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1. हस्तक्षेप का अर्थ एवं प्रकार की व्याख्या कीजिए। हस्तक्षेप डिज़ाइन और वितरण के चरणों पर चर्चा कीजिए।
हस्तक्षेप (Intervention) एक व्यवस्थित और योजनाबद्ध प्रक्रिया है जिसमें पेशेवर, सामाजिक कार्यकर्ता, स्वास्थ्यकर्मी, शिक्षक, या संगठन किसी व्यक्ति, समूह, परिवार या समुदाय की समस्या को पहचान कर उसे हल करने, सुधारने या विकासात्मक परिवर्तन लाने के लिए क्रियात्मक कदम उठाते हैं। यह केवल समस्या को पहचानने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सुधार, परिवर्तन और सकारात्मक परिणाम लाने के लिए रणनीतियाँ और संसाधनों का समुचित उपयोग करता है।
हस्तक्षेप का उद्देश्य सामाजिक, मानसिक, भावनात्मक, शारीरिक या व्यवहारिक क्षेत्रों में सुधार लाना है। यह व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन दोनों में सुधार करने की प्रक्रिया है। उदाहरण के लिए, किशोरों में नशे की लत को कम करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा आयोजित सलाहकार सत्र या सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम एक प्रकार का हस्तक्षेप है।
हस्तक्षेप तीन महत्वपूर्ण दृष्टिकोण से देखा जा सकता है:
1. निवारक (Preventive) – समस्याओं को उत्पन्न होने से रोकना।
2. उपचारात्मक (Remedial / Corrective) – मौजूदा समस्याओं का समाधान करना।
3. विकासात्मक (Developmental) – व्यक्तिगत और सामाजिक क्षमताओं को बढ़ाना।
हस्तक्षेप के प्रकार
1. निवारक हस्तक्षेप (Preventive Intervention)
यह प्रकार उन समस्याओं को रोकने के लिए किया जाता है जो भविष्य में उत्पन्न हो सकती हैं। उदाहरण: स्वास्थ्य जागरूकता अभियान, टीकाकरण अभियान, किशोरों में जीवन कौशल प्रशिक्षण। इसका उद्देश्य संभावित जोखिमों को कम करना और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
2. उपचारात्मक / सुधारात्मक हस्तक्षेप (Remedial / Corrective Intervention)
यह हस्तक्षेप वर्तमान समस्याओं या कमियों को दूर करने के लिए किया जाता है। उदाहरण: शिक्षा में पिछड़े छात्रों के लिए ट्यूटरिंग, मानसिक स्वास्थ्य के लिए काउंसलिंग, व्यसन मुक्ति कार्यक्रम। इसका उद्देश्य कार्यक्षमता को पुनर्स्थापित करना और हानि को कम करना है।
3. संकट हस्तक्षेप (Crisis Intervention)
संकट के समय त्वरित और अस्थायी उपायों के माध्यम से समस्या को नियंत्रित करना। उदाहरण: प्राकृतिक आपदा, पारिवारिक संघर्ष या आत्महत्या की प्रवृत्ति में तात्कालिक मदद। इसका उद्देश्य स्थिति को स्थिर करना और तनाव को कम करना है।
4. विकासात्मक हस्तक्षेप (Developmental Intervention)
व्यक्तिगत विकास और सामाजिक प्रगति के लिए किया जाता है। उदाहरण: नेतृत्व प्रशिक्षण, कौशल विकास, सामुदायिक सशक्तिकरण कार्यक्रम। इसका उद्देश्य क्षमता और कौशल बढ़ाना है।
5. चिकित्सात्मक / नैदानिक हस्तक्षेप (Therapeutic / Clinical Intervention)
मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक या व्यवहारिक समस्याओं के उपचार के लिए किया जाता है। उदाहरण: मनोचिकित्सा, संज्ञानात्मक-व्यवहार चिकित्सा (CBT), और साइकोएजुकेशन। यह लंबी अवधि में परिवर्तन लाने पर केंद्रित होता है।
6. सामुदायिक या सामाजिक हस्तक्षेप (Community / Social Intervention)
समूह या समुदाय को लक्षित करके सामाजिक परिवर्तन लाना। उदाहरण: गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, स्वास्थ्य अभियान, शिक्षा सुधार पहल। यह संरचना, संसाधन और सामाजिक व्यवहार में सुधार लाता है।
