Free IGNOU BHDAE-182 HINDI Complete Assignment Guide 2025-26
1 संप्रेषण के अर्थ, महत्व तथा प्रकार्यों की व्याख्या कीजिए। संप्रेषण प्रक्रिया के तत्व पर चर्चा कीजिए।
संप्रेषण (Communication) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने विचार, भावनाएँ, ज्ञान, अनुभव या सूचना दूसरों तक पहुँचाते हैं और उनसे समझदारी प्राप्त करते हैं। यह केवल भाषाई नहीं बल्कि अभिव्यक्तिक, सांकेतिक और व्यवहारिक माध्यमों के द्वारा भी होता है। संप्रेषण का उद्देश्य समझ पैदा करना, सूचना साझा करना और सामाजिक या संगठनात्मक क्रियाओं में सहयोग सुनिश्चित करना होता है।
संप्रेषण का अर्थ केवल सूचना देना या लेना नहीं है, बल्कि इसमें अर्थ बनाने, विचार साझा करने और प्रतिक्रिया प्राप्त करने की प्रक्रिया शामिल है। सामाजिक जीवन, शिक्षा, व्यवसाय, प्रशासन, स्वास्थ्य और संस्कृति सभी क्षेत्रों में संप्रेषण का महत्वपूर्ण स्थान है।
उदाहरण के लिए, शिक्षक का कक्षा में विद्यार्थियों से संवाद, डॉक्टर का मरीज को बीमारी समझाना, और प्रबंधक का कर्मचारियों को निर्देश देना संप्रेषण के वास्तविक उदाहरण हैं।
संप्रेषण का महत्व
1. सामाजिक संबंधों में सहयोग
संप्रेषण व्यक्ति को दूसरों के साथ जोड़ता है। यह पारिवारिक, मित्रता और सामाजिक संबंधों को मजबूत करता है।
2. संगठनात्मक कुशलता
व्यवसाय और संगठन में संप्रेषण कार्यों का समन्वय, निर्णय और नीति कार्यान्वयन में मदद करता है।
3. शिक्षा और ज्ञान प्रसार
शिक्षा में संप्रेषण ज्ञान और कौशल का आदान-प्रदान सुनिश्चित करता है। यह शिक्षक और छात्र के बीच समझ पैदा करता है।
4. समस्या समाधान और संघर्ष प्रबंधन
स्पष्ट और प्रभावी संप्रेषण के माध्यम से गलतफहमियाँ कम होती हैं और संघर्ष का समाधान होता है।
5. प्रेरणा और प्रभाव
संप्रेषण प्रेरणा और मनोबल बढ़ाता है। अच्छे संदेश और प्रोत्साहन कार्यों में सुधार लाते हैं।
6. सामाजिक जागरूकता
समाचार, विज्ञापन, और जनजागरण अभियान संप्रेषण के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाते हैं।
संप्रेषण के प्रकार
1. मौखिक संप्रेषण (Verbal Communication)
- इसमें शब्दों का प्रयोग करके विचार व्यक्त किए जाते हैं।
- उदाहरण: बातचीत, भाषण, टेलीफोन वार्ता।
2. लिखित संप्रेषण (Written Communication)
- पत्र, ईमेल, रिपोर्ट, नोट्स और मैसेज लिखित संप्रेषण के उदाहरण हैं।
- यह स्थायी रिकॉर्ड और जटिल विचार व्यक्त करने में सहायक है।
3. गैर-मौखिक संप्रेषण (Non-Verbal
Communication)
- इसमें हाव-भाव, चेहरे के भाव, शारीरिक भाषा, इशारे और प्रतीक शामिल हैं।
- उदाहरण: हाथ हिलाना, मुस्कान, आँखों का संपर्क।
4. दृश्य संप्रेषण (Visual Communication)
- चित्र, ग्राफ़, चार्ट, वीडियो और प्रेज़ेंटेशन।
- यह जानकारी को सहज और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करता है।
5. डिजिटल / इलेक्ट्रॉनिक संप्रेषण (Digital / Electronic Communication)
- मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया, वीडियो कॉल।
- समय और स्थान की बाधा को दूर करता है।
6. औपचारिक और अनौपचारिक संप्रेषण (Formal &
Informal Communication)
- औपचारिक: संगठन में नीतिगत संदेश, निर्देश।
- अनौपचारिक: सामाजिक और व्यक्तिगत बातचीत।
संप्रेषण प्रक्रिया के तत्व
संप्रेषण प्रक्रिया में कई घटक होते हैं जो संदेश को प्रभावी बनाने और समझ सुनिश्चित करने में मदद करते हैं।
