तानाशाही वर्ग संघर्ष की एक प्रमुख अवस्था होती है। इसमें श्रमिक वर्ग द्वारा पूंजीपति वर्ग और अन्य शोषक वर्गों के खिलाफ संघर्ष किया जाता है, ताकि समाज की सभी संसाधनों और शक्तियों का पुनर्वितरण किया जा सके।

2.4. अस्थायी और संक्रमणकालीन अवधि: मार्क्सवादी सिद्धांत के अनुसार, सर्वहारा वर्ग की तानाशाही एक अस्थायी और संक्रमणकालीन स्थिति है। इसका अंतिम लक्ष्य एक साम्यवादी समाज की स्थापना है, जिसमें सभी वर्गभेद समाप्त हो जाते हैं और समाज एक समानता और न्याय पर आधारित होता है।

3. सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का कार्यान्वयन

3.1. ऐतिहासिक उदाहरण: सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का सिद्धांत विभिन्न साम्यवादी क्रांतियों के दौरान देखा गया है। उदाहरण के तौर पर, रूसी क्रांति (1917) के बाद सोवियत संघ में लेनिन और बाद में स्टालिन के नेतृत्व में इस सिद्धांत को लागू करने का प्रयास किया गया। इसी प्रकार, चीनी क्रांति (1949) के बाद माओत्से तुंग के नेतृत्व में भी इस अवधारणा को लागू करने की कोशिश की गई।

3.2. सत्ता संरचना: सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के तहत, राजनीतिक सत्ता का केंद्रीकरण होता है और आमतौर पर एक सत्ताधारी दल द्वारा शासन किया जाता है। इस दल का उद्देश्य समाजवादी नीतियों को लागू करना और वर्ग संघर्ष को समाप्त करना होता है।

3.3. सामाजिक और आर्थिक सुधार: इस अवधि के दौरान, कई प्रकार के सामाजिक और आर्थिक सुधार किए जाते हैं, जैसे कि संपत्ति का समाजीकरण, श्रमिकों के अधिकारों का संरक्षण, और सामाजिक कल्याण योजनाओं की शुरुआत। इन सुधारों का उद्देश्य पूंजीवादी असमानताओं को समाप्त करना और समाज को समानता की ओर ले जाना होता है।

4. सर्वहारा वर्ग की तानाशाही की चुनौतियाँ और आलोचनाएँ

4.1. तानाशाही का स्वरूप: सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के कार्यान्वयन के दौरान, अक्सर एक एकाधिकार और तानाशाही की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए, स्टालिन के शासनकाल के दौरान सोवियत संघ में राजनीतिक विरोध और स्वतंत्रता पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए, जिससे तानाशाही की आलोचना की गई।

4.2. सामाजिक असंतोष और विरोध: सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के तहत लागू की गई नीतियों और सुधारों के प्रति सामाजिक असंतोष उत्पन्न हो सकता है। यह असंतोष और विरोध कभी-कभी सरकारी नीतियों के खिलाफ विद्रोह का रूप ले सकता है, जो राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता को प्रभावित करता है।

4.3. आर्थिक समस्याएँ: सामाजिककरण और केंद्रीकृत योजना के प्रयासों के बावजूद, कभी-कभी आर्थिक असफलताओं और संकटों का सामना करना पड़ सकता है। यह समस्याएँ आर्थिक विकास, उत्पादन, और वितरण की चुनौतियों से संबंधित हो सकती हैं।

4.4. लोकतांत्रिक समस्याएँ: सर्वहारा वर्ग की तानाशाही की आलोचना यह भी की जाती है कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्रता की कमी का कारण बन सकती है। एकपार्टी शासन और राजनीतिक स्वतंत्रता की सीमाएँ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर प्रभाव डाल सकती हैं।

निष्कर्ष

सर्वहारा वर्ग की तानाशाही एक महत्वपूर्ण मार्क्सवादी अवधारणा है, जो पूंजीवाद के अंत और साम्यवाद की स्थापना के बीच की संक्रमणकालीन अवस्था को दर्शाती है। इस अवधारणा के तहत, श्रमिक वर्ग सत्ता पर कब्जा कर समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लागू करता है। हालांकि, इसका कार्यान्वयन और प्रभाव कई चुनौतियाँ और आलोचनाएँ उत्पन्न कर सकता है, जैसे कि तानाशाही का स्वरूप, सामाजिक असंतोष, और आर्थिक समस्याएँ। इन पहलुओं को समझने से, सर्वहारा वर्ग की तानाशाही की अवधारणा और उसके कार्यान्वयन की जटिलताओं को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।

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5)नव संस्थावाद

नव संस्थावाद (New Institutionalism) एक प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक सिद्धांत है जो संस्थाओं की भूमिका और उनके समाज में प्रभाव को समझने की कोशिश करता है। यह सिद्धांत राजनीतिक विज्ञान, समाजशास्त्र, और अर्थशास्त्र में महत्वपूर्ण योगदान देता है और संस्थागत संरचनाओं के अध्ययन में एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। नव संस्थावाद पारंपरिक संस्थावाद से अलग है, क्योंकि यह संस्थाओं के प्रभाव को केवल औपचारिक नियमों और संरचनाओं के परिप्रेक्ष्य से नहीं, बल्कि उनके सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में भी समझने की कोशिश करता है।

1. नव संस्थावाद का परिभाषा और विकास

1.1. परिभाषा: नव संस्थावाद एक सिद्धांत है जो संस्थाओं की भूमिका और उनके सामाजिक, राजनीतिक, और आर्थिक प्रभाव को समझने के लिए विकसित किया गया है। यह संस्थाओं को केवल नियमों और संरचनाओं के रूप में नहीं देखता, बल्कि उनके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में भी उनका विश्लेषण करता है।