7. संगठनात्मक हस्तक्षेप (Organizational Intervention)
संगठन में कार्यक्षमता, संचार और संस्कृति को सुधारने के लिए। उदाहरण: प्रशिक्षण, टीम निर्माण, नीतिगत सुधार। इसका उद्देश्य उत्पादकता और कार्यस्थल की संतुष्टि बढ़ाना है।
हस्तक्षेप डिज़ाइन और वितरण के चरण
1. समस्या की पहचान और मूल्यांकन (Problem Identification &
Assessment)
सबसे पहला चरण समस्या की स्पष्ट पहचान और मूल्यांकन है। इसमें अवलोकन, साक्षात्कार, सर्वेक्षण और मूल्यांकन उपकरणों के माध्यम से जानकारी एकत्रित की जाती है। समस्या की गंभीरता, प्रसार और संदर्भ को समझना आवश्यक है। उदाहरण: स्कूल में विद्यार्थियों की उपस्थिति में कमी का मूल्यांकन।
2. उद्देश्य निर्धारण (Setting Objectives)
मूल्यांकन के बाद, हस्तक्षेप के लिए स्पष्ट उद्देश्य निर्धारित किए जाते हैं। उद्देश्य SMART (Specific, Measurable, Achievable,
Relevant, Time-bound) होने चाहिए। उदाहरण: छह महीनों में गैर-हाजिरी 20% कम करना।
3. हस्तक्षेप रणनीति तैयार करना (Designing Intervention Strategy)
इसमें उपयुक्त प्रकार और विधियाँ चुनना शामिल है। उदाहरण: व्यक्तिगत काउंसलिंग, समूह कार्यशालाएँ, सामुदायिक जागरूकता अभियान। रणनीति में समयसीमा, कार्य विभाजन और संसाधन आवश्यकताओं का विवरण शामिल होता है।
4. संसाधन जुटाना (Resource Mobilization)
सफल हस्तक्षेप के लिए मानव संसाधन, सामग्री, वित्तीय और लॉजिस्टिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। उदाहरण: स्वास्थ्य अभियान के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर्मी, प्रचार सामग्री, स्थान व्यवस्था।
5. कार्यान्वयन / वितरण (Implementation / Delivery)
योजना के अनुसार हस्तक्षेप को लागू करना। इस चरण में प्रशिक्षित कर्मियों द्वारा गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं। उदाहरण: काउंसलिंग सत्र, प्रशिक्षण सत्र, समूह चर्चाएँ।
6. निगरानी और प्रतिक्रिया (Monitoring & Feedback)
निरंतर निगरानी से प्रगति और चुनौतियों की पहचान होती है। प्रतिभागियों और पर्यवेक्षकों की प्रतिक्रिया से रणनीति में आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं।
7. मूल्यांकन (Evaluation)
मूल्यांकन हस्तक्षेप की प्रभावशीलता और परिणामों को मापता है। गुणात्मक और मात्रात्मक तकनीकों से उद्देश्य की पूर्ति और परिणामों का मूल्यांकन किया जाता है।
8. अनुवर्ती कार्रवाई (Follow-Up)
सकारात्मक परिवर्तन को बनाए रखने और प्रतिगमन रोकने के लिए अनुवर्ती कार्रवाई आवश्यक है। उदाहरण: व्यसन मुक्ति के बाद नियमित चेक-इन।
9. दस्तावेजीकरण (Documentation)
हस्तक्षेप के चरण, प्रगति और परिणामों का रिकॉर्ड। यह उत्तरदायित्व, अनुसंधान और भविष्य के लिए सीख सुनिश्चित करता है।
निष्कर्ष
हस्तक्षेप एक व्यवस्थित प्रक्रिया है जो समस्या पहचान और समाधान के बीच का पुल बनाती है। विभिन्न प्रकार के हस्तक्षेप—निवारक, सुधारात्मक, संकट, विकासात्मक, चिकित्सात्मक, सामुदायिक और संगठनात्मक—विभिन्न संदर्भों में प्रयोग किए जाते हैं। डिज़ाइन और वितरण के चरण—समस्या मूल्यांकन, उद्देश्य निर्धारण, रणनीति निर्माण, संसाधन जुटाना, कार्यान्वयन, निगरानी, मूल्यांकन, अनुवर्ती कार्रवाई और दस्तावेजीकरण—हस्तक्षेप की प्रभावशीलता सुनिश्चित करते हैं।
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2. प्रतिदर्शन तकनीक की विशेषतायें एवं नियमों का वर्णन कीजिए।