1. प्रेषक (Sender / Communicator)
- वह व्यक्ति या संगठन जो संदेश भेजता है।
- प्रेषक को विचार स्पष्ट, संगठित और उपयुक्त माध्यम के अनुसार तैयार करना चाहिए।
2. संदेश (Message)
- प्रेषक द्वारा भेजी जाने वाली सूचना,
विचार या भावना।
- यह स्पष्ट, सटीक और उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए।
3. अभिव्यक्तिकरण / एन्कोडिंग (Encoding)
- विचारों को शब्दों, प्रतीकों या संकेतों में रूपांतरित करना।
- उदाहरण: किसी घटना का वर्णन करने के लिए कहानी या चित्र का उपयोग।
4. माध्यम / चैनल (Channel / Medium)
- संदेश पहुँचाने का मार्ग।
- उदाहरण: फेस-टू-फेस, ईमेल, पोस्टर, सोशल मीडिया।
5. प्राप्तकर्ता (Receiver / Audience)
- वह व्यक्ति या समूह जो संदेश प्राप्त करता है।
- प्राप्तकर्ता का पूर्वज्ञान, अनुभव और संस्कृति संदेश की व्याख्या में भूमिका निभाता है।
6. डिकोडिंग (Decoding)
- प्राप्तकर्ता द्वारा संदेश का अर्थ निकालना।
- गलत व्याख्या या भ्रम होने पर संदेश का उद्देश्य प्रभावित होता है।
7. प्रतिक्रिया / फीडबैक (Feedback)
- प्राप्तकर्ता की प्रतिक्रिया संदेश की समझ और प्रभाव को दर्शाती है।
- फीडबैक के माध्यम से प्रेषक संदेश में सुधार कर सकता है।
8. शोर / बाधाएँ (Noise / Barriers)
- कोई भी बाहरी या आंतरिक तत्व जो संप्रेषण को बाधित करे।
- उदाहरण: शारीरिक शोर,
भाषा अंतर, मानसिक तनाव, सांस्कृतिक भिन्नताएँ।
9. संदर्भ (Context / Environment)
- भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक वातावरण।
- संदर्भ संदेश के अर्थ और प्रभाव को प्रभावित करता है।
10. उद्देश्य (Purpose)
- संप्रेषण का लक्ष्य: जानकारी देना, प्रभावित करना, मनोरंजन, नियम या दिशा निर्देश देना।
निष्कर्ष
संप्रेषण एक बहुआयामी, निरंतर प्रक्रिया है जो सामाजिक, संगठनात्मक, शैक्षिक और व्यक्तिगत जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके प्रकार—मौखिक, लिखित, गैर-मौखिक, दृश्य, डिजिटल और औपचारिक/अनौपचारिक—विभिन्न संदर्भों में उपयोगी हैं। संप्रेषण प्रक्रिया के तत्व—प्रेषक, संदेश, एन्कोडिंग, माध्यम, प्राप्तकर्ता, डिकोडिंग, फीडबैक, शोर, संदर्भ और उद्देश्य—समझने से संदेश अधिक प्रभावी और स्पष्ट बनता है।
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2 अभिप्रेरणा के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
अभिप्रेरणा
(Motivation) वह आंतरिक या बाहरी शक्ति है जो व्यक्ति के व्यवहार, प्रयास और लक्ष्य
की दिशा को प्रारंभ, मार्गदर्शन और बनाए रखती है। यह किसी कार्य को शुरू करने, उसे जारी
रखने और सफलतापूर्वक पूरा करने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है।
उदाहरण:
विद्यार्थी परीक्षा में अच्छा अंक प्राप्त करने के लिए नियमित अध्ययन करता है, और कर्मचारी
उच्च प्रदर्शन के लिए प्रयासरत रहता है।
अभिप्रेरणा
व्यक्ति की आवश्यकताओं, इच्छा, लक्ष्य और सामाजिक परिवेश से प्रभावित होती है।
अभिप्रेरणा के सिद्धांत (Theories of Motivation)
A. आवश्यकता
आधारित सिद्धांत (Content /
Need-Based Theories)
ये
सिद्धांत यह बताते हैं कि कौन-सी आवश्यकताएँ व्यक्ति के व्यवहार को प्रेरित
करती हैं।
1. मास्लो का
आवश्यकता पदानुक्रम (Maslow’s
Hierarchy of Needs)
- मास्लो ने मानव
आवश्यकताओं को पांच स्तरों में वर्गीकृत किया:
