Friday, September 10, 2021

सामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉस

सामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉस

स्ट्रक्चरलिज्ममानव विज्ञान की एक ऐसी पद्धति है जो संकेत विज्ञान (यानी संकेतों की एक प्रणालीऔर सहजता से परस्पर संबद्ध भागों की एक पद्धति के अनुसार तथ्यों का विश्लेषण करने का प्रयास करती है। सामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉस स्वीडन के प्रसिद्ध भाषाविद फर्दिनान्द  सस्यूर इसके प्रवर्तक माने जाते हैंजिन्हें हिन्दी में सस्यूर नाम से जाना जाता है। तर्क के संरचनावादी तरीके को विभिन्न क्षेत्रों जैसेनृविज्ञानसमाजशास्त्रमनोविज्ञानसाहित्यिक आलोचना और यहां तक कि वास्तुकला में भी लागू किया गया है। इसने एक विधि के रूप में नहीं बल्कि एक बौद्धिक आंदोलन के रूप में संरचनावाद की भोर में प्रवेश कियाजो 1960 के दशक में फ्रांस में अस्तित्ववाद की जगह लेने आया था।

1970 के दशक मेंयह आलोचकों के आन्तरिक गुस्से का शिकार हुआजिन्होंने इस पर बहुत ही 'अनमनीयतथा 'अनैतिहासिकहोने का आरोप लगाया। सामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉसहालांकिसंरचनावाद के कई समर्थकोंजैसे कि जैक्स लेकन ने महाद्वीपीय मान्यताओं और इसके आलोचकों की मूल धारणाओं पर ज़ोर देकर प्रभाव डालना शुरू किया कि उत्तर-संरचनावादसंरचनावाद की निरंतरता है।

एलीज़न एसिस्टर के अनुसारसंरचनावाद से संबंधित चार आम विचार एक 'बौद्धिक प्रवृत्तिकी रचना करते हैं।

·        सबसे पहलेसंरचना वह हैजो पूर्णता के प्रत्येक तत्व की स्थिति को निर्धारित करता है।

·        दूसरासंरचनावादियों का मानना है कि हर प्रणाली की एक संरचना होती है।

·        तीसरासंरचनावादी 'संरचनात्मकनियमों में ज्यादा रूचि लेते हैं जो बदलाव की जगह सह-अस्तित्व से संबंधित होते हैं।

·        और आखिर में संरचनाएं वे 'असली वस्तुएंहै जो अर्थ के धरातल या सतह के नीचे विद्यमान रहती हैं।

संरचनावाद शब्द को अक्सर एक विशिष्ट प्रकार के मानववादी संरचनावादी विश्लेषण के सन्दर्भ में इस्तेमाल किया जाता है सामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉसजहां तथ्यों को संकेतों के विज्ञान (यानी संकेतों की एक प्रणालीसे उल्लेखित किया जाता है। महाद्वीपीय दर्शन में इस शब्द का आम तौर पर इसी तरह प्रयोग किया जाता है। सामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉस हालांकिइस शब्द का प्रयोग संरचनात्मक दृष्टिकोण के विविध सन्दर्भ जैसे कि सामाजिक नेटवर्क विश्लेषण और वर्ग विश्लेषणमें भी किया जाता है। इस अर्थ में संरचनावाद संरचनात्मक विश्लेषण या संरचनात्मक समाजशास्त्र का पर्याय बन गया हैजिनमें से बाद वाले को इस प्रकार परिभाषित किया गया है सामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉस "एक ऐसी पहल जिसमें सामाजिक संरचनाअवरोध और अवसरों को अधिक स्पष्ट तौर पर देखा जाये यह सांस्कृतिक मानदंडों या अन्य व्यक्तिपरक चीज़ों की तुलना में मानव व्यवहार पर अधिक प्रभाव डालता है।"

संरचनावाद बताता है कि मानव संस्कृति को संकेतों की एक प्रणाली समझा जाना चाहिए। रॉबर्ट स्कोल्स ने संरचनावाद को आधुनिकतावादी अलगाव और निराशा की प्रतिक्रिया के रूप में परिभाषित किया है। सामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉससंरचनावादियों ने एक सांकेतिक विज्ञान (संकेतों की प्रणालीविकसित करने का प्रयास किया। फर्डिनेंड डी सौसर 20 वीं सदी के संरचनावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं और इसके सबूत हमें उनकी मृत्यु के बाद उनके छात्रों के नोटों पर आधारित उनके सहयोगियों द्वारा लिखे गये कोर्स इन जनरल लिंग्विस्टिक में मिल सकते हैं सामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉसजिसमें उन्होंने भाषा (शब्द या भाषणके इस्तेमाल पर नहीं बल्कि भाषा (लैंगुएकी अंतर्निहित प्रणाली पर ध्यान केंद्रित किया है और अपने सिद्धान्त को संकेत विज्ञान कहा है। हालांकिभाषण (पेरोलकी जांच करने के माध्यम से ही अंतर्निहित प्रणाली की खोज की जा सकती है। 

जैसे कि संरचनात्मक भाषाविज्ञान असल में कोष भाषा विज्ञान (कारपस लिंग्विस्टिक्स) (प्रमात्रीकरणका पूर्व स्वरूप है। सामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉसइस दृष्टिकोण ने यह परीक्षण करने पर ध्यान केंद्रित किया कि वर्तमान में भाषा संबंधित तत्व आपस में किस तरह से जुडे़ हुए हैंवह ये किकालक्रमिक तौर पर  कि 'समकालीनतरीके सेअंत मेंउन्होंने तर्क दिया कि भाषाई संकेत दो भागों में बने हैंशब्द रूप (सिग्निफायर) (शब्द की ध्वनि के लक्षणया तो मानसिक प्रक्षेपण मेंजैसा कि हम कविता की पंक्तियां चुपचाप अपने लिए पढ़ते हैंसामाजिक संरचना को समझने में लेवी-स्ट्रॉस या फिर वास्तविक रूप मेंवाचक के रूप में भौतिक तौर पर बोलते हुएऔर एक अवधारणा (शब्द की अवधारणा या अर्थ का प्रारूपके रूप मेंयह पिछले दृष्टिकोणों से काफी अलग था जिसने दुनिया में शब्दों और उनसे सम्बंधित वस्तुओं के बीच के रिश्ते पर ध्यान केंद्रित किया (रॉय हैरिस और टैलबोट टेलरलैंडमार्क्स इन लिंग्विस्टिक थॉटप्रथम अंक [1989], पृ.) 178-179).

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