प्रतिदर्शन तकनीक (Modeling / Demonstration Technique) का अर्थ
प्रतिदर्शन तकनीक वह शिक्षण और प्रशिक्षण पद्धति है जिसमें शिक्षक या प्रशिक्षक किसी व्यवहार, कौशल, कार्य या प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से दिखाता है ताकि शिष्य उसे देखकर सीख सके। यह सामाजिक सीखने और व्यवहारिक प्रशिक्षण का प्रभावी तरीका है।
प्रतिदर्शन तकनीक का उद्देश्य दृश्य और व्यवहारिक अनुभव के माध्यम से सीखना है। यह तकनीक विशेष रूप से कार्यकुशलता, तकनीकी कौशल और व्यवहारिक प्रशिक्षण में उपयोगी है।
विशेषताएँ (Characteristics)
1. दृश्य और व्यवहारिक प्रकृति: सीखने वाले को कार्य करते हुए वास्तविक उदाहरण दिखाया जाता है।
2. साक्ष्य और अनुकरण: प्रतिभागी देख सकते हैं कि कार्य कैसे किया जाता है और उसे अनुसरण कर सकते हैं।
3. सक्रिय सहभागिता: शिष्य केवल देखता नहीं, बल्कि अभ्यास और अभ्यास के माध्यम से सीखता है।
4. स्पष्ट लक्ष्य: प्रत्येक प्रतिदर्शन का उद्देश्य और सीखने का लक्ष्य स्पष्ट होता है।
5. समान्य और विशेष कौशल: तकनीक किसी सामान्य कौशल या विशेष तकनीकी कार्य के लिए लागू हो सकती है।
6. अंतरक्रियात्मक प्रक्रिया: प्रशिक्षक और शिष्य के बीच संवाद और प्रश्नोत्तर प्रक्रिया होती है।
7. अभ्यास की आवश्यकता: प्रतिदर्शन के बाद अभ्यास अनिवार्य होता है ताकि कौशल स्थायी रूप से विकसित हो।
नियम (Rules / Principles of Demonstration Technique)
1. तैयारी और योजना
प्रतिदर्शन से पहले प्रशिक्षण सामग्री, उपकरण और स्थान की व्यवस्था सुनिश्चित करें।
2. स्पष्ट उद्देश्य
सिखाने का उद्देश्य और अपेक्षित परिणाम स्पष्ट होना चाहिए।
3. सरलता और स्पष्टता
कार्य को सरल चरणों में विभाजित करें और प्रत्येक चरण को स्पष्ट रूप से दिखाएँ।
4. धीरे-धीरे प्रदर्शन
कठिन कार्य को छोटे, समझने योग्य चरणों में प्रदर्शित करें।
5. पुनरावृत्ति (Repetition)
जरूरत पड़ने पर कार्य को दोहराएं ताकि शिष्य स्पष्ट रूप से समझ सके।
6. सहभागिता प्रोत्साहित करें
शिष्यों से प्रश्न पूछें और उन्हें स्वयं प्रयास करने दें।
7. दृष्टिकोण और सुरक्षा
सभी प्रतिभागी स्पष्ट रूप से देख सकें। प्रशिक्षण में सुरक्षा नियमों का पालन करें।
8. प्रतिक्रिया और मूल्यांकन
प्रतिभागियों के अभ्यास की समीक्षा करें और सुधारात्मक सुझाव दें।
9. प्रेरणा और उत्साह बनाए रखें
प्रतिदर्शन में सकारात्मक वातावरण और प्रेरक भाषा का प्रयोग करें।
10. दस्तावेज़ीकरण और सारांश
प्रदर्शित सामग्री का सारांश और नोट्स तैयार करें।
निष्कर्ष
प्रतिदर्शन तकनीक सीखने का प्रभावी माध्यम है क्योंकि यह दृश्य अनुभव और अभ्यास दोनों को जोड़ती है। विशेषताएँ जैसे स्पष्टता, सक्रिय सहभागिता, उद्देश्य पर ध्यान और अभ्यास की आवश्यकता सीखने की प्रक्रिया को मजबूत बनाती हैं। नियमों का पालन करने से प्रशिक्षण अधिक प्रभावी और व्यावहारिक बनता है।
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3. खेल के लिए समाज मनोविज्ञान के अनुप्रयोग की व्याख्या कीजिए।
समाज मनोविज्ञान और खेल
समाज मनोविज्ञान अध्ययन करता है कि व्यक्ति का व्यवहार, सोच और भावना दूसरों की उपस्थिति, सामाजिक समूह या सामाजिक संदर्भ से कैसे प्रभावित होती है। खेल में समाज मनोविज्ञान का उद्देश्य है खिलाड़ियों के प्रदर्शन, टीम कार्य, प्रेरणा, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभाव को समझना और सुधारना।
1. प्रेरणा और लक्ष्य निर्धारण