1. भौतिक / शारीरिक आवश्यकताएँ: भोजन, पानी, आवास।
2. सुरक्षा आवश्यकताएँ: सुरक्षा, स्थिरता।
3. सामाजिक आवश्यकताएँ: प्रेम, मित्रता, सम्बन्ध।
4. स्वाभिमान आवश्यकताएँ: सम्मान, उपलब्धि।
5. स्व-प्राप्ति आवश्यकताएँ: आत्म-विकास, रचनात्मकता।
- व्यक्ति पहले निचले
स्तर की आवश्यकताओं को पूरा करता है और फिर उच्चतर आवश्यकताओं की ओर प्रेरित
होता है।
- उदाहरण: गरीब
परिवार का बच्चा पहले भोजन सुनिश्चित करता है, फिर
शिक्षा में उत्कृष्टता की ओर बढ़ता है।
2. अडलरफर का ERG सिद्धांत (Alderfer’s ERG Theory)
- तीन प्रकार की
आवश्यकताएँ: Existence (E),
Relatedness (R), Growth (G)।
- यह सिद्धांत मास्लो
की तुलना में लचीला है और रिग्रेशन की संभावना स्वीकार करता है।
3. हर्ज़बर्ग
का दो-कारक सिद्धांत (Herzberg’s
Two-Factor Theory)
- हाइजीन कारक: वे जो
असंतोष रोकते हैं (जैसे वेतन, कार्यस्थल की स्थिति)।
- प्रेरक कारक: वे जो
संतोष और प्रेरणा बढ़ाते हैं (उपलब्धि, जिम्मेदारी, मान्यता)।
4. मैकक्लीलैंड
का आवश्यकता सिद्धांत (McClelland’s
Theory of Needs)
- मुख्य आवश्यकताएँ: उपलब्धि
(nAch), संबंध (nAff), शक्ति (nPow)।
- प्रत्येक व्यक्ति
की प्रमुख आवश्यकता उसके प्रेरक व्यवहार को प्रभावित करती है।
B. प्रक्रिया
आधारित सिद्धांत (Process
Theories)
ये
सिद्धांत कैसे और क्यों व्यक्ति प्रेरित होता है पर केंद्रित हैं।
1. व्रूम का
प्रत्याशा सिद्धांत (Vroom’s
Expectancy Theory)
- Motivation =
Expectancy × Instrumentality × Valence
- व्यक्ति तभी
प्रेरित होता है जब प्रयास से प्रदर्शन, प्रदर्शन
से पुरस्कार और पुरस्कार की मूल्यता सभी उपयुक्त हों।
2. एडम्स का
समानता सिद्धांत (Adam’s
Equity Theory)
- व्यक्ति अपनी
इनपुट-आउटपुट तुलना दूसरों से करता है। असमानता होने पर वह अपने प्रयास या
दृष्टिकोण को बदल सकता है।
3. लॉक का
लक्ष्य निर्धारण सिद्धांत (Locke’s
Goal-Setting Theory)
- स्पष्ट और
चुनौतीपूर्ण लक्ष्य उच्च प्रदर्शन की प्रेरणा देते हैं।
- उदाहरण: स्पष्ट
बिक्री लक्ष्य वाली टीम अधिक सक्रिय होती है।
4. स्किनर का
सुदृढीकरण सिद्धांत (Reinforcement
Theory)
- व्यवहार उसके
परिणामों द्वारा प्रभावित होता है।
- सकारात्मक
सुदृढीकरण, नकारात्मक सुदृढीकरण और दंड प्रेरणा को नियंत्रित करते
हैं।
C. आधुनिक /
समकालीन सिद्धांत
1. आत्म-निर्णय
सिद्धांत (Self-Determination
Theory - Deci & Ryan)
- आंतरिक प्रेरणा और
बाहरी प्रेरणा पर केंद्रित।
- तीन मूलभूत
आवश्यकताएँ: स्वायत्तता, क्षमता, संबंध।
2. संज्ञानात्मक
मूल्यांकन सिद्धांत (Cognitive
Evaluation Theory)
- बाहरी पुरस्कार
आंतरिक प्रेरणा को प्रभावित कर सकते हैं।
निष्कर्ष
अभिप्रेरणा
व्यक्ति के व्यवहार और प्रदर्शन को संचालित करने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
इसकी समझ से शिक्षा, संगठन, खेल और सामाजिक कार्य में लक्ष्य प्राप्ति, उत्पादकता
और मानसिक संतोष सुनिश्चित किया जा सकता है। आवश्यकता आधारित और प्रक्रिया आधारित
सिद्धांतों का संयोजन व्यवहार और मनोवैज्ञानिक प्रेरणाओं को प्रभावी ढंग से समझने
में मदद करता है।
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सत्रीय कार्य II
निम्नलिखित मध्य श्रेणी के प्रत्येक प्रश्नों के उत्तर लगभग 250 शब्दों में दीजिए। प्रत्येक प्रश्न के 10 अंक है।
