IGNOU MRDE-202 Important Questions With Answers 2026

      IGNOU MRDE-202 Important Questions With Answers 2026

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Block-wise Top 10 Important Questions for MRDE-202

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1.भारत में गरीबी की परिभाषा और मापदंडों की चर्चा कीजिए 

परिचय: 

भारत जैसे विकासशील देश में गरीबी एक बहुआयामी और जटिल सामाजिक-आर्थिक समस्या हैजो दशकों से नीति-निर्माताओं और समाजशास्त्रियों के लिए चिंता का विषय रही है गरीबी का अर्थ केवल आय की कमी नहीं हैबल्कि यह शिक्षास्वास्थ्यपोषणआवासस्वच्छता और सामाजिक अवसरों की कमी से भी जुड़ा होता है भारत में गरीबी को मापने और परिभाषित करने के लिए समय-समय पर विभिन्न आयोगों और समितियों ने विभिन्न मापदंड अपनाए हैं 

 

1. भारत में गरीबी की परिभाषा: 

भारत में गरीबी की कोई एक सार्वभौमिक परिभाषा नहीं हैबल्कि यह विभिन्न सन्दर्भों में अलग-अलग रूप में परिभाषित की गई है: 

 (पारंपरिक परिभाषा (आय आधारित): 

  • इस दृष्टिकोण के अनुसारवह व्यक्ति गरीब कहलाता है जिसकी मासिक या वार्षिक आय इतनी कम है कि वह न्यूनतम जीवन आवश्यकताओं जैसे – भोजनवस्त्रऔर आवास – की पूर्ति नहीं कर सकता 

 (उपभोग व्यय आधारित परिभाषा: 

  • उपभोग व्यय आधारित दृष्टिकोण में यह देखा जाता है कि व्यक्ति प्रति दिन कितनी कैलोरी ले रहा हैतथा भोजन पर कितना खर्च कर पा रहा है

 (बहुआयामी गरीबी परिभाषा: 

  • UNDP और NITI Aayog जैसे संस्थानों ने गरीबी को केवल आय नहींबल्कि स्वास्थ्यशिक्षास्वच्छताबिजलीपीने का पानी और जीवन स्तर से भी जोड़ा है 

 

2. भारत में गरीबी मापन के मापदंड: 

 (1) लक्ष्मण रेखा (Poverty Line): 

  • गरीबी रेखा वह न्यूनतम सीमा हैजिसके नीचे जीवन निर्वाह कठिन होता है 

  • भारत में यह पहले कैलोरी आधारित थी (2400 कैलोरी ग्रामीण क्षेत्र में, 2100 कैलोरी शहरी में)


 (2) विभिन्न समितियों द्वारा मापदंड: 

(लक्ष्मीनारायण आयोग (1962): 

  • इस आयोग ने पहली बार उपभोग व्यय के आधार पर गरीबी रेखा निर्धारण की बात की 

(दत्त समिति (1979): 

  • इसने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए न्यूनतम उपभोग व्यय की सीमा तय की 

(तेंडुलकर समिति (2009): 

  • पहली बार शिक्षास्वास्थ्य और बिजली खर्च को शामिल किया गया 

  • इसने ₹33/₹27 प्रतिदिन (शहरी/ग्रामीणको गरीबी रेखा माना 

(रंगराजन समिति (2014): 

  • इसने तेंडुलकर रिपोर्ट को संशोधित करते हुए ₹47/₹32 प्रतिदिन (शहरी/ग्रामीणखर्च को गरीबी रेखा का आधार माना 

 

3. बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index - MPI): 

  • यह सूचकांक UNDP द्वारा तैयार किया जाता है 

  • इसमें तीन प्रमुख आयाम शामिल होते हैंस्वास्थ्यशिक्षाऔर जीवन स्तर 

  • भारत ने 2021 से MPI को अपनाया और NITI Aayog इसकी गणना करता है 


4. गरीबी मापन की सीमाएं और चुनौतियां: 