टीम समर्थन, प्रशिक्षक की प्रेरणा, और सहकर्मी प्रोत्साहन खिलाड़ियों को लक्ष्य की ओर प्रेरित करता है। लक्ष्य स्पष्ट, चुनौतीपूर्ण और प्रगतिशील होने चाहिए। उदाहरण: फुटबॉल टीम को टूर्नामेंट जीतने के लिए दैनिक अभ्यास निर्धारित करना।
2. समूह गतिशीलता और टीम एकता
टीम की सफलता समूह की एकता, भूमिका स्पष्टता और आपसी संचार पर निर्भर करती है। समाज मनोविज्ञान समूह पहचान और सहयोग को बढ़ावा देता है। उदाहरण: क्रिकेट टीम में फील्डिंग में तालमेल।
3. नेतृत्व (Leadership)
प्रभावी नेतृत्व टीम प्रदर्शन और मनोबल को प्रभावित करता है। प्रशिक्षक को परिवर्तनकारी, लोकतांत्रिक या परिस्थितिजन्य नेतृत्व शैली अपनानी चाहिए। उदाहरण: कप्तान टीम को रणनीति तय करने में शामिल करता है।
4. सामाजिक सुविधा (Social Facilitation)
दूसरों की उपस्थिति सरल कार्यों में प्रदर्शन बढ़ाती है लेकिन जटिल कार्यों में तनाव उत्पन्न कर सकती है। उदाहरण: दर्शक मौजूद होने पर एथलीट तेज दौड़ सकता है लेकिन जटिल जंप तकनीक में गलती कर सकता है।
5. तनाव और चिंता प्रबंधन
खेल में उच्च तनाव और दबाव होते हैं। समाज मनोविज्ञान तकनीक जैसे विश्राम प्रशिक्षण, संज्ञानात्मक पुनर्गठन और टीम समर्थन तनाव कम करते हैं।
6. दृष्टिकोण और व्यवहार परिवर्तन
खिलाड़ियों के दृष्टिकोण और अनुशासन पर प्रभाव डालता है। उदाहरण: सकारात्मक भाषा, मॉडलिंग और पुरस्कृत व्यवहार अच्छे प्रशिक्षण की ओर ले जाते हैं।
7. संघर्ष समाधान
टीम में व्यक्तित्व या भूमिका के कारण संघर्ष हो सकते हैं। समाज मनोविज्ञान संचार प्रशिक्षण, मध्यस्थता और वार्ता के माध्यम से समाधान करता है।
8. दर्शक व्यवहार और खेल भावना
खेल में दर्शक और समूह प्रभाव खिलाड़ी के प्रदर्शन और खेल भावना को प्रभावित करता है। हिंसा रोकने और खेल भावना बढ़ाने के लिए सामाजिक मनोवैज्ञानिक रणनीतियाँ लागू की जाती हैं।
9. आत्मविश्वास और आत्मकुशलता (Self-Efficacy)
खिलाड़ियों का आत्मविश्वास प्रदर्शन, प्रयास और सहनशीलता बढ़ाता है। सकारात्मक प्रतिक्रिया, रोल मॉडल और मानसिक कल्पना आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करते हैं।
10. प्रशिक्षण और पुनर्वास में अनुप्रयोग
चोट के बाद प्रशिक्षण, समूह चिकित्सा और परामर्श खिलाड़ियों को पुनः सक्रिय और मानसिक रूप से तैयार करने में मदद करते हैं।
निष्कर्ष
समाज मनोविज्ञान खेलों में प्रेरणा, टीम एकता, नेतृत्व, तनाव प्रबंधन, दृष्टिकोण परिवर्तन, संघर्ष समाधान, दर्शक व्यवहार और आत्मविश्वास को समझने और सुधारने का महत्वपूर्ण उपकरण है। इसका उपयोग प्रशिक्षण, प्रदर्शन, पुनर्वास और खेल प्रबंधन में किया जाता है। सामाजिक मनोविज्ञान के अनुप्रयोग से खेल में प्रदर्शन, मनोबल और टीम भावना में सुधार होता है।
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सत्रीय कार्य II
निम्नलिखित संक्षिप्त श्रेणी के प्रत्येक प्रश्नों के उत्तर लगभग 100 शब्दों में दीजिए। प्रत्येक प्रश्न के 5 अंक है।
4. क्षेत्र शोध अध्ययन विधि (Field Study
Research Methods)
क्षेत्र शोध अध्ययन विधि सामाजिक और व्यवहारिक विज्ञान में एक महत्वपूर्ण अनुसंधान तकनीक है। इसमें डेटा एकत्रित करना प्राकृतिक, वास्तविक परिस्थितियों में किया जाता है, न कि नियंत्रित प्रयोगशालाओं में। यह विधि वास्तविक सामाजिक व्यवहार, समूह क्रियाकलाप, और पारिस्थितिकीय संदर्भ को समझने में मदद करती है।
1. अवलोकन (Observation):
- अवलोकन क्षेत्र अध्ययन का मुख्य उपकरण है।