3 लेविन का मॉडल और परिवर्तन के प्रबंधन के तरीके की व्याख्या कीजिए।
परिवर्तन (Change) संगठन और समाज के लिए आवश्यक है क्योंकि यह विकास और सुधार को प्रेरित करता है। हालाँकि, परिवर्तन प्रक्रिया जटिल होती है और इसमें व्यक्ति और संगठनात्मक स्तर पर प्रतिरोध उत्पन्न हो सकता है। कर्ट लेविन (Kurt Lewin) ने परिवर्तन को समझने और प्रबंधित करने के लिए एक सरल और प्रभावी तीन-चरणीय मॉडल विकसित किया: Unfreeze – Change – Refreeze। यह मॉडल सामाजिक मनोविज्ञान और संगठनात्मक व्यवहार में व्यापक रूप से लागू किया जाता है।
1. लेविन का तीन-चरणीय मॉडल:
(i) Unfreezing – स्थिति को बदलने की तैयारी:
- यह पहला चरण है जिसमें संगठन और व्यक्ति पुराने व्यवहार, प्रक्रियाओं और मान्यताओं को चुनौती देते हैं।
- उद्देश्य है परिवर्तन की आवश्यकता के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना।
- तकनीकें:
- स्पष्ट और प्रभावी संचार के माध्यम से परिवर्तन का महत्व समझाना।
- पुराने दृष्टिकोण और व्यवहार के नकारात्मक परिणाम दिखाना।
- कर्मचारियों और सदस्यों को भागीदारी के अवसर देना।
- प्रशिक्षण और समर्थन के माध्यम से आत्मविश्वास बढ़ाना।
(ii) Change (Transition) – परिवर्तन को लागू करना:
- इस चरण में नए व्यवहार, प्रक्रियाएँ और संरचनाएँ लागू की जाती हैं।
- यह सीखने, प्रयोग और अनुकूलन का चरण है।
- रणनीतियाँ:
- प्रशिक्षण और विकास: कर्मचारियों को नई प्रणाली या तकनीक से परिचित करना।
- रोल मॉडलिंग: नेताओं और परिवर्तन एजेंटों के माध्यम से आदर्श व्यवहार प्रदर्शित करना।
- भागीदारी: सभी हितधारकों को योजना और कार्यान्वयन में शामिल करना।
- सहायता प्रणाली: मार्गदर्शन, संसाधन और फीडबैक प्रदान करना।
(iii) Refreezing – स्थिरीकरण:
- इस चरण का उद्देश्य परिवर्तन को स्थायी रूप से संगठन में स्थापित करना है।
- तकनीकें:
- नए व्यवहारों को पुरस्कार, मान्यता और प्रशंसा के माध्यम से मजबूत करना।
- नीति, प्रक्रिया और संगठनात्मक संस्कृति को नए बदलाव के अनुरूप बनाना।
- परिणामों की निगरानी और फीडबैक के माध्यम से सुधार करना।
- सफलता का जश्न मनाकर प्रतिबद्धता और प्रेरणा बनाए रखना।
2. परिवर्तन के प्रबंधन के तरीके:
- नेतृत्व की प्रतिबद्धता: परिवर्तन की सफलता के लिए नेताओं का समर्थन और सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
- संचार: परिवर्तन का कारण, लाभ और प्रक्रिया स्पष्ट रूप से साझा करना।
- कर्मचारी भागीदारी: कर्मचारियों को योजना, निर्णय और कार्यान्वयन में शामिल करना।
- प्रशिक्षण और कौशल विकास: नई प्रणाली और तकनीक को अपनाने के लिए कर्मचारियों को तैयार करना।
- प्रोत्साहन और पुरस्कार: सकारात्मक बदलाव को अपनाने के लिए मान्यता और पुरस्कार देना।
- सतत निगरानी और फीडबैक: सुधार की जरूरतों और चुनौतियों की पहचान करना।
- संस्कृति का समायोजन: संगठनात्मक मूल्य और मान्यताओं को नए परिवर्तन के अनुरूप बनाना।
निष्कर्ष:
लेविन का मॉडल परिवर्तन की मानव-केंद्रित प्रक्रिया पर जोर देता है। Unfreeze – Change – Refreeze चरणों के माध्यम से परिवर्तन को व्यवस्थित रूप से लागू किया जा सकता है। प्रभावी प्रबंधन में नेतृत्व, संचार, भागीदारी, प्रशिक्षण और संस्कृति का अनुकूलन आवश्यक है। यह मॉडल आज भी संगठन और समाज में परिवर्तन के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होता है।
