IGNOU MPSE-008 Important Questions With Answers June/Dec 2026 | भारत में राज्यीय राजनीति Guide

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IGNOU MPSE-008 Important Questions With Answers June/Dec 2026 | भारत में राज्यीय राजनीति Guide

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Block-wise Top 10 Important Questions for MPS-004

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1.भारतीय संघीय ढांचे की विशेषताओं पर चर्चा कीजिए 

परिचय: 

भारत एक संघीय देश हैजहां सत्ता का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच किया गया है भारतीय संघीय ढांचे की विशेषताएं संविधान में निहित हैं और यह भारत की बहुसांस्कृतिकबहुभाषी तथा विविधतापूर्ण सामाजिक संरचना को ध्यान में रखकर बनाया गया है भारत का संघीय ढांचा केंद्रीय और राज्य सरकारों को विशिष्ट शक्तियां देता है ताकि वे स्वतंत्र रूप से और समन्वय के साथ शासन कर सकें 

भारतीय संघीय ढांचे की मुख्य विशेषताएं: 

  1. संविधान द्वारा निर्धारित संघीयता: 
    भारत का संविधान एक लिखित और पूर्णतया विस्तृत संविधान हैजिसने केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट वितरण किया है यह केंद्र-राज्य संबंधों को संवैधानिक वैधता प्रदान करता है 

  1. दोस्तरीय शासन व्यवस्था: 
    भारत में दो स्तर की सरकारें हैं — केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारें साथ ही स्थानीय सरकारें (पंचायती राज संस्थाएंभी हैंजो संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत स्वायत्त हैं 

  1. क्षेत्रीय विभाजन: 
    भारत कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित है राज्यों को सीमित क्षेत्र और जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले विधानमंडल का अधिकार प्राप्त है 

  1. शक्तियों का विभाजन (विधायीकार्यकारीन्यायिक): 
    संघीय ढांचे में शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होता है संविधान में सूचीबद्ध तीन सूचियां हैं — केंद्रीय सूचीराज्य सूचीऔर समवर्ती सूचीजिनके आधार पर विधायी शक्तियां वितरित हैं 

  1. केंद्रीय प्रभुत्व: 
    भारतीय संघीयता में केंद्र सरकार का प्रभुत्व अधिक है आपातकालीन प्रावधानों के तहत केंद्र राज्य सरकारों का नियंत्रण कर सकता हैजो भारत को 'असामान्य संघीयताका उदाहरण बनाता है 

  1. संघीय न्यायपालिका: 
    भारतीय सर्वोच्च न्यायालय संघीय विवादों को सुलझाने की भूमिका निभाता हैजिससे केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन बना रहता है 

  1. वित्तीय संघीयता: 
    वित्त आयोग राज्यों और केंद्र के बीच राजस्व वितरण का निर्धारण करता है टैक्सेशन की शक्तियां और आर्थिक संसाधन भी संविधान में स्पष्ट हैं 

  1. संघीय संशोधन प्रक्रिया: 
    संविधान संशोधन के लिए विभिन्न प्रक्रियाएं निर्धारित हैं — कुछ संशोधन केवल केंद्र संसद द्वारा किए जा सकते हैंकुछ के लिए राज्यों की भी सहमति आवश्यक है 


निष्कर्ष: 

भारतीय संघीय ढांचा एक अनूठा मॉडल हैजिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संतुलित वितरण होने के साथ-साथ केंद्र का प्रभुत्व भी है यह देश की विविधता को देखते हुए स्थिरता और एकता बनाए रखने में सहायक सिद्ध होता है संविधान में निहित संघीय प्रावधान भारत को एक सफल बहु-जातीय और बहुभाषी लोकतंत्र बनाते हैं 

 

2.उपनिवेशवाद की विरासत ने भारतीय राज्यीय राजनीति को किस प्रकार प्रभावित किया है? 

परिचय: 

भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने  केवल आर्थिक और सामाजिक संरचना को प्रभावित कियाबल्कि भारतीय राजनीति के स्वरूप और प्रक्रिया पर भी गहरा प्रभाव डाला उपनिवेशवाद की विरासत ने स्वतंत्र भारत की राज्यीय राजनीति के स्वरूप को व्यापक रूप से प्रभावित किया है यह प्रभाव आज भी कई रूपों में दिखाई देता है 

उपनिवेशवाद की विरासत और उसका प्रभाव: 

  1. प्रशासनिक संरचना: 
    ब्रिटिशकालीन प्रशासनिक व्यवस्था को स्वतंत्र भारत ने लगभग यथावत अपनाया प्रशासनिक सेवाओं का केंद्रीकरणब्यूरोक्रेसी का महत्वऔर प्रशासनिक भाषा (अंग्रेज़ीआज भी महत्वपूर्ण हैं 