- सहभागी अवलोकन (Participant Observation): शोधकर्ता समुदाय का हिस्सा बनकर अध्ययन करता है।
- गैर-सहभागी अवलोकन (Non-participant Observation): शोधकर्ता केवल देखता और रिकॉर्ड करता है, बिना हस्तक्षेप किए।
- यह सामाजिक रीतियों, परंपराओं, और अंतर-व्यक्तिगत व्यवहार का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करता है।
2. साक्षात्कार और अनौपचारिक बातचीत:
- संरचित, अर्ध-संरचित, या असंरचित साक्षात्कार द्वारा गहन जानकारी प्राप्त की जाती है।
- अनौपचारिक बातचीत शोधकर्ता को प्रतिभागियों के दृष्टिकोण और व्यवहार के पीछे की मानसिकता समझने में मदद करती है।
3. केस स्टडी (Case Study):
- यह किसी विशेष व्यक्ति, समूह, या समुदाय के गहन अध्ययन पर आधारित होती है।
- अवलोकन, साक्षात्कार, और दस्तावेज़ीकरण जैसे विभिन्न स्रोतों से डेटा एकत्रित किया जाता है।
- सामाजिक समस्याओं और विशेष परिस्थितियों की जटिलताओं को समझने में मदद मिलती है।
4. सर्वेक्षण और प्रश्नावली:
- संरचित प्रश्नावली या सर्वेक्षण डेटा को संख्यात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं।
- यह व्यवहार और दृष्टिकोणों का व्यापक विश्लेषण करने में सहायक होते हैं।
5. क्षेत्र अध्ययन की विशेषताएँ:
- वास्तविक जीवन का डेटा प्रदान करता है।
- सामाजिक व्यवहार को प्राकृतिक परिस्थितियों में समझने में मदद करता है।
- दीर्घकालिक परिवर्तन और पैटर्न को ट्रैक करने की क्षमता देता है।
6. सीमाएँ:
- समय और संसाधन की अधिक आवश्यकता।
- पर्यवेक्षक का पूर्वाग्रह डेटा को प्रभावित कर सकता है।
- सीमित नमूने के कारण सामान्यीकरण कठिन।
निष्कर्ष:
क्षेत्र शोध अध्ययन विधि सामाजिक व्यवहार और परिप्रेक्ष्य को समझने में अनिवार्य है। अवलोकन, साक्षात्कार, केस स्टडी और सर्वेक्षण द्वारा शोधकर्ता वास्तविक जीवन की जटिलताओं को समझ सकता है।
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5. समाज अधिगम सिद्धांत के अनुप्रयोग (Applications
of Social Learning Theory)
सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory) का विकास अलबर्ट बांदूरा ने किया। यह सिद्धांत बताता है कि लोग अनुभव, अवलोकन और अनुकरण के माध्यम से सीखते हैं। यह व्यवहार और संज्ञानात्मक दृष्टिकोण को जोड़ता है।
1. शिक्षा में अनुप्रयोग:
- शिक्षक अपने व्यवहार और दृष्टिकोण के माध्यम से छात्रों को मॉडलिंग करते हैं।
- छात्र सहपाठियों और शिक्षकों का अवलोकन करके सामाजिक और नैतिक कौशल सीखते हैं।
- सहकारी अधिगम और रोल-प्लेइंग जैसे तरीकों का प्रयोग किया जाता है।
2. कार्यस्थल प्रशिक्षण:
- प्रशिक्षण और मेंटरिंग प्रोग्रामों में कर्मचारी वरिष्ठ सहयोगियों का अवलोकन करके सीखते हैं।
- संगठनात्मक व्यवहार और नियमों का पालन अवलोकन से आसान होता है।
3. पालन-पोषण और बाल विकास:
- माता-पिता बच्चों के लिए आदर्श होते हैं।
- बच्चों द्वारा सामाजिक कौशल, भाषा, और नैतिक व्यवहार का अधिगम अवलोकन और अनुकरण से होता है।
- सकारात्मक प्रोत्साहन (reinforcement) से व्यवहार सुदृढ़ होता है।
4. मीडिया प्रभाव:
- टीवी, फिल्म, और ऑनलाइन सामग्री का व्यवहार पर प्रभाव देखा जाता है।
- स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता अभियान अवलोकन और मॉडलिंग के माध्यम से प्रभाव डालते हैं।
5. चिकित्सा और व्यवहार संशोधन:
- कग्निटिव-बिहेवियरल थैरेपी (CBT)
में सामाजिक अधिगम सिद्धांत का उपयोग किया जाता है।
- इच्छित व्यवहार के मॉडलिंग और पुरस्कार के माध्यम से पुनर्वास और परिवर्तन किया जाता है।