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4 नेतृत्व के सिद्धांत का वर्णन कीजिए।
नेतृत्व (Leadership) वह क्षमता है जो किसी व्यक्ति को समूह या संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए दूसरों को प्रेरित और मार्गदर्शन करने में सक्षम बनाती है। नेतृत्व की प्रकृति और प्रभाव को समझने के लिए कई सिद्धांत विकसित हुए हैं।
1. गुण सिद्धांत (Trait Theory):
- यह सिद्धांत मानता है कि नेता विशेष गुणों और व्यक्तित्व लक्षणों के आधार पर प्रभावशाली होते हैं।
- प्रमुख लक्षण: बुद्धिमत्ता, आत्मविश्वास, संकल्प, ईमानदारी और सामाजिकता।
- सीमा: यह दृष्टिकोण परिस्थितिजन्य कारकों और सीखे गए व्यवहार को नजरअंदाज करता है।
2. व्यवहार सिद्धांत (Behavioral Theory):
- नेतृत्व की प्रभावशीलता के लिए नेता के व्यवहार पर ध्यान केंद्रित करता है।
- प्रमुख शैलियाँ:
- Autocratic (संबंधित):
निर्णय केवल नेता द्वारा लिया जाता है।
- Democratic (लोकतांत्रिक):
निर्णय में समूह की भागीदारी होती है।
- Laissez-faire: नेता न्यूनतम हस्तक्षेप करता है।
- यह सिद्धांत यह दर्शाता है कि नेतृत्व कौशल सीखा और विकसित किया जा सकता है।
3. परिस्थितिजन्य और अनुकूलन सिद्धांत (Contingency & Situational
Theories):
- नेतृत्व की सफलता स्थिति और पर्यावरण पर निर्भर करती है।
- Fiedler’s Contingency Model: नेता की शैली और परिस्थितियों का मेल प्रभावशीलता निर्धारित करता है।
- Hersey-Blanchard Situational Leadership: नेता को अनुयायियों की क्षमता और तैयारियों के अनुसार शैली बदलनी चाहिए।
4. रूपांतरण और लेन-देन नेतृत्व (Transformational & Transactional
Leadership):
- Transformational Leadership: दृष्टि, प्रेरणा और नवाचार के माध्यम से अनुयायियों को प्रभावित करता है।
- Transactional Leadership: नियम, पुरस्कार और दंड के माध्यम से प्रदर्शन नियंत्रित करता है।
5. सेवक और सहभागी नेतृत्व (Servant & Participative
Leadership):
- Servant Leadership: अनुयायियों की भलाई को प्राथमिकता देता है।
- Participative Leadership: कर्मचारियों को निर्णय और प्रक्रिया में शामिल करता है।
निष्कर्ष:
नेतृत्व सिद्धांत व्यक्ति के गुण, व्यवहार और स्थिति की समझ प्रदान करते हैं। प्रभावी नेतृत्व व्यक्तिगत और संगठनात्मक सफलता के लिए आवश्यक है। आधुनिक संगठन में नेता को गुण, कौशल, लचीलापन और नैतिकता के मिश्रण की आवश्यकता होती है।
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5 कार्य संतुष्टि के पूर्ववृत्त पर चर्चा कीजिए।
कार्य
संतुष्टि (Job Satisfaction) किसी कर्मचारी की अपने कार्य, संगठन और
कार्य परिवेश के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण है। यह कर्मचारी के प्रदर्शन, जुड़ाव और
संगठनात्मक सफलता को प्रभावित करता है।
1. कार्य का
स्वरूप (Nature of Work):
- चुनौतीपूर्ण, अर्थपूर्ण
और स्वायत्त कार्य संतोष बढ़ाते हैं।
- एकरस, नीरस
या अस्पष्ट कार्य संतोष को कम करते हैं।
2. वेतन और
पुरस्कार (Compensation &
Rewards):
- उचित वेतन, बोनस
और लाभ संतोष बढ़ाते हैं।
- गैर-आर्थिक
पुरस्कार जैसे मान्यता, पदोन्नति और प्रशंसा भी महत्वपूर्ण हैं।
3. कार्य
परिवेश (Work Environment):
- सुरक्षित, आरामदायक
और सहयोगी वातावरण संतोष बढ़ाता है।
- प्रतिकूल या
असुरक्षित वातावरण असंतोष उत्पन्न करता है।
4. नेतृत्व और
पर्यवेक्षण (Leadership &