  1. कानूनी और संवैधानिक प्रणाली: 
    भारतीय संविधान की संरचना में ब्रिटिश न्याय व्यवस्था और संवैधानिक प्रथाओं का प्रभाव स्पष्ट है संसदीय प्रणालीविधायिकान्यायपालिकाऔर चुनावी प्रणाली ब्रिटिश मॉडल पर आधारित हैं 

  1. राजनीतिक पार्टियों और चुनाव प्रणाली: 
    बहुदलीय व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया का जन्म ब्रिटिश शासनकाल में हुआ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राजनीतिक दलों का संगठन आजादी के बाद भी लोकतांत्रिक राजनीति का आधार बना 

  1. भाषा और सामाजिक विभाजन: 
    अंग्रेज़ी भाषा का प्रभाव राजनैतिक संवाद और शासकीय कार्यवाही में बना रहा साथ हीउपनिवेश काल के दौरान जातिधर्मऔर क्षेत्रीय पहचान पर आधारित विभाजन भी राजनीतिक गतिशीलता को प्रभावित करते हैं 

  1. संप्रभुता और केंद्र-राज्य संबंध: 
    ब्रिटिश प्रशासन ने केंद्रित शासन व्यवस्था विकसित कीजिससे आज भी केंद्र का प्रभाव राज्यों पर बना हुआ है यह राजनीतिक विवादों और संघीय तनावों का कारण भी बनता है 

  1. भूमि और कृषि नीतियां: 
    ज़मींदारी प्रथारैयत व्यवस्थाऔर भूमि सुधारों की कमी ने राज्यों में किसानों और भूमिहीनों की राजनीतिक सक्रियता को जन्म दिया राज्यीय राजनीति में किसान आंदोलन का महत्व इसी विरासत से जुड़ा है 

  1. सामाजिक-आर्थिक असमानताएं: 
    उपनिवेश काल में स्थापित सामाजिक असमानताएं और वर्ग विभाजन आज भी राजनीतिक मुद्दों के केंद्र में हैंजिनका राज्यीय राजनीति पर गहरा प्रभाव है 

  1. प्रशासनिक और राजनीतिक संस्कृति: 
    उपनिवेशीकरण ने भारतीय राजनीतिक संस्कृति में निरंतरता और बदलाव दोनों ही लाए भ्रष्टाचारनौकरशाही का दुरुपयोगऔर शासन के प्रति लोगों की धारणा इस विरासत का हिस्सा हैं 

निष्कर्ष: 

भारतीय राज्यीय राजनीति पर उपनिवेशवाद की विरासत का प्रभाव गहरा और जटिल है यह विरासत राजनीतिक संस्थाओंप्रक्रियाओंसामाजिक ढांचे और प्रशासनिक संस्कृति के रूप में आज भी मौजूद है आधुनिक भारत की राजनीतिक चुनौतियों को समझने और उन्हें दूर करने के लिए इस विरासत का सम्यक अध्ययन आवश्यक है 

 

 

3.भारत को कल्याणकारी राज्य कहे जाने के पक्ष में तर्क दीजिए 

भारत को एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) कहा जाता है क्योंकि संविधान में  केवल नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित किया गया हैबल्कि सरकार के कर्तव्यों में सामाजिकआर्थिक और सांस्कृतिक कल्याण की व्यवस्था भी निहित है कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य समाज के सभी वर्गोंविशेषकर कमजोर और वंचित तबकों को संरक्षणसमान अवसर और न्याय उपलब्ध कराना है ताकि उनका समग्र विकास हो सके भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही इस दिशा में कई कदम उठाए हैंजो इसे एक कल्याणकारी राज्य के रूप में स्थापित करते हैं 

सबसे पहलेभारत का संविधान कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर आधारित है अनुच्छेद 38 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राज्य का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक न्याय स्थापित करना है इसके साथ ही Directive Principles of State Policy (राज्य नीति के निर्देशक तत्वभारत सरकार को सामाजिक सुरक्षाशिक्षास्वास्थ्यगरीबी उन्मूलनरोजगार और सामाजिक कल्याण के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं ये तत्व स्पष्ट संकेत हैं कि भारत का राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र केवल कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नहींबल्कि नागरिकों के कल्याण के लिए भी प्रतिबद्ध है 

दूसराभारत सरकार द्वारा विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू किया गया है उदाहरण के तौर परप्रधानमंत्री आवास योजनाजन धन योजनामहात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA), प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजनासामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना आदि ऐसे कार्यक्रम हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सुरक्षा प्रदान करते हैं शिक्षा के क्षेत्र में सर्व शिक्षा अभियानमुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार (RTE Act) ने सभी बच्चों को शिक्षा तक पहुंच प्रदान की है स्वास्थ्य क्षेत्र में आयुष्मान भारत योजना जैसी स्वास्थ्य बीमा योजनाएं गरीबों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराती हैं 