  • केवल आय पर आधारित मापन वास्तविक गरीबी की स्थिति नहीं दिखा पाता 

  • कुपोषणबेरोजगारीशिक्षा की कमी और सामाजिक बहिष्कार जैसे तत्व छूट जाते हैं 

  • ग्रामीण क्षेत्रों में कीमतें अलग होती हैंजिससे गरीबी रेखा एक समान रूप से लागू नहीं हो पाती 

 

5. निष्कर्ष: 

भारत में गरीबी को समझना और उसका सही मूल्यांकन करना नीति निर्माण और कल्याणकारी योजनाओं की सफलता के लिए आवश्यक है अब आवश्यकता है कि केवल आय आधारित नहीं बल्कि बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाकर योजनाएं बनाई जाएं ताकि गरीब तबकों को समग्र विकास का लाभ मिल सके 

 

2.महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) की विशेषताएं और प्रभाव क्या हैं? 

परिचय: 

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) वर्ष 2005 में पारित हुआ और 2006 से लागू किया गया यह अधिनियम भारत के हर ग्रामीण परिवार को प्रतिवर्ष कम-से-कम 100 दिनों का रोजगार सुनिश्चित करता है इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका सुरक्षा प्रदान करना और ग्रामीण विकास को प्रोत्साहित करना है यह अधिनियम विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम माना जाता है 

 

1. MGNREGA की मुख्य विशेषताएं: 

 (कानूनी अधिकार आधारित कार्यक्रम: 

  • यह रोजगार प्राप्त करने का कानूनी अधिकार देता हैजिससे पात्र व्यक्ति सरकार से कार्य की मांग कर सकता है 

 () 100 दिनों का गारंटीकृत रोजगार: 

  • प्रत्येक ग्रामीण परिवार को प्रति वर्ष 100 दिनों तक अकुशल श्रम का भुगतान किया जाता है 

 (स्थानीय रोजगार: 

  • कार्य ग्रामीण क्षेत्र में ही दिया जाता हैजिससे प्रवासन की समस्या कम होती है 

 (महिला भागीदारी: 

  • 33% कार्य महिलाओं के लिए आरक्षित हैजिससे महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है 

 (समयबद्ध वेतन भुगतान: 

  • र्य के 15 दिन के अंदर भुगतान की बाध्यता है 

 (सामाजिक अंकेक्षण: 

  • योजना की पारदर्शिता के लिए सामाजिक अंकेक्षण की व्यवस्था है 

 (परिसंपत्ति निर्माण: 

  • योजना के अंतर्गत जल संरक्षणसड़क निर्माणतालाब निर्माण जैसे टिकाऊ कार्य किए जाते हैं 

 

2. MGNREGA के प्रभाव: 

 (ग्रामीण आय में वृद्धि: 

  • गरीब और बेरोजगार ग्रामीणों को नियमित आय प्राप्त हुई हैजिससे उनका जीवन स्तर सुधरा है 

 (प्रवासन में कमी: 

  • काम घर के पास मिलने से लोगों को शहरी क्षेत्रों में पलायन करने की आवश्यकता कम हुई है 

 (महिला सशक्तिकरण: 

  • महिलाओं को घर के पास सम्मानजनक कार्य मिला हैजिससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है 

 (सामुदायिक विकास: 

  • तालाबसड़कऔर जलसंरक्षण जैसे कार्यों से ग्रामीण संरचना में सुधार हुआ है 

 (कृषि में सहयोग: 

  • जल निकासी और सिंचाई संरचना मजबूत होने से कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई है 

 

3. चुनौतियाँ: 

 (कार्य की अनियमित उपलब्धता: 

  • कई जगहों पर काम समय पर नहीं मिलताजिससे मजदूरों को कठिनाई होती है 

 (भुगतान में देरी: 

  • कुछ राज्यों में मजदूरी भुगतान कई हफ्तों की देरी से होता है 

 (भ्रष्टाचार और बिचौलिये: 