निष्कर्ष:
सामाजिक अधिगम सिद्धांत शिक्षा, कार्यस्थल, पालन-पोषण, मीडिया, और चिकित्सा में व्यापक रूप से लागू होता है। अवलोकन, अनुकरण और सकारात्मक प्रोत्साहन से व्यवहार और दृष्टिकोण विकसित होते हैं।
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6. समूह एवं समूह प्रक्रिया (Group and
Group Processes)
समूह ऐसे व्यक्तियों का संग्रह है जो संवाद करते हैं और साझा उद्देश्य के लिए कार्य करते हैं। समूह और उसकी प्रक्रियाओं का अध्ययन सामाजिक मनोविज्ञान और संगठनात्मक व्यवहार में महत्वपूर्ण है।
1. समूह के प्रकार:
- प्राथमिक समूह: परिवार, मित्र समूह – अंतरंग और स्थायी।
- द्वितीयक समूह: कार्यस्थल, समिति – उद्देश्य-केन्द्रित।
- संदर्भ समूह (Reference Group): आदर्श और मूल्यांकन के लिए आधार।
2. समूह गठन:
- समानता, निकटता, और साझा हितों पर समूह बनते हैं।
- समूह में भूमिका, स्थिति, और नियम विकसित होते हैं।
3. समूह प्रक्रिया:
- नियम (Norms): अपेक्षित व्यवहार।
- भूमिका (Roles): प्रत्येक सदस्य के कार्य और जिम्मेदारी।
- संगठन (Cohesion): सहयोग और प्रतिबद्धता बढ़ाने वाला बंधन।
- संचार (Communication): निर्णय और तालमेल के लिए सूचना का आदान-प्रदान।
- संघर्ष और समाधान: मतभेद प्रबंधन और बातचीत से हल।
4. महत्व:
- समूह व्यक्ति के व्यवहार, पहचान, और सामाजिककरण को प्रभावित करते हैं।
- यह सहयोग, समस्या-समाधान और भावनात्मक समर्थन प्रदान करता है।
5. चुनौतियाँ:
- संघर्ष, समूह प्रभाव, सामाजिक आलस्य (social loafing) और दबाव।
- प्रभावी नेतृत्व और स्पष्ट नियम समूह की कार्यक्षमता बढ़ाते हैं।
निष्कर्ष:
समूह और उनकी प्रक्रियाएँ सामाजिक और संगठनात्मक जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। उनके गठन, भूमिकाओं, नियमों और संचार की समझ प्रभावी सहभागिता और सहयोग सुनिश्चित करती है।
7. अभिकृति का निर्माण (Attitude
Formation)
अभिकृति (Attitude) किसी व्यक्ति की किसी व्यक्ति, वस्तु या विचार के प्रति सकारात्मक, नकारात्मक या तटस्थ मूल्यांकन होती है। यह भावनाओं, विचारों और व्यवहार को प्रभावित करती है। अभिकृति का निर्माण जीवन के प्रारंभिक चरणों से ही शुरू होता है और विभिन्न सामाजिक, मानसिक और शैक्षिक अनुभवों के माध्यम से विकसित होता है।
1. अभिकृति निर्माण के कारक:
- सीखना (Learning):
- क्लासिकल कंडीशनिंग (Classical
Conditioning) और ऑपरेन्ट कंडीशनिंग (Operant
Conditioning) द्वारा अभिकृतियाँ बनती हैं।
- सकारात्मक या नकारात्मक अनुभव व्यक्ति की अभिकृति को प्रभावित करते हैं।
- सामाजिक प्रभाव (Social Influence):
- परिवार, मित्र, शिक्षक और समाज के मानक अभिकृति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- सामाजिक सहयोग और अनुकरण (Modeling)
के माध्यम से व्यक्ति अपने दृष्टिकोण को internalize
करता है।
- संज्ञानात्मक कारक (Cognitive Factors):
- ज्ञान, विश्वास और सूचना से व्यक्ति किसी वस्तु या विचार का मूल्यांकन करता है।
- समझ और तर्कशील विचार व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
- भावनात्मक कारक (Affective Factors):
- अनुभव से उत्पन्न भावनाएँ और सहानुभूति (Empathy)
अभिकृति निर्माण में योगदान करती हैं।
- किसी अनुभव से उत्पन्न सकारात्मक या नकारात्मक भावना व्यवहार को प्रभावित करती है।
2. अभिकृति निर्माण के सिद्धांत:
- लर्निंग थ्योरी:
- सीखने के माध्यम से व्यक्ति नई अभिकृतियाँ अपनाता है।