तीसराभारत में सामाजिक न्याय की व्यवस्था भी कल्याणकारी राज्य की पहचान है अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजातिओबीसी और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण नीति लागू की गई है ताकि वे शिक्षारोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में पिछड़  जाएं यह नीति सामाजिक असमानताओं को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम हैजो देश को समावेशी और न्यायसंगत बनाती है 

चौथाभारत सरकार के द्वारा स्वच्छतास्वास्थय सेवामहिला सशक्तिकरणबाल संरक्षण और वृद्धजनों के लिए कल्याणकारी उपाय सुनिश्चित किए गए हैं स्वच्छ भारत अभियानबेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजनामहिला अधिकारों के लिए विभिन्न नीतियां इसके उदाहरण हैं 

इसके अलावाभारत ने आर्थिक क्षेत्र में भी सामाजिक कल्याण की दिशा में कदम बढ़ाए हैं जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से अनाजचावल आदि वस्तुओं को गरीबों तक पहुंचाना न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) किसानों की आय सुनिश्चित करता है 

अतः भारत का सामाजिकआर्थिक और राजनीतिक ढांचा इसे एक कल्याणकारी राज्य बनाता है हालांकि चुनौतियां बनी हुई हैं जैसे गरीबीबेरोजगारीभेदभावलेकिन सरकार की नीतियां और संविधान की प्रतिबद्धता इसे कल्याणकारी राज्य के रूप में स्थापित करती हैं 

 

 

4.भारत में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के विकास की व्याख्या कीजिए 

भारत में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का विकास एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना हैजिसने देश के लोकतंत्र को अधिक समावेशी और विविधतापूर्ण बनाया है क्षेत्रीय दल मुख्य रूप से किसी विशेष राज्यक्षेत्र या समुदाय के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं इनके उदय के पीछे कई सामाजिकआर्थिकसांस्कृतिक और राजनीतिक कारण हैंजिनका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति और विकास पर गहरा पड़ा है 

सबसे पहलेभारत की विशालता और विविधता ने क्षेत्रीय दलों के विकास को प्रेरित किया विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों की अपनी-अपनी भाषाएँसंस्कृतियाँजातीयताएँ और सामाजिक संरचनाएं हैं जब राष्ट्रीय दल इन विविधताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं देतेतो क्षेत्रीय दल उभरते हैं ताकि वे स्थानीय जरूरतों और मुद्दों को मजबूती से उठा सकें उदाहरण के लिएतमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमकेपश्चिम बंगाल में टीएमसीओडिशा में बीजेडी जैसे दल स्थानीय पहचान और मुद्दों के प्रति संवेदनशील हैं 

दूसराभारत में राज्यों के गठन और पुनर्गठन ने क्षेत्रीय दलों को बल दिया जैसे भाषा-आधारित राज्यों का गठन (1956 का राज्य पुनर्गठनने राज्यों के भीतर राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई और क्षेत्रीय मुद्दों को केंद्रित किया इससे यह संभव हुआ कि क्षेत्रीय दल स्थानीय प्रशासनविकास और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए अधिक सक्रिय हो सकें 

तीसरासामाजिक और आर्थिक कारक क्षेत्रीय दलों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं विभिन्न जातीय समूहसामाजिक समुदाय और आर्थिक वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए क्षेत्रीय राजनीति में शामिल होते हैं दलितओबीसीआदिवासीऔर अन्य पिछड़े वर्गों के राजनीतिक उदय ने कई क्षेत्रीय दलों को मजबूती दी है उदाहरण के लिएमहाराष्ट्र में शिवसेना ने मराठी लोगों के हितों को प्रमुखता दीजबकि झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) आदिवासी अधिकारों के लिए सक्रिय रहा 

चौथाराष्ट्रीय दलों की कमजोरियाँ भी क्षेत्रीय दलों के विकास का कारण हैं जब राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय मुद्दों की अनदेखी करते हैं या विवादास्पद निर्णय लेते हैंतो स्थानीय नेतृत्व क्षेत्रीय दलों के रूप में उभरता है क्षेत्रीय दल स्थानीय भाषण और नीति बनाने में अधिक सक्षम होते हैंजो उनकी लोकप्रियता बढ़ाता है 

पाँचवागठबंधन राजनीति ने भी क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी बनाया है 1990 के बाद से भारत में कोई भी दल बिना क्षेत्रीय दलों के सहयोग के स्थिर सरकार नहीं बना सकता क्षेत्रीय दलों का गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाता हैजिससे उनकी शक्ति और महत्व बढ़ता है 

निष्कर्ष: 
भारत में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का विकास बहुराष्ट्रीयबहु-सांस्कृतिक और बहुभाषी सामाजिक ताने-बाने की उपज है ये दल स्थानीय जनादेश और मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं क्षेत्रीय दलों के विकास ने भारत के लोकतंत्र को और समृद्ध किया हैक्योंकि वे अधिक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं इस प्रकारक्षेत्रीय दल भारत के राजनीतिक परिदृश्य में स्थायी और निर्णायक भूमिका निभाते हैं 

 

 

5.राज्य स्तर पर राष्ट्रीय दलों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? 

भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रीय दलों का प्रभाव व्यापक हैकिन्तु राज्य स्तर पर ये दल कई चुनौतियों का सामना करते हैं भारत की संघीय संरचना और विविध सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के कारण राष्ट्रीय दलों के लिए राज्यों में अपनी पकड़ बनाए रखना कठिन होता है ये चुनौतियाँ संगठनात्मकसामाजिकआर्थिक और राजनीतिक स्तर पर देखी जा सकती हैं 

भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विविधता: 

भारत के प्रत्येक राज्य की अपनी अलग सांस्कृतिकभाषाई और सामाजिक पहचान है राष्ट्रीय दलों को इन विविधताओं को समझते हुए अपनी नीतियाँ और चुनावी रणनीतियाँ बनानी पड़ती हैं परंतु कभी-कभी राष्ट्रीय स्तर की नीतियाँ स्थानीय भावनाओं और जरूरतों से मेल नहीं खातींजिससे राज्य स्तर पर उनकी स्वीकार्यता कम हो जाती है 

क्षेत्रीय दलों की मजबूती: 

राज्यीय दल स्थानीय मुद्दोंजातीय और धार्मिक पहचान पर आधारित होते हैं और उनकी पकड़ अपने राज्य में बहुत मजबूत होती है ये दल राष्ट्रीय दलों के मुकाबले अधिक प्रभावी संगठन और स्थानीय नेतृत्व प्रदान करते हैं उदाहरण के लिएपश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और तमिलनाडु में डीएमके तथा अन्नाद्रमुक का प्रभुत्व देखा जाता है इस स्थिति में राष्ट्रीय दलों के लिए मतदाताओं को आकर्षित करना चुनौतीपूर्ण होता है 

आइडियोलॉजिकल विरोधाभास: 

कई बार राष्ट्रीय दलों की विचारधारा और नीति राज्य की स्थानीय परिस्थितियों और जनभावनाओं से मेल नहीं खाती इससे वे स्थानीय मतदाताओं के बीच अपना विश्वास खो बैठते हैं उदाहरण के लिएकुछ राज्यों में किसानों और आदिवासियों के अधिकारों के मुद्दे स्थानीय दलों द्वारा प्रमुखता से उठाए जाते हैंजो राष्ट्रीय दलों के लिए चुनौती उत्पन्न करते हैं 

राजनीतिक नेतृत्व की कमी: 

राज्य स्तर पर राष्ट्रीय दलों के पास प्रभावशाली और लोकप्रिय स्थानीय नेतृत्व का अभाव भी एक बड़ी चुनौती होती है जब राज्य में मजबूत नेतृत्व नहीं होतातो स्थानीय दलों की तुलना में राष्ट्रीय दलों की चुनावी सफलता पर असर पड़ता है 

संसाधनों और संगठनात्मक संरचना का अभाव: 

राज्य स्तर पर राष्ट्रीय दलों की कमजोर संगठनात्मक संरचना और सीमित संसाधन उनके चुनाव प्रचार और जनसंपर्क को प्रभावित करता है इसके कारण वे प्रभावी तरीके से स्थानीय जनसमूहों तक अपनी बात पहुंचा पाने में विफल रहते हैं 

राजनीतिक समीकरणों और गठबंधनों की जटिलता: 

राज्यीय स्तर पर गठबंधन राजनीति बहुत प्रचलित है राष्ट्रीय दलों के लिए सही गठबंधन ढूंढ़ना और बनाए रखना एक चुनौती होती है गठबंधन विफल होने पर उनका वोट बैंक कमजोर पड़ जाता है 

 

 

निष्कर्ष: 
राज्य स्तर पर राष्ट्रीय दलों की सफलता के लिए आवश्यक है कि वे स्थानीय संस्कृतिभाषाओंसामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को समझेंमजबूत स्थानीय नेतृत्व विकसित करें और क्षेत्रीय दलों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए प्रभावी रणनीतियाँ अपनाएं केवल राष्ट्रीय नीतियों पर निर्भर रहकर राज्य चुनावों में सफलता संभव नहीं है 