  • फर्जी जॉब कार्डनकली हस्ताक्षर और बिना काम के भुगतान की शिकायतें हैं 

 (सूचना का अभाव: 

  • कई ग्रामीणों को अपने अधिकारों और आवेदन प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती 

 

4. सुधार हेतु सुझाव: 

  • डिजिटल भुगतान प्रणाली को मजबूत कर भुगतान में पारदर्शिता लाई जा सकती है 

  • कार्य की सूची का विस्तार कर खेतीपशुपालन आदि को भी शामिल किया जा सकता है 

  • स्थानीय पंचायतों को अधिक अधिकार देकर योजना को स्थानीय आवश्यकताओं से जोड़ा जा सकता है 

 

निष्कर्ष: 

MGNREGA भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका सुरक्षा और सामाजिक सशक्तिकरण का प्रमुख साधन है यदि इसे ईमानदारी और पारदर्शिता से लागू किया जाएतो यह गरीबी उन्मूलनबेरोजगारी नियंत्रण और ग्रामीण विकास का सशक्त माध्यम बन सकता है इसकी सफलता भारत के सामाजिक कल्याण और आर्थिक समानता के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर होगी 

 3.ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) का उद्देश्य और रणनीति क्या है? 

भारत सरकार ने ग्रामीण गरीबी उन्मूलन और सतत आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2011 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) की शुरुआत की इसका उद्देश्य ग्रामीण गरीबोंविशेषकर महिलाओं को संगठित कर उन्हें वित्तीयसामाजिक और संस्थागत रूप से सशक्त बनाना है ताकि वे सतत और लाभकारी आजीविका प्राप्त कर सकें इसे 2015 में दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के नाम से पुनः संरचित किया गया 

 NRLM का मुख्य उद्देश्य: 

NRLM का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर ग्रामीण गरीब परिवार के पास स्थायी आजीविका का साधन हो और वे स्वयं की सहायता से गरीबी से बाहर निकल सकें इसके लिए उन्हें स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से संगठित कर वित्तीय सेवाओंकौशल विकासऔर विपणन सहायता से जोड़ा जाता है 

 

NRLM की प्रमुख रणनीतियाँ: 

1. सामुदायिक संस्थानों का निर्माण और सशक्तिकरण: 

NRLM का मूल आधार यह है कि गरीबों को SHG (Self Help Group) में संगठित किया जाएजो आपसी बचतऋणऔर सामूहिक कार्य प्रणाली पर आधारित हो इसके तहत: 

  • महिला SHGs का गठन 

4.स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (SGSY) की संरचना और परिणामों की विवेचना कीजिए 

भारत सरकार ने ग्रामीण गरीबी उन्मूलन हेतु 1 अप्रैल 1999 को स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (SGSY) की शुरुआत की थी यह योजना ग्रामीण गरीबों को स्वरोजगार के अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से बनाई गई थीजिससे वे सतत आय अर्जित कर गरीबी से बाहर निकल सकें SGSY को वर्ष 2013 में समाप्त कर NRLM में विलय कर दिया गयालेकिन यह योजना भारत में SHG आंदोलन की आधारशिला रही है 

 

SGSY का उद्देश्य: 

  • गरीबी रेखा के नीचे (BPL) जीवन यापन कर रहे ग्रामीण गरीबों को स्वरोजगार के अवसर प्रदान करना 

  • SHG के माध्यम से संगठित कर उन्हें वित्तीय सहायताप्रशिक्षणऔर विपणन समर्थन देना 

  • स्थायी और आय सृजनकारी गतिविधियों को बढ़ावा देना 

 

SGSY की प्रमुख संरचना और घटक: 

1. लक्ष्य समूह: 

  • गरीबी रेखा के नीचे के परिवार (BPL) 

  • अनुसूचित जाति/जनजातिमहिलाएँदिव्यांग और अल्पसंख्यक वर्गों को प्राथमिकता 

2. स्वयं सहायता समूह (SHG) आधारित मॉडल: 