Supervision):
- सहायक, पारदर्शी
और सहभागी नेतृत्व संतोष को प्रभावित करता है।
- खराब नेतृत्व, पक्षपात
या अत्यधिक नियंत्रण असंतोष बढ़ाता है।
5. सहकर्मियों
के साथ संबंध (Interpersonal
Relationships):
- सकारात्मक सहयोग और
समर्थन कार्य संतोष बढ़ाते हैं।
- संघर्ष, प्रतिस्पर्धा
या भेदभाव असंतोष को जन्म देते हैं।
6. संगठनात्मक
संस्कृति और मूल्य (Organizational
Culture & Values):
- कर्मचारियों के मूल्य
और संगठनात्मक संस्कृति का मेल संतोष को बढ़ाता है।
- असंगत या अनुचित
संस्कृति असंतोष उत्पन्न करती है।
7. नौकरी की
सुरक्षा और विकास (Job
Security & Career Development):
- स्थिरता, पदोन्नति
और कौशल विकास अवसर संतोष को बढ़ाते हैं।
- असुरक्षा और विकास
के अवसरों की कमी असंतोष का कारण हैं।
8. कार्य-जीवन
संतुलन (Work-Life Balance):
- लचीले समय, अवकाश
और व्यक्तिगत जिम्मेदारियों का समर्थन संतोष बढ़ाता है।
- अत्यधिक कार्यभार
और असंतुलन असंतोष और तनाव पैदा करते हैं।
निष्कर्ष:
कार्य
संतुष्टि कई कारकों पर निर्भर करती है: कार्य का स्वरूप, वेतन, पर्यावरण, नेतृत्व, सहकर्मी
संबंध, संस्कृति, करियर और संतुलन। संगठनात्मक सफलता और कर्मचारी जुड़ाव
सुनिश्चित करने के लिए इन कारकों का अनुकूलन आवश्यक है।
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सत्रीय कार्य III
निम्नलिखित संक्षिप्त श्रेणी के प्रत्येक प्रश्नों के उत्तर लगभग 100 शब्दों में दीजिए। प्रत्येक प्रश्न के 6 अंक है।
6. सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social
Learning Theory)
सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory) अल्बर्ट बंडुरा द्वारा प्रतिपादित किया गया था। यह सिद्धांत बताता है कि व्यक्ति केवल प्रत्यक्ष अनुभव या शारीरिक अभ्यास से ही नहीं बल्कि अन्य लोगों के व्यवहार का अवलोकन, अनुकरण और मॉडलिंग के माध्यम से भी सीखते हैं। यह व्यवहारवाद (Behaviorism) और संज्ञानात्मक दृष्टिकोण (Cognitive Approach) के बीच का सेतु है, क्योंकि यह सीखने में संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं और सामाजिक वातावरण दोनों को महत्व देता है।
1. मुख्य तत्व
- अवलोकन (Observation): व्यक्ति दूसरों के कार्यों और उनके परिणामों का अवलोकन करके सीखते हैं।
- मॉडलिंग (Modeling): बच्चे, कर्मचारी या समाज के अन्य सदस्य अपने आस-पास के प्रभावशाली व्यक्तियों के व्यवहार को अपनाते हैं।
- अनुकरण (Imitation): देखा गया व्यवहार तब अपनाया जाता है जब उसके परिणाम सकारात्मक हों।
- प्रोत्साहन और दंड (Reinforcement and Punishment): दूसरों के अनुभवों से मिलने वाले पुरस्कार और दंड सीखने को प्रभावित करते हैं।
- संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ (Cognitive Processes): ध्यान (attention), स्मरण (retention), पुनरुत्पादन (reproduction) और प्रेरणा (motivation)
सीखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
2. सिद्धांत के सिद्धांत
- सीखना सीधे प्रदर्शन से जुड़ा नहीं होता; व्यक्ति सीखी गई चीजों को तुरंत प्रदर्शित नहीं करता।
- मॉडल की योग्यता, आकर्षण और समानता सीखने की प्रभावशीलता को बढ़ाती है।
- आत्म-प्रभावकारिता (self-efficacy) सीखने और व्यवहार अपनाने में महत्वपूर्ण होती है।
3. प्रयोगात्मक और व्यावहारिक अनुप्रयोग