6.राज्यीय चुनावों में जाति की भूमिका पर टिप्पणी कीजिए 

भारत में जाति सामाजिक और राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू रही हैऔर यह राज्यीय चुनावों में भी गहरा प्रभाव डालती है जाति आधारित मताधार और जातीय पहचान राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीतियों का मूल आधार बन चुकी है विशेषकर ग्रामीण और परंपरागत समाजों में जाति का प्रभाव अधिक गहरा है 

जाति और राजनीतिक पहचान: 

जाति केवल सामाजिक पहचान का माध्यम नहीं रह गई हैबल्कि यह राजनीतिक पहचान का भी प्रमुख आधार बन गई है राजनीतिक दल जाति के आधार पर अपने वोट बैंक बनाते हैं और अक्सर जातीय समीकरणों के अनुसार चुनावी गठबंधन करते हैं उदाहरण के लिएउत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में यादवकुर्मीजाट आदि जातियाँ विशिष्ट राजनीतिक दलों का मजबूत आधार होती हैं 

मतदाता का जातिगत मतदान: 

अक्सर मतदाता अपनी जाति के नेताओं या जाति आधारित दलों को प्राथमिकता देते हैं यह मतदान व्यवहार जातिगत सद्भावना और सामाजिक बंधनों पर आधारित होता है इससे जातीय जनसंख्या वाले क्षेत्र विशेष में दलों की सफलता और हार प्रभावित होती है 

जाति आधारित दलों का उदय: 

 
राजनीतिक दलों ने जाति आधारित राजनीति को स्वीकार करते हुए अनेक राज्यों में विशेष जातीय समूहों के लिए दलों का गठन किया है यह दल स्थानीय स्तर पर अत्यधिक प्रभावशाली होते हैं और कभी-कभी राष्ट्रीय दलों के लिए चुनौती भी बन जाते हैं 

जाति और चुनावी गठबंधन: 

राजनीतिक दलों के लिए सही जाति समीकरण बनाना आवश्यक हो गया है चुनावी गठबंधन जाति आधारित समीकरणों पर निर्भर करते हैंजिसमें दल विभिन्न जातीय समूहों के प्रतिनिधित्व के आधार पर गठबंधन करते हैं इस प्रकार की राजनीति में जाति चुनावी रणनीति का केंद्र बन जाती है 

जाति और विकास मुद्दों की अनदेखी: 

जाति आधारित राजनीति कभी-कभी विकासशिक्षास्वास्थ्य जैसे अहम मुद्दों से ध्यान भटका देती है जातिगत दबावों के कारण दल अपने एजेंडे में जाति के अनुसार प्राथमिकताएँ तय करते हैंजिससे समग्र विकास पर प्रभाव पड़ता है 

निष्कर्ष: 
राजनीति में जाति की भूमिका आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैविशेषकर राज्यीय चुनावों में हालांकि जाति आधारित राजनीति लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का एक पहलू हो सकती हैपरंतु इसके साथ-साथ सामाजिक एकता और विकास को ध्यान में रखना भी आवश्यक है दलों को जातिगत समीकरणों के साथ-साथ समावेशी और विकासोन्मुखी नीतियाँ अपनानी चाहिए 

 

7.चुनावों में धन और बाहुबल की भूमिका पर विचार कीजिए 

चुनाव लोकतंत्र का मूल आधार हैंजिनके माध्यम से जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है परंतुआधुनिक चुनावों में धन और बाहुबल (शक्ति के प्रयोगकी भूमिका एक गंभीर चुनौती के रूप में उभरती है धन और बाहुबल का चुनाव प्रक्रिया पर प्रभाव  केवल लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता हैबल्कि चुनावी निष्पक्षतासमानता और पारदर्शिता को भी बाधित करता है 

धन की भूमिका 

चुनावों में धन का महत्व बढ़ता जा रहा है राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचारप्रचार सामग्रीरोड शोमीडिया विज्ञापनचुनाव कर्मियों की नियुक्ति और मतदाताओं तक पहुंचने के लिए भारी धनराशि की आवश्यकता होती है जितना अधिक धन होता हैउतनी अधिक चुनावी मशीनरी संचालित की जा सकती है इस प्रकार धन शक्ति राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में एक निर्णायक कारक बन जाता है 

धन के दुरुपयोग के कारण कुछ उम्मीदवार अपनी आर्थिक शक्ति के बल पर चुनाव जीतने की कोशिश करते हैं वे बड़े पैमाने पर पैसे का उपयोग मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए करते हैंजैसे कि नकद वितरणउपहार देनाया चुनाव के समय मतदाताओं को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराना इस प्रक्रिया को ‘खर्चीला चुनाव’ भी कहा जाता है यह गरीब और सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए समान प्रतिस्पर्धा की संभावना को कम कर देता है 