  • 10–20 सदस्यों के SHG का गठन 

  • समूह आधारित बचत और आंतरिक ऋण व्यवस्था 

  • समूह को प्राथमिक प्रशिक्षण देने के बाद आर्थिक सहायता 

3. सहायता और बैंक ऋण: 

  • परियोजना लागत का हिस्सा अनुदान और हिस्सा बैंक ऋण 

  • अनुदान SHG और व्यक्तिगत लाभार्थियों को अनुमोदित व्यवसाय पर आधारित 

4. प्रशिक्षण और कौशल विकास: 

  • IRDP और TRYSEM के अनुभवों को शामिल कर प्रशिक्षण की व्यवस्था 

  • तकनीकीउद्यमिताविपणन और लेखा कौशल प्रदान किया गया 

5. मार्केटिंग और मूल्य वर्धन: 

  • विपणन सहायताप्रदर्शनी में भागीदारी 

  • बिक्री केंद्रविपणन संघ की स्थापना 

6. संस्थागत भागीदारी: 

  • योजना का क्रियान्वयन DRDA (District Rural Development Agency), बैंक, NGO और पंचायती राज संस्थाओं के सहयोग से 

 

SGSY के परिणाम और उपलब्धियाँ: 

सकारात्मक प्रभाव: 

  1. SHG आंदोलन को बल: भारत में महिला SHG नेटवर्क की नींव SGSY के कारण पड़ी 

  1. आर्थिक लाभ: लाखों महिलाओं और पुरुषों ने छोटे व्यवसाय शुरू कर आय अर्जन किया 

  1. बैंक लिंकेज: SHG को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ने में सफलता मिली 

  1. सामाजिक सशक्तिकरण: महिलाओं में आत्मविश्वासनिर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक भागीदारी बढ़ी 

सीमाएँ और समस्याएँ: 

  1. क्रियान्वयन में असमानता: कई राज्यों में योजना का कार्यान्वयन अपेक्षा से कमजोर रहा 

  1. प्रशिक्षण की कमी: SHG को व्यावसायिक दृष्टिकोण से प्रशिक्षित नहीं किया गया जिससे लाभ सीमित रहा 

  1. बैंक ऋण में कठिनाई: बैंकिंग संस्थाएँ गरीबों को ऋण देने में अनिच्छुक थीं 

  1. निगरानी और मूल्यांकन की कमी: योजना के प्रभाव की निगरानी हेतु कोई सशक्त प्रणाली नहीं थी 

  1. व्यवसाय का चयन: कई बार चयनित व्यवसाय स्थान और बाज़ार के अनुसार उपयुक्त नहीं थे 

 

SGSY का NRLM में परिवर्तन क्यों हुआ? 

SGSY में उपरोक्त खामियों को दूर करने और योजना को और अधिक व्यापकसमावेशी तथा समुदाय आधारित बनाने हेतु NRLM शुरू किया गया NRLM ने: 

  • समुदाय आधारित दृष्टिकोण अपनाया 

  • दीर्घकालिक क्षमता निर्माण पर ज़ोर दिया 

  • सतत आजीविका को प्राथमिकता दी 

  • बेहतर निगरानीमूल्यांकन और पारदर्शिता लाई 

 

निष्कर्ष: 

SGSY ने भारत में SHG संस्कृति को जन्म दिया और महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में पहला मंच प्रदान किया हालांकि इसमें कई संरचनात्मक और क्रियान्वयन संबंधी सीमाएँ थींफिर भी यह योजना ग्रामीण विकास के इतिहास में एक मील का पत्थर रही इसका उत्तराधिकारी NRLM आज उसी पथ पर और अधिक व्यापक रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है 