- शिक्षा में: शिक्षक सकारात्मक व्यवहार, अध्ययन की आदत और अनुशासन मॉडल के रूप में कार्य करते हैं।
- संगठन में: कर्मचारी वरिष्ठ अधिकारियों और सहकर्मियों के व्यवहार का अवलोकन कर कार्यकुशलता सीखते हैं।
- सामाजिक व्यवहार: सामाजिक नियम,
नैतिक मूल्य और सहानुभूति जैसी क्षमताएँ भी मॉडलिंग से विकसित होती हैं।
- मीडिया प्रभाव: टीवी और सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले व्यवहार युवा पीढ़ी पर गहरा प्रभाव डालते हैं।
4. महत्व
- सामाजिक वातावरण और अनुभवों की भूमिका को उजागर करता है।
- सीखने में संज्ञानात्मक और प्रेरक तत्वों का समावेश करता है।
- व्यवहार परिवर्तन, मेंटरशिप और रोल मॉडलिंग के लिए उपयोगी है।
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7. प्रशिक्षण एवं विकास की अवधारणा (Concept of
Training and Development)
प्रशिक्षण और विकास (T&D) संगठन की प्रक्रिया है जो कर्मचारियों के ज्ञान, कौशल और दक्षता को बढ़ाने के लिए लागू की जाती है। प्रशिक्षण (Training) तत्काल कार्यकुशलता पर केंद्रित होता है, जबकि विकास (Development) दीर्घकालिक वृद्धि और कैरियर की तैयारी पर आधारित होता है।
1. परिभाषा
- प्रशिक्षण: वर्तमान नौकरी के लिए आवश्यक तकनीकी और व्यवहारिक कौशल सिखाने की प्रणाली।
- विकास: भविष्य की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के लिए कर्मचारियों को तैयार करना।
2. उद्देश्य
- कर्मचारी प्रदर्शन और उत्पादकता बढ़ाना।
- कौशल अंतर को कम करना और तकनीकी दक्षता सुधारना।
- कर्मचारियों की प्रेरणा, संतोष और निष्ठा को बढ़ावा देना।
- नेतृत्व और कैरियर उन्नति के लिए कर्मचारियों को तैयार करना।
3. प्रशिक्षण के प्रकार
- ऑन-द-जॉब प्रशिक्षण: नौकरी पर प्रत्यक्ष मार्गदर्शन, मेंटरिंग, कोचिंग, कार्य-प्रतिनिधित्व।
- ऑफ-द-जॉब प्रशिक्षण: कार्यशालाएँ, सेमिनार, सिमुलेशन और ई-लर्निंग प्रोग्राम।
4. विकास के महत्व
- प्रबंधन और नेतृत्व क्षमता का निर्माण।
- समस्या-समाधान और नवाचार को प्रोत्साहित करना।
- उत्तराधिकार योजना और संगठनात्मक वृद्धि में मदद।
5. निष्कर्ष
प्रशिक्षण और विकास कर्मचारियों और संगठन के लक्ष्यों को जोड़कर, प्रदर्शन बढ़ाने, संगठनात्मक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित करता है।
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8. नेतृत्व पर भारतीय दृष्टिकोण (Indian
Perspective on Leadership)
भारतीय नेतृत्व परंपरा और आधुनिक संगठनात्मक प्रथाओं का मिश्रण है। इसमें सामूहिक हित, नैतिक मूल्य और सामाजिक जिम्मेदारी को महत्व दिया जाता है।
1. प्रमुख लक्षण
- सामूहिकता (Collectivism): निर्णय और कार्य में समूह की भलाई को महत्व।
- नैतिक और धार्मिक मूल्य: नेतृत्व में ईमानदारी, धर्म और सामाजिक न्याय अपेक्षित।
- पारंपरिक सम्मान: वरिष्ठता, पद और सामाजिक स्थिति का आदर।
- आध्यात्मिक दृष्टिकोण: निर्णयों में नैतिक और सामाजिक मूल्यों का समावेश।
2. नेतृत्व शैलियाँ
- पितृसत्तात्मक नेतृत्व (Paternalistic): कर्मचारियों की देखभाल और मार्गदर्शन।
- आकर्षक नेतृत्व (Charismatic): प्रेरक और दूरदर्शी नेतृत्व।
- सहभागी नेतृत्व (Participative): टीम को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना।
3. सांस्कृतिक प्रभाव
- भारत में नेतृत्व संबंध और भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर आधारित होता है।