1.2. विकास: नव संस्थावाद की शुरुआत 1970 के दशक में हुई, जब राजनीतिक विज्ञान और समाजशास्त्र में संस्थाओं की भूमिका को समझने के नए तरीके अपनाए गए। प्रमुख विद्वानों जैसे कि डगलस नॉर्थ, वॉल्टर रसेल मीड, और जेम्स सी. स्कॉट ने इस सिद्धांत को विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

2. नव संस्थावाद की प्रमुख विशेषताएँ

2.1. संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका: नव संस्थावाद संस्थाओं को समाज और राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तत्व मानता है। संस्थाएँ केवल नियम और संरचनाएं नहीं होतीं, बल्कि वे सामाजिक संबंधों और मानव व्यवहार को भी प्रभावित करती हैं। संस्थाओं का अध्ययन उनकी भूमिका, प्रभाव, और परिवर्तन की प्रक्रियाओं को समझने के लिए किया जाता है।

2.2. संस्थाओं का सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ: इस सिद्धांत के अनुसार, संस्थाएँ उनके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में महत्वपूर्ण होती हैं। संस्थाओं का विकास और उनके कार्यक्षेत्र समाज और राजनीति के बदलावों के साथ बदलता है। इसलिए, संस्थाओं का अध्ययन उनके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में किया जाता है।

2.3. संस्थागत परिवर्तन: नव संस्थावाद संस्थागत परिवर्तन की प्रक्रिया को भी समझने की कोशिश करता है। यह देखता है कि कैसे संस्थाएँ समय के साथ बदलती हैं, और उन परिवर्तनों का समाज और राजनीति पर क्या प्रभाव होता है। संस्थागत परिवर्तन केवल बाहरी कारकों से नहीं होता, बल्कि आंतरिक गतिशीलताओं और संघर्षों से भी प्रभावित होता है।

2.4. संस्थाओं का सृजन और स्थायित्व: नव संस्थावाद यह भी मानता है कि संस्थाएँ केवल सृजित नहीं होतीं, बल्कि उनके स्थायित्व और दीर्घकालिकता भी महत्वपूर्ण होती है। संस्थाएँ समाज में एक स्थिरता और निरंतरता प्रदान करती हैं, और उनका स्थायित्व समाज के विकास और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होता है।

3. नव संस्थावाद के प्रमुख सिद्धांत और दृष्टिकोण

3.1. औपचारिक और अनौपचारिक संस्थाएँ: नव संस्थावाद औपचारिक और अनौपचारिक संस्थाओं के बीच अंतर करता है। औपचारिक संस्थाएँ जैसे कि कानूनी संरचनाएँ, संविधानों, और सरकारी एजेंसियाँ होती हैं, जबकि अनौपचारिक संस्थाएँ जैसे कि सामाजिक मानक, परंपराएँ, और सांस्कृतिक मान्यताएँ होती हैं। दोनों प्रकार की संस्थाएँ समाज और राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

3.2. संस्थाओं का प्रभाव और परिवर्तन: नव संस्थावाद यह समझने की कोशिश करता है कि संस्थाएँ कैसे समाज और राजनीति पर प्रभाव डालती हैं। यह देखता है कि कैसे संस्थाएँ समाज के विभिन्न हिस्सों में बदलाव लाती हैं और कैसे वे समय के साथ बदलती हैं। संस्थाओं का प्रभाव समाज में शक्ति, संसाधनों, और अवसरों के वितरण को प्रभावित करता है।

3.3. संस्थागत विश्लेषण: नव संस्थावाद संस्थागत विश्लेषण की विधियों का उपयोग करता है, जिसमें संस्थाओं की संरचना, कार्यप्रणाली, और उनके प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। यह विश्लेषण संस्थाओं के अंदर की गतिशीलताओं और उनके बाहरी संदर्भ को समझने में मदद करता है।

4. नव संस्थावाद की आलोचनाएँ और चुनौतियाँ

4.1. संस्थाओं की जटिलता: नव संस्थावाद की आलोचना की जाती है कि यह संस्थाओं की जटिलता को पूरी तरह से समझ नहीं पाता। संस्थाएँ बहुत ही जटिल और विविध होती हैं, और उनका विश्लेषण करने में कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

4.2. परिवर्तन की प्रक्रिया: संस्थानिक परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने में भी चुनौतियाँ होती हैं। यह समझना कि कैसे और क्यों संस्थाएँ बदलती हैं, और उनके परिवर्तन का समाज पर क्या प्रभाव होता है, एक जटिल और कठिन कार्य हो सकता है।

4.3. सैद्धांतिक विविधता: नव संस्थावाद के विभिन्न सैद्धांतिक दृष्टिकोण होते हैं, जो कभी-कभी एक दूसरे से भिन्न हो सकते हैं। इस सैद्धांतिक विविधता के कारण, नव संस्थावाद के सिद्धांतों को एकीकृत और व्यवस्थित तरीके से लागू करने में कठिनाइयाँ हो सकती हैं।

निष्कर्ष

नव संस्थावाद एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो संस्थाओं की भूमिका और उनके प्रभाव को समझने की कोशिश करता है। यह संस्थाओं को केवल औपचारिक नियमों और संरचनाओं के परिप्रेक्ष्य से नहीं, बल्कि उनके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में भी समझता है। नव संस्थावाद का उद्देश्य यह समझना है कि संस्थाएँ कैसे समाज और राजनीति में बदलाव लाती हैं, और कैसे वे समय के साथ बदलती हैं। हालांकि, नव संस्थावाद की आलोचनाएँ और चुनौतियाँ भी हैं, लेकिन यह सिद्धांत सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है।

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