5.गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिए 

भारत जैसे विकासशील देश के लिए गरीबी उन्मूलन एक दीर्घकालिक और जटिल चुनौती है सरकार ने स्वतंत्रता के पश्चात अनेक योजनाएं चलाईं जैसे – अंत्योदय योजनास्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजनामनरेगाप्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजनाराष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन आदि इन योजनाओं का उद्देश्य था – गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों को सशक्त बनानाउन्हें स्वरोजगार देनाआवासशिक्षापोषण और स्वास्थ्य की सुविधाएं देना हालांकि इन प्रयासों के बावजूद आज भी भारत में करोड़ों लोग गरीबी के दलदल में फंसे हैं इसका मुख्य कारण है – इन योजनाओं के सामने खड़ी अनेक बाधाएँजिन पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है 

1. लक्ष्य निर्धारण में त्रुटियाँ 

अधिकांश गरीबी उन्मूलन योजनाओं में लाभार्थी चयन प्रक्रिया जटिल और अपारदर्शी होती है कई बार वास्तविक रूप से गरीब लोग छूट जाते हैं और अपात्र लोग सूची में शामिल हो जाते हैं बीपीएल सूची में त्रुटियाँ और राजनीतिक हस्तक्षेप इसके उदाहरण हैं 

2. प्रशासनिक भ्रष्टाचार 

नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार एक बड़ी बाधा है लाभार्थियों से अनावश्यक दस्तावेज मांगे जाते हैंरिश्वत की मांग होती है और योजनाओं के तहत मिलने वाला पैसा या सामग्री पूरा नहीं पहुंचता इससे गरीबों का भरोसा तंत्र पर टूटता है 

3. जन-जागरूकता की कमी 

ग्रामीण और गरीब लोगों को योजनाओं की जानकारी नहीं होती प्रचार-प्रसार का अभावसाक्षरता की कमी और डिजिटल साक्षरता का  होना उन्हें लाभ से वंचित करता है कई बार वे पात्र होते हुए भी आवेदन नहीं कर पाते 

4. स्थानीय संस्थाओं की कमजोरी 

पंचायती राज संस्थाओं और ग्राम सभाओं को योजनाओं के संचालन का अधिकार दिया गया हैलेकिन उनके पास पर्याप्त संसाधनप्रशिक्षण और जवाबदेही नहीं होती इससे योजनाएं केवल कागजों पर चलती हैं 

5. एकीकृत दृष्टिकोण का अभाव 

गरीबी बहुआयामी है – इसमें शिक्षास्वास्थ्यरोजगारआवासस्वच्छता सभी आते हैं परंतु योजनाएँ अक्सर केवल एक क्षेत्र पर केंद्रित होती हैंजिससे संपूर्ण समाधान नहीं मिलता उदाहरणयदि मनरेगा से रोज़गार मिला भीतो स्वास्थ्य और शिक्षा की समस्या बनी रहती है 

6. लाभार्थियों में आत्मनिर्भरता की कमी 

कई योजनाएं लाभ देने के बाद भी लोगों को आत्मनिर्भर नहीं बनातीं उदाहरण के लिए मुफ्त राशननकद हस्तांतरण आदि अल्पकालिक राहत तो देते हैंलेकिन दीर्घकालीन आर्थिक स्वतंत्रता नहीं दे पाते 

7. रोज़गार सृजन में सीमित प्रभाव 

स्वरोजगार योजनाओं में प्रशिक्षणऋणऔर विपणन समर्थन की कमी के कारण बहुत से गरीब लोग व्यवसाय को टिकाऊ नहीं बना पाते इससे रोजगार सृजन की प्रक्रिया विफल हो जाती है 

8. समावेशी विकास की कमी 

अनेक बार योजनाएं महिलाओंअनुसूचित जातियोंजनजातियों और अल्पसंख्यकों तक समान रूप से नहीं पहुँचतीं इससे सामाजिक असमानता बनी रहती है और गरीबी चक्र चलता रहता है 

9. निगरानी और मूल्यांकन की कमजोरी 

अधिकांश योजनाओं में निगरानी प्रणाली कमजोर है परिणाम आधारित मूल्यांकन नहीं होताकेवल खर्च की रिपोर्टिंग पर जोर दिया जाता है इससे योजनाओं की गुणवत्ता और प्रभाविता पर असर पड़ता है 