धन का दुरुपयोग चुनाव प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देता है जब चुनाव प्रचार में धन की भूमिका बढ़ती हैतो चुनाव जीतने वाले प्रतिनिधि भी राजनीति में धन संचय के लिए अनैतिक उपायों का सहारा ले सकते हैं इससे राजनीतिक व्यवस्था में नैतिक पतन और जन विश्वास की कमी होती है 

बाहुबल की भूमिका 

चुनावों में बाहुबल यानी जबरदस्तीधमकीहिंसाऔर चुनावी डरावनी का प्रयोग भी गंभीर समस्या है कई बार राजनीतिक दल या उम्मीदवार अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हिंसागुटबाजीऔर अनुचित दबाव का सहारा लेते हैं इससे मतदाताओं के स्वतंत्र मतदान का अधिकार प्रभावित होता है 

बाहुबल का प्रयोग मतदाता भयभीत करनेविपक्ष को दबानेचुनाव कर्मियों पर दबाव डालने और चुनावी परिणामों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है यह  केवल लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध हैबल्कि चुनावों को असत्य और अनुचित बनाता है 

चुनावों में बाहुबल की समस्या विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में ज्यादा देखने को मिलती हैजहाँ सामाजिकजातीय और आर्थिक असमानताएं मौजूद होती हैं राजनीतिक दल स्थानीय दबंगों को चुनावी रणनीति के हिस्से के रूप में उपयोग करते हैं 

धन और बाहुबल के संयुक्त प्रभाव 

धन और बाहुबल दोनों मिलकर चुनावों को असमान और अनुचित बनाते हैं आर्थिक शक्ति से लैस उम्मीदवार बाहुबल का प्रयोग करने वाले समर्थकों को वित्तीय मदद प्रदान करते हैंजिससे चुनावी लड़ाई असमान हो जाती है इससे जनप्रतिनिधि चयन प्रक्रिया भ्रष्ट और प्रभावित होती है 

समाधान एवं नियंत्रण 

चुनावों में धन और बाहुबल की भूमिका को नियंत्रित करने के लिए कानूनप्रशासन और सामाजिक जागरूकता आवश्यक है चुनाव आयोग ने खर्च की सीमा निर्धारित की है और अनियमितताओं पर कार्रवाई की व्यवस्था की है इसके अलावास्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु पुलिस सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था सुदृढ़ की गई है 

सामाजिक संगठनों और मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण हैजो चुनावी अनियमितताओं को उजागर कर लोकतंत्र को स्वस्थ रखने का काम करते हैं मतदाताओं की जागरूकता भी बाहुबल और धन के दुरुपयोग को रोकने में अहम भूमिका निभाती है 

 

8.स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में चुनाव आयोग की भूमिका क्या है? 

भारत में चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था हैजिसका मुख्य कार्य लोकतंत्र की आत्मा – चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्षस्वतंत्र और पारदर्शी बनाना है चुनाव आयोग का कार्यक्षेत्र केवल चुनाव आयोजित कराने तक सीमित नहीं हैबल्कि वह चुनाव की गुणवत्ताप्रक्रिया की पारदर्शिताऔर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा भी सुनिश्चित करता है 

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता 

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता संविधान में निहित हैजो इसे केंद्र और राज्य सरकारों से स्वतंत्र बनाती है यह स्वतंत्रता चुनाव प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाव करती है आयोग के अधिकारी केवल संविधान के प्रावधानों के अनुसार कार्य करते हैं और उन्हें सरकार से निर्देश नहीं मिलते 

चुनाव की योजना और संचालन 

चुनाव आयोग चुनाव की तिथि तय करता हैचुनाव के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं करता है जैसे मतदान केंद्रों का निर्धारणमतदाता सूची तैयार करनाचुनाव कर्मियों की नियुक्ति आदि यह सुनिश्चित करता है कि चुनाव समय पर और सुव्यवस्थित तरीके से सम्पन्न हो 

चुनाव प्रचार पर नियंत्रण 

चुनाव आयोग चुनाव प्रचार के दौरान नियमों का पालन करवाता है वह राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए चुनाव खर्च की सीमा निर्धारित करता है और इसका सख्ती से पालन करवाता है साथ ही आयोग उम्मीदवारों के गलत प्रचार या अपमानजनक भाषणों पर रोक लगाता है 

सुरक्षा व्यवस्था का प्रबंधन 

चुनाव आयोग चुनाव के दौरान मतदाता और चुनाव कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है आयोग विभिन्न राज्यों के चुनाव आयोगपुलिस और प्रशासन के साथ मिलकर मतदान के दौरान बाहुबल और हिंसा को रोकने के लिए सख्त कदम उठाता है 