- संज्ञानात्मक विसंगति सिद्धांत (Cognitive Dissonance
Theory):
- जब व्यक्ति की मान्यताएँ और व्यवहार मेल नहीं खाते, तो वह अभिकृति को संशोधित करता है।
- कार्यात्मक दृष्टिकोण (Functional Approach):
- अभिकृतियाँ उपयोगिता, आत्म-सुरक्षा, मूल्य-प्रकट और ज्ञानात्मक कार्य करती हैं।
3. अभिकृति का व्यवहार पर प्रभाव:
- अभिकृति व्यक्ति के निर्णय, सामाजिक बातचीत और व्यवहार को दिशा देती है।
- सकारात्मक अभिकृति प्रेरणा, सहभागिता और सामाजिक सुधार को बढ़ावा देती है।
- नकारात्मक अभिकृति अस्वीकृति, तनाव और विरोध को जन्म देती है।
निष्कर्ष:
अभिकृति का निर्माण सीखने, सामाजिक प्रभाव, संज्ञानात्मक और भावनात्मक कारकों से होता है। यह व्यवहार और दृष्टिकोण को प्रभावित करती है। अभिकृति के निर्माण और परिवर्तन को समझना शिक्षा, मनोविज्ञान और सामाजिक सुधार में महत्वपूर्ण है।
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8. कर्मचारियों का कार्य से जुड़ाव (Employee
Engagement)
कर्मचारी कार्य से जुड़ाव (Employee Engagement) वह मानसिक और भावनात्मक प्रतिबद्धता है जो कर्मचारी को संगठन के उद्देश्यों के प्रति प्रेरित करती है। यह संगठनात्मक सफलता, उत्पादकता और कर्मचारियों की संतुष्टि के लिए महत्वपूर्ण है।
1. कार्य से जुड़ाव के घटक:
- संज्ञानात्मक (Cognitive): कर्मचारी का संगठन के उद्देश्यों और रणनीतियों पर विश्वास।
- भावनात्मक (Emotional): कार्य के प्रति सकारात्मक लगाव और उत्साह।
- व्यवहारिक (Behavioral): अतिरिक्त प्रयास, संगठन के हित में सक्रिय योगदान।
2. कार्य से जुड़ाव प्रभावित करने वाले कारक:
- नेतृत्व (Leadership): सहभागी, पारदर्शी और सहयोगी नेतृत्व जुड़ाव को बढ़ाता है।
- कार्य का डिजाइन (Job Design): चुनौतीपूर्ण और अर्थपूर्ण कार्य, स्वायत्तता और कौशल विकास अवसर।
- मान्यता और पुरस्कार (Recognition &
Rewards): प्रयास और उपलब्धियों की सराहना जुड़ाव बढ़ाती है।
- कार्य-जीवन संतुलन (Work-Life Balance): लचीले कार्य समय और सहायक नीतियाँ संतोष बढ़ाती हैं।
3. कार्य से जुड़ाव के लाभ:
- उत्पादकता और प्रदर्शन में वृद्धि।
- कर्मचारी प्रतिधारण और वफादारी बढ़ती है।
- नवाचार और संगठनात्मक विकास को प्रोत्साहन।
निष्कर्ष:
कर्मचारी कार्य से जुड़ाव संगठन की सफलता और कर्मचारियों की संतुष्टि के लिए आवश्यक है। यह संज्ञानात्मक, भावनात्मक और व्यवहारिक कारकों के माध्यम से प्रभावित होता है।
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9. प्ररेणा (Motivation)
प्रेरणा (Motivation) वह मानसिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति के लक्ष्य-उन्मुख व्यवहार को उत्प्रेरित और दिशा देती है। यह आंतरिक (Intrinsic) और बाहरी (Extrinsic) हो सकती है।
1. प्रेरणा के सिद्धांत:
- मास्लो की आवश्यकता हायरार्की (Maslow’s Hierarchy of
Needs): आवश्यकताओं की श्रृंखला – शारीरिक, सुरक्षा, सामाजिक, सम्मान और आत्म-साक्षात्कार।
- हर्ज़बर्ग का दो-कारक सिद्धांत (Two-Factor Theory):
- हाइजीन फैक्टर – असंतोष रोकते हैं।
- प्रेरक फैक्टर – संतोष और सफलता बढ़ाते हैं।
- एक्सपेक्टेंसी थ्योरी (Expectancy Theory): अपेक्षित परिणाम और उसके मूल्य के आधार पर प्रेरणा।
- स्व-निर्धारण सिद्धांत (Self-Determination
Theory): स्वायत्तता, क्षमता और संबंधितता प्रेरणा के मुख्य स्रोत।
2. प्रेरणा के महत्व:
- कार्य प्रदर्शन और उत्पादकता में सुधार।