10. प्राकृतिक आपदाएं और कोविड जैसी वैश्विक घटनाएँ 

बाढ़सूखामहामारी जैसे संकट गरीबों की स्थिति को और कमजोर करते हैं ऐसी स्थिति में योजनाएं या तो बंद हो जाती हैं या उनका प्रभाव सीमित रह जाता है 

11. शहरी गरीबों की उपेक्षा 

ग्रामीण गरीबी पर तो योजनाएं हैंलेकिन तेजी से बढ़ते शहरी गरीबों – जैसे दिहाड़ी मजदूरप्रवासी श्रमिकों – के लिए पर्याप्त योजनाएं नहीं हैंजिससे उनके जीवन स्तर में सुधार नहीं होता 

निष्कर्ष: 

गरीबी उन्मूलन केवल सरकारी योजनाओं से नहीं हो सकतायह एक सामाजिक आंदोलन होना चाहिए जिसमें प्रशासनसमुदायस्वयंसेवी संगठनऔर निजी क्षेत्र सबकी भागीदारी हो योजनाओं की पारदर्शिताजवाबदेहीजागरूकतानिगरानी और बहुआयामी दृष्टिकोण ही गरीबी के चक्र को तोड़ सकते हैं साथ हीगरीबों को केवल उपभोक्ता नहींबल्कि भागीदार बनाना आवश्यक है – ताकि वे स्वयं अपने जीवन में परिवर्तन ला सकें 

6.ग्रामीण युवाओं के लिए स्वरोजगार योजना (PMEGP) की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिए 

भारत की सबसे बड़ी जनसंख्या युवाओं की हैऔर इन युवाओं का ग्रामीण भारत में बसे रहना तथा उन्हें रोज़गार देना एक बड़ी चुनौती है ग्रामीण युवाओं के लिए स्वरोजगार को बढ़ावा देने हेतु केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) की शुरुआत 2008 में की थी यह योजना खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) द्वारा क्रियान्वित की जाती है और इसका उद्देश्य ग्रामीण बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान कर आत्मनिर्भर बनाना है इस योजना के तहत ऋण के साथ-साथ अनुदान भी प्रदान किया जाता है 

PMEGP योजना की मुख्य विशेषताएं: 

  • यह योजना विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में नए उद्यम लगाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है 

  • सामान्य वर्ग के लिए अधिकतम ₹25 लाख (उद्योगऔर ₹10 लाख (सेवातक ऋण दिया जा सकता है 

  • इसमें परियोजना लागत का 15-35% तक अनुदान दिया जाता है 

  • 18 वर्ष से ऊपर के बेरोजगार व्यक्तिजिनकी न्यूनतम शिक्षा आठवीं होपात्र हैं 

1. ग्रामीण युवाओं को स्वरोजगार का अवसर 

PMEGP योजना ने ग्रामीण युवाओं को परंपरागत शिक्षा के बजाय व्यावसायिक दिशा में बढ़ने का विकल्प दिया है इससे  केवल आत्मनिर्भरता बढ़ती हैबल्कि उनका रुझान कृषि से आगे सेवा और उत्पादन क्षेत्र की ओर भी होता है 

2. महिला और कमजोर वर्गों की भागीदारी 

इस योजना के अंतर्गत अनुसूचित जातिजनजातिमहिलाओं और पूर्व सैनिकों को उच्च अनुदान प्रतिशत प्राप्त होता है इससे हाशिए पर खड़े युवाओं को व्यवसाय शुरू करने में सहूलियत होती है 

3. प्रशिक्षण और मार्गदर्शन 

PMEGP के अंतर्गत प्रशिक्षण अनिवार्य है इससे लाभार्थियों को उद्यम प्रबंधनवित्तीय साक्षरताविपणनऔर योजना निर्माण की जानकारी मिलती है यह पहल उन्हें व्यवसाय की शुरुआत और संचालन में मदद करती है 

4. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती 

जब युवा स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ते हैंतो वे अपने गांव में ही कार्य शुरू करते हैं जिससे पलायन रुकता है इसके साथ ही उनके उद्यमों से अन्य लोगों को भी रोजगार मिलता हैजिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है 

5. सीमाएँ और चुनौतियाँ 

(iजानकारी की कमी: 

कई ग्रामीण युवाओं को PMEGP योजना की जानकारी ही नहीं होती प्रचार-प्रसार की सीमितता और डिजिटल माध्यमों पर निर्भरता इसके प्रमुख कारण हैं 

(ii) ऋण प्राप्त करने की कठिनाई: 

बैंकों से ऋण स्वीकृति में बहुत समय लगता है कई बार बैंक गारंटीदस्तावेज या संपत्ति की माँग करते हैंजो गरीब युवाओं के लिए संभव नहीं होता 

(iii) प्रशिक्षण की गुणवत्ता: 

कई क्षेत्रों में प्रशिक्षण केवल औपचारिकता रह गया है प्रशिक्षण के बाद मार्गदर्शन या मेंटरशिप नहीं मिलतीजिससे युवा व्यवसायिक निर्णय लेने में असमर्थ रहते हैं 

(iv) व्यवसाय का संचालन और बाजार: 

ग्रामीण युवाओं को उत्पाद का विपणनगुणवत्ता नियंत्रणआपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन आदि की सीमित समझ होती है परिणामस्वरूप कई उद्यम कुछ वर्षों में ही बंद हो जाते हैं 

(v) कोविड-19 और आर्थिक मंदी का असर: 

कोरोना महामारी और वैश्विक मंदी ने ग्रामीण युवाओं के नए व्यवसायों पर नकारात्मक प्रभाव डाला है मांग में गिरावटकच्चे माल की कमी और परिवहन बाधाओं ने कई स्वरोजगार योजनाओं को संकट में डाला 

6. PMEGP के सकारात्मक उदाहरण 

कई राज्यों में PMEGP के माध्यम से सफल उद्यम स्थापित हुए हैंजैसे कि मधुबनी पेंटिंगजैविक कृषि उत्पादों का प्रसंस्करणमहिला स्व-सहायता समूहों द्वारा खाद्य उत्पाद निर्माणहस्तशिल्पबांस शिल्पऔर डेयरी उद्योग ये उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि यदि सही समर्थन मिले तो ग्रामीण युवा भी सफल उद्यमी बन सकते हैं 

7. प्रभावशीलता बढ़ाने के उपाय 

  • योजना का प्रचार-प्रसार जनभाषा में और स्थानीय स्तर पर किया जाए 

  • बैंकिंग प्रक्रियाओं को सरल और पारदर्शी बनाया जाए 

  • प्रशिक्षण के बाद दीर्घकालिक मेंटरशिप और निगरानी की व्यवस्था की जाए 

  • सफल उद्यमियों की कहानियाँ साझा कर दूसरों को प्रेरित किया जाए 

  • ग्रामीण क्षेत्रों में विपणन नेटवर्क और -कॉमर्स की सुविधा बढ़ाई जाए 

निष्कर्ष: 

PMEGP एक प्रभावशाली योजना है जो ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कारगर हो सकती हैबशर्ते इसका संचालन सुदृढ़पारदर्शी और सहभागी हो यह योजना केवल आर्थिक सहायता नहींबल्कि आत्मविश्वासपहचान और सामर्थ्य का माध्यम है यदि इसके क्रियान्वयन में सुधार किया जाए और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार लचीलापन लाया जाएतो यह ग्रामीण भारत में रोजगार और उद्यमिता की क्रांति ला सकती है 

7.रोजगार सृजन और कौशल विकास कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी का विश्लेषण कीजिए 