मतदाता जागरूकता 

चुनाव आयोग मतदाताओं को जागरूक करने के लिए विभिन्न अभियान चलाता है इससे मतदाता सही जानकारी के साथ मतदान कर सकें आयोग मतदान के महत्वविधिऔर ईवीएम मशीनों (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनके प्रयोग के बारे में जानकारी प्रदान करता है 

शिकायत निवारण और निगरानी 

चुनाव आयोग किसी भी चुनावी अनियमितता की शिकायतें सुनता है और जांच करता है वह चुनाव प्रक्रिया के दौरान वीडियो और अन्य तकनीकी साधनों से निगरानी करता है ताकि कोई दुरुपयोग  हो यदि किसी दल या व्यक्ति द्वारा नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो आयोग उचित कार्रवाई करता है 

निष्पक्षता बनाए रखना 

चुनाव आयोग राजनीतिक दबाव और बाहुबल के खिलाफ कड़े निर्देश जारी करता है वह चुनावों को निष्पक्ष बनाने के लिए कड़ी निगरानी करता है और यदि आवश्यक हो तो चुनाव स्थगित या पुनकरवाने का आदेश देता है 

 

निष्कर्ष 

चुनावों में धन और बाहुबल का अत्यधिक प्रभाव लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के लिए खतरा है इससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित होती है और जनप्रतिनिधि चयन में भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ती है इस स्थिति में चुनाव आयोग का स्वतंत्रनिष्पक्ष और सशक्त होना आवश्यक है ताकि वह चुनावों को स्वतंत्रपारदर्शी और विश्वासपूर्ण बना सके आयोग की सक्रिय भूमिका से ही भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनावी प्रणाली की गरिमा बनी रहती है और लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं 

9.भारत में राज्य स्वायत्तता की मांगों की समीक्षा कीजिए 

भारत एक संघीय ढांचे वाला देश है जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच सत्ता का विभाजन होता है राज्य स्वायत्तता की मांगें भारतीय संघ के इतिहास और विकास की एक महत्वपूर्ण विशेषता रही हैं राज्य स्वायत्तता का तात्पर्य राज्यों को उनकी राजनीतिकआर्थिक और प्रशासनिक मामलों में अधिक स्वतंत्रता देने से है इस मांग के पीछे कई कारणघटनाएँ और राजनीतिक-सांस्कृतिक कारक जिम्मेदार हैं 

राज्य स्वायत्तता की मांगों के प्रमुख कारण: 

  1. भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता: भारत विविध भाषाओंसंस्कृतियोंऔर परंपराओं वाला देश है विभिन्न राज्यों की अपनी विशिष्ट भाषाएँरीति-रिवाज और सामाजिक संरचनाएँ हैं कई बार केंद्र सरकार की नीतियाँ राज्यों की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को प्रभावित करती हैंजिससे राज्य स्वायत्तता की मांग बढ़ती है 

  1. आर्थिक असमानताएँ: कुछ राज्यों का आर्थिक विकास केंद्र या अन्य राज्यों की तुलना में कम होता है वे अपनी आर्थिक नीतियों को स्वयं निर्धारित करना चाहते हैंताकि स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके और विकास की गति बढ़े 

  1. राजनीतिक आदान-प्रदान: संघीय ढांचे में सत्ता का केंद्रीकरण राज्यों में असंतोष उत्पन्न करता है जब केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के मामलों में अधिक हस्तक्षेप किया जाता हैतो वे अपनी स्वायत्तता के लिए आवाज उठाते हैं 

  1. ऐतिहासिक घटनाएँ: उदाहरण के लिएपंजाब में 1980 के दशक में स्वायत्तता की मांगेंमिज़ोरम और नागालैंड जैसे राज्यों की अलग-अलग स्वायत्तता की मांगेंऔर तमिलनाडु में भाषा की आधार पर केंद्र की नीतियों के विरोध ने राज्य स्वायत्तता की मांग को बल दिया 

  1. राजनीतिक पार्टियों की भूमिका: क्षेत्रीय पार्टियाँ जो स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित होती हैंवे भी स्वायत्तता की मांगों को बढ़ावा देती हैंताकि वे केंद्र सरकार पर दबाव बना सकें और अपने राज्यों के हितों की रक्षा कर सकें 

राज्य स्वायत्तता की मांगों के प्रकार: 


स्वायत्तता की मांगों के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू: 

  • सकारात्मक: 

  • स्थानीय समस्याओं का बेहतर समाधान 

  • सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण 

  • क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा 

  • नकारात्मक: 

  • राष्ट्रीय एकता पर खतरा 

  • केंद्र और राज्यों के बीच टकराव 

  • कभी-कभी अस्थिरता और अलगाववाद की प्रवृत्ति 

सरकार की प्रतिक्रियाएँ और उपाय: 