- व्यक्तिगत विकास और कौशल संवर्द्धन।
- संगठनात्मक और शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति।
3. व्यावहारिक अनुप्रयोग:
- कार्यस्थल: पुरस्कार, पदोन्नति, प्रशंसा।
- शिक्षा: प्रोत्साहन, फीडबैक, सक्रिय अधिगम।
- स्वास्थ्य: व्यवहार परिवर्तन और जागरूकता।
निष्कर्ष:
प्रेरणा मानव व्यवहार का केंद्रीय घटक है। सिद्धांत और तकनीक सीखने, कार्य प्रदर्शन और व्यक्तिगत विकास के लिए उपयोगी हैं।
10. वातावरण पर मानव व्यवहार का प्रभाव (Effect of
Human Behavior on Environment)
मानव व्यवहार का पर्यावरण पर व्यापक प्रभाव है। यह प्राकृतिक संसाधनों, पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करता है।
1. प्रदूषण (Pollution):
- औद्योगिकीकरण, परिवहन और शहरीकरण से वायु,
जल और मृदा प्रदूषण।
- अनियंत्रित कचरा और अपशिष्ट प्रबंधन की कमी।
2. संसाधनों का शोषण (Resource
Exploitation):
- वन कटाई, मछली पकड़ने और खनन।
- ऊर्जा, जल और कच्चे माल की अत्यधिक मांग।
3. जलवायु परिवर्तन (Climate Change):
- जीवाश्म ईंधन जलाना,
वनों की कटाई,
औद्योगिक उत्सर्जन।
- ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि, वैश्विक तापमान और चरम मौसम।
4. कचरा उत्पादन (Waste Generation):
- ठोस, इलेक्ट्रॉनिक और रासायनिक कचरे का पर्यावरणीय नुकसान।
- रिसाइक्लिंग और सतत प्रथाओं की आवश्यकता।
5. पर्यावरण संरक्षण (Environmental Conservation):
- स्थायी कृषि, पुनर्वनीकरण, जागरूकता अभियानों से सकारात्मक प्रभाव।
निष्कर्ष:
मानव व्यवहार पर्यावरणीय स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। जिम्मेदार उपभोग, स्थायी अभ्यास और नीति पालन आवश्यक है।
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11. आत्म प्रत्यक्षीकरण एवं उनके शैक्षिक परिणाम (Self-Perception
and Their Academic Consequences)
आत्म-प्रत्यक्षीकरण (Self-Perception) व्यक्ति की अपनी क्षमताओं, गुणों और व्यवहार के प्रति समझ और मूल्यांकन है। यह शैक्षिक प्रदर्शन, प्रेरणा और सीखने की प्रक्रिया पर प्रभाव डालता है।
1. शैक्षिक आत्म-संकल्प (Academic Self-Concept):
- छात्रों की अपनी क्षमता, बुद्धिमत्ता और कौशल के प्रति विश्वास।
- सकारात्मक आत्म-धारणा प्रयास और सक्रिय सहभागिता बढ़ाती है।
2. आत्म-क्षमता (Self-Efficacy):
- अपनी योग्यता पर विश्वास लक्ष्य निर्धारण और समस्याओं के समाधान में मदद करता है।
- कम आत्म-क्षमता चिंता, विलंब और कम प्रदर्शन का कारण बनती है।
3. प्रतिक्रिया और आत्म-प्रत्यक्षीकरण:
- अंक, शिक्षक प्रतिक्रिया और सहपाठी मूल्यांकन आत्म-धारणा को प्रभावित करते हैं।
- सकारात्मक प्रोत्साहन मोटिवेशन और जुड़ाव बढ़ाता है।
4. व्यवहारिक परिणाम:
- सकारात्मक आत्म-प्रत्यक्षीकरण से विद्यार्थी कक्षा में सक्रिय, पहल करने वाले और चुनौतियों का सामना करने वाले बनते हैं।
- नकारात्मक दृष्टिकोण से टालमटोल, कम प्रदर्शन और सीखने में कम रुचि होती है।
5. हस्तक्षेप (Interventions):
- प्रोत्साहन, लक्ष्य निर्धारण, मार्गदर्शन और कौशल विकास से आत्म-प्रत्यक्षीकरण सुधार सकते हैं।
- यह शैक्षिक सफलता और मनोवैज्ञानिक विकास में सहायक है।
निष्कर्ष:
आत्म-प्रत्यक्षीकरण शैक्षिक प्रेरणा, जुड़ाव और उपलब्धियों पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है। सकारात्मक आत्म-संकल्प और समर्थन शैक्षिक सफलता और सीखने की क्षमता बढ़ाते हैं।
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