भारत जैसे विकासशील देश में महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए रोजगार और कौशल विकास अत्यंत महत्वपूर्ण उपाय हैं खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं लंबे समय तक घरेलू भूमिकाओं तक सीमित रही हैंजिससे उनकी आर्थिक भागीदारी कम रही है लेकिन पिछले कुछ दशकों में सरकार द्वारा चलाए गए विभिन्न रोजगार सृजन और कौशल विकास कार्यक्रमों ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और मुख्यधारा में लाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है इन कार्यक्रमों की सफलता महिलाओं की सक्रिय भागीदारी पर निर्भर करती हैजिसका विश्लेषण सामाजिकआर्थिक और सांस्कृतिक संदर्भों में करना जरूरी है 

1. महिलाओं की पारंपरिक भूमिका से परिवर्तन की आवश्यकता: 
ग्रामीण समाज में महिलाएं पारंपरिक रूप से कृषिपशुपालन और घरेलू कार्यों में योगदान देती रही हैंपरंतु इन्हें ‘अर्थव्यवस्था’ में शामिल नहीं किया जाता था कौशल विकास कार्यक्रमों और रोजगार योजनाओं के माध्यम से उन्हें अब स्वरोजगारउद्यमितासेवा क्षेत्र और डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है 

2. प्रमुख रोजगार सृजन योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी: 

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA): यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण साबित हुई है कानून के अनुसारकार्यबल का कम से कम 33% हिस्सा महिलाओं को होना चाहिएलेकिन कई राज्यों में यह भागीदारी 50% से भी अधिक हो गई है 

  • प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY): इस योजना के तहत महिलाओं को स्वरोजगार के लिए बिना गारंटी के ऋण उपलब्ध कराया जाता है महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से ‘शिशु ऋण’ श्रेणी में अधिक देखी गई है 

  • दीन दयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM): यह योजना महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को वित्तीय सहायताप्रशिक्षण और विपणन सहायता प्रदान करती है ग्रामीण महिलाओं ने इस योजना के तहत लघु उद्योगहस्तशिल्पकृषि उत्पाद और अन्य सेवाओं में उद्यमिता दिखाई है 

3. कौशल विकास कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी: 

  • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY): इस योजना में महिलाओं के लिए सिलाईब्यूटी पार्लरनर्सिंगफूड प्रोसेसिंगडिजिटल साक्षरता जैसी ट्रेड्स में प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है 

  • स्टेप (STEP) योजना: महिलाओं को विशेष कौशल के प्रशिक्षण के लिए केंद्र सरकार की इस योजना ने उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में काम किया है 

  • जन शक्ति योजनामहिला शक्ति केंद्र: इन योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को सरकारी सेवाओं और उद्यमिता के लिए तैयार किया जा रहा है 

4. महिलाओं की भागीदारी के सकारात्मक प्रभाव: 

  • आत्मनिर्भरता में वृद्धि: महिलाएं अब केवल घर की जिम्मेदार नहीं रहींबल्कि आय सृजन में भी योगदान देने लगी हैं 

  • निर्णय लेने की क्षमता: आर्थिक रूप से सक्षम होने से महिलाएं अपने परिवार और समुदाय में निर्णय लेने में सक्षम हो रही हैं 

  • शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रभाव: महिलाएं अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा और परिवार के स्वास्थ्य पर खर्च करती हैं 

  • महिला सशक्तिकरण: कौशल विकास और रोजगार महिलाओं को सामाजिक रूप से सशक्त बनाते हैं और उन्हें घरेलू हिंसा से बचने की भी ताकत देते हैं 

5. चुनौतियाँ और सीमाएँ: 

  • सामाजिक पूर्वाग्रह: आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का काम करना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं है 

  • परिवहन और सुरक्षा: कौशल केंद्र या कार्यस्थलों तक पहुंच में असुरक्षा और परिवहन की कमी बाधा बनती है 

  • घरेलू ज़िम्मेदारियाँ: बच्चों की देखभालपरिवार की ज़िम्मेदारियाँमहिलाओं की कार्य भागीदारी को सीमित करती हैं 

  • प्रशिक्षण की गुणवत्ता और बाज़ार से जुड़ाव: कई