  • केंद्र सरकार ने राज्यों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता देने के लिए विभिन्न आयोग बनाए (जैसे कि वित्त आयोग) 

  • राज्यों के अधिकारों को मजबूत करने के लिए संविधान संशोधन किए गए (जैसे 73वां और 74वां संशोधन पंचायतों और नगरपालिकाओं को स्वायत्तता देते हैं) 

  • क्षेत्रीय विवादों का समाधान बातचीत और समझौते के माध्यम से करने की कोशिश की गई 

निष्कर्ष: 

राज्य स्वायत्तता की मांगें भारत के संघीय ढांचे की एक जीवंत और आवश्यक विशेषता हैं सही संतुलन बनाकर केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों को समृद्ध किया जाना चाहिए ताकि राष्ट्रीय एकता बनी रहे और राज्यों को अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करने का अवसर मिले 

10.संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों से संबंधित प्रावधानों की चर्चा कीजिए 

भारत का संविधान संघीय संरचना प्रदान करता है जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच सत्ता का विभाजन स्पष्ट रूप से परिभाषित है केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों के लिए संविधान में कई प्रावधान स्थापित किए गए हैं जो इस संबंध को सुव्यवस्थित करते हैं 

संविधान में केंद्र-राज्य संबंधों के प्रमुख प्रावधान: 

  1. विभाजनात्मक सूची (Seventh Schedule): 
    संविधान की सातवीं अनुसूची केंद्र और राज्यों के अधिकार क्षेत्र को परिभाषित करती है यह तीन सूचियाँ प्रदान करती है: 

  • केंद्र सूची (Union List): ऐसे विषय जिनका निर्णय केवल केंद्र सरकार करती है (जैसे रक्षाविदेश नीति) 

  • राज्य सूची (State List): राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विषय (जैसे पुलिसस्वास्थ्य) 

  • सामान्य सूची (Concurrent List): दोनों केंद्र और राज्य सरकारें कानून बना सकती हैं (जैसे शिक्षाश्रम कानून) 

  1. केंद्र का सर्वोच्च अधिकार: 

अगर केंद्र और राज्य के कानूनों में टकराव होता हैतो आमतौर पर केंद्र का कानून प्रधान रहता है (विशेषकर Concurrent List में) यह संघीय सत्ता में केंद्र की भूमिका को मजबूत करता है 

  1. संघीय ढांचे में लचीलापन: 

  1. संविधान अनुच्छेद 356 के तहत राज्य सरकार को असफल घोषित कर केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता हैजब राज्य सरकार संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करती है यह केंद्र को राज्यों पर नियंत्रण का एक साधन देता हैहालांकि इसका दुरुपयोग भी विवादित रहा है 

  1. राज्यपाल की भूमिका: 

  1. राज्यपालजो केंद्र द्वारा नियुक्त होता हैराज्य सरकार के कार्यों पर नजर रखता है और केंद्र के हितों की रक्षा करता है 

  1. संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व: 

  1. राज्य सरकारों के प्रतिनिधि संसद के उच्च सदन (राज्यसभामें शामिल होते हैंजिससे राज्यों को राष्ट्रीय नीति निर्माण में आवाज़ मिलती है 

  1. वित्तीय संबंध: 

  1. वित्त आयोग की स्थापना केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करने के लिए की जाती है राज्यों को केंद्र से अनुदान और कर साझा करने की व्यवस्था संविधान में निहित है 


केंद्र-राज्य संबंधों की चुनौतियाँ: 

  • अधिक केंद्रीकरण: अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग की आलोचना होती रही है जिससे राज्यों की स्वायत्तता कम होती है 

  • वित्तीय निर्भरता: कई राज्य आर्थिक रूप से केंद्र पर निर्भर हैंजिससे उनकी नीति-निर्माण स्वतंत्रता सीमित होती है 

  • राजनीतिक संघर्ष: विभिन्न राजनीतिक दलों के केंद्र और राज्यों में होने से टकराव बढ़ता है 

निष्कर्ष: 

भारतीय संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के संतुलित बंटवारे का प्रयास करता हैजो एक मजबूत और लचीले संघीय ढांचे को संभव बनाता है हालांकिसमय-समय पर इस संबंध में सुधार की आवश्यकता होती है ताकि दोनों पक्षों के हितों का संरक्षण हो और देश की एकता बनी रहे 

(FAQs)

Q1. What are the passing marks for MPSE-008 ?

For the Master’s degree (MPS), you need at least 40 out of 100 in the TEE to pass.

Q2. Does IGNOU repeat questions from previous years?

Yes, approximately 60-70% of the paper consists of topics and themes repeated from previous years.

Q3. Where can I find MPS-004 Solved Assignments?

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