- सामाजिक और दीर्घकालिक परिणामों को ध्यान में रखते हुए निर्णय।
4. निष्कर्ष
भारतीय नेतृत्व में परंपरागत मूल्य और आधुनिक प्रबंधन तकनीक का मिश्रण होता है, जो नैतिकता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सामाजिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता देता है।
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9. कार्य स्थल में भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional
Intelligence in Workplace)
भावनात्मक बुद्धिमत्ता (EI) वह क्षमता है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने और दूसरों के भावनाओं को समझता, नियंत्रित और उपयोग करता है। डैनियल गोलमैन ने EI को पांच प्रमुख घटकों में विभाजित किया है: आत्म-जागरूकता, आत्म-नियंत्रण, प्रेरणा, सहानुभूति और सामाजिक कौशल।
1. घटक
- आत्म-जागरूकता: अपने भावनाओं और उनके प्रभाव को समझना।
- आत्म-नियंत्रण: आवेगों को नियंत्रित करना और पेशेवर व्यवहार बनाए रखना।
- प्रेरणा: लक्ष्य प्राप्ति के लिए भावनाओं का उपयोग करना।
- सहानुभूति: सहकर्मियों की भावनाओं और दृष्टिकोण को समझना।
- सामाजिक कौशल: प्रभावी संवाद,
संघर्ष समाधान और टीम वर्क।
2. महत्व
- बेहतर पारस्परिक संबंध और सहयोग को बढ़ावा।
- नेतृत्व और निर्णय क्षमता में सुधार।
- संघर्ष और तनाव कम करना।
- कर्मचारी संतोष और उत्पादकता बढ़ाना।
3. अनुप्रयोग
- भर्ती और पदोन्नति में EI का मूल्यांकन।
- टीम-बिल्डिंग और सहयोगात्मक गतिविधियों में उपयोग।
- विवाद प्रबंधन और प्रेरक नेतृत्व में मदद।
4. निष्कर्ष
कार्य स्थल में भावनात्मक बुद्धिमत्ता सफलता के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सामाजिक जटिलताओं को संभालने, टीम नेतृत्व करने और व्यक्तिगत कल्याण बनाए रखने में मदद करती है।
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10. तनाव के स्रोत (Sources of
Stress)
तनाव वह प्रतिक्रिया है जो व्यक्ति उन दबावों और मांगों के प्रति करता है जो उसकी सहनशीलता से बाहर होती हैं। तनाव के स्रोत व्यक्तिगत, सामाजिक, पर्यावरणीय और कार्यस्थल से संबंधित हो सकते हैं।
1. व्यक्तिगत स्रोत
- स्वास्थ्य समस्याएँ, आत्म-सम्मान की कमी, वित्तीय कठिनाइयाँ।
- व्यक्तित्व विशेषताएँ: पूर्णतावाद, प्रतिस्पर्धा और निर्णय लेने में कठिनाई।
2. कार्यस्थल स्रोत
- कार्यभार और समय की कमी।
- भूमिका अस्पष्टता या संघर्ष।
- संगठनात्मक संस्कृति या समर्थन की कमी।
- नौकरी की असुरक्षा और न्यूनतम स्वायत्तता।
3. सामाजिक स्रोत
- पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और संघर्ष।
- सामाजिक अपेक्षाएँ और सहकर्मी दबाव।
- रिश्तों में तनाव और असहमतियाँ।
4. पर्यावरणीय स्रोत
- शोर, प्रदूषण और खराब कार्य वातावरण।
- प्राकृतिक आपदाएँ और जीवन स्थितियों में कठिनाइयाँ।
- यातायात और आवागमन में चुनौतियाँ।
5. समाधान और मुकाबला रणनीतियाँ
- समय प्रबंधन और प्राथमिकताओं का निर्धारण।
- ध्यान, योग और व्यायाम जैसी विश्राम तकनीक।
- सामाजिक समर्थन का लाभ: परिवार, मित्र और सलाहकार।
- संगठनात्मक उपाय: लचीले कार्य समय, कर्मचारी सहायता कार्यक्रम।
6. निष्कर्ष
तनाव कई स्रोतों से उत्पन्न होता है। प्रभावी पहचान और प्रबंधन मानसिक स्वास्थ्य, उत्पादकता और जीवन की गुणवत्ता सुनिश्चित करता है।

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