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1. क) 'जीवाणुओं का मानव जीवन पर उनक लाभदायक क्रियाकलापों के द्वारा अत्यधिक प्रभाव होता है। इसे उदाहरणों के साथ वर्णित कीजिए।
जीवाणु (Bacteria) सूक्ष्म, एककोशिकीय जीव होते हैं जो पृथ्वी पर सर्वत्र पाए जाते हैं। सामान्यतः जीवाणुओं को रोग उत्पन्न करने वाले जीवों के रूप में देखा जाता है, परंतु वास्तव में अधिकांश जीवाणु मानव जीवन के लिए अत्यंत लाभकारी होते हैं। मानव स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, पर्यावरण संरक्षण, औषधि निर्माण तथा जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जीवाणुओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1. मानव स्वास्थ्य में जीवाणुओं की भूमिका
मानव शरीर में करोड़ों लाभकारी जीवाणु पाए जाते हैं जिन्हें सामान्य सूक्ष्मजीव समुदाय या माइक्रोबायोटा कहा जाता है। ये जीवाणु आंतों, त्वचा, मुख और श्वसन तंत्र में रहते हैं। आंतों में पाए जाने वाले लैक्टोबैसिलस और ई.कोलाई जैसे जीवाणु भोजन के पाचन में सहायता करते हैं और विटामिन K तथा विटामिन B-समूह का संश्लेषण करते हैं। ये जीवाणु रोगजनक जीवों को बढ़ने से रोककर प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाते हैं।
2. पाचन एवं पोषण में भूमिका
मनुष्य कुछ जटिल कार्बोहाइड्रेट और रेशेदार पदार्थों को स्वयं नहीं पचा सकता। आंतों के जीवाणु इन पदार्थों को तोड़कर उपयोगी पोषक तत्वों में परिवर्तित करते हैं। इससे ऊर्जा प्राप्त होती है और पाचन तंत्र स्वस्थ रहता है। पशुओं में जीवाणु सेल्यूलोज के पाचन में सहायक होते हैं, जिससे दूध और मांस जैसे खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ती है।
3. औषधि एवं चिकित्सा में योगदान
जीवाणुओं का उपयोग अनेक एंटीबायोटिक दवाओं के निर्माण में किया जाता है। स्ट्रेप्टोमाइसीज़ जीवाणु से स्ट्रेप्टोमाइसिन, टेट्रासाइक्लिन जैसी औषधियाँ बनाई जाती हैं। आनुवंशिक रूप से परिवर्तित जीवाणुओं द्वारा इंसुलिन, मानव वृद्धि हार्मोन और वैक्सीन का उत्पादन किया जाता है, जिससे मधुमेह और अन्य रोगों का उपचार संभव हुआ है।
4. खाद्य उद्योग में भूमिका
जीवाणु खाद्य पदार्थों के किण्वन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दही, पनीर, पनीर, छाछ आदि बनाने में लैक्टोबैसिलस जीवाणु का उपयोग होता है। सिरका एसीटोबैक्टर जीवाणु द्वारा बनाया जाता है। किण्वन से भोजन का स्वाद, पोषण और संरक्षण क्षमता बढ़ती है।
5. कृषि में उपयोगिता
जीवाणु मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक होते हैं। राइजोबियम जीवाणु दलहनी पौधों की जड़ों में सहजीवी रूप में रहकर वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करता है। एज़ोटोबैक्टर और क्लोस्ट्रीडियम स्वतंत्र रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।
6. पर्यावरण संरक्षण में भूमिका
जीवाणु जैव अपशिष्टों को विघटित कर पोषक तत्वों को पुनः पर्यावरण में लौटाते हैं। सीवेज उपचार संयंत्रों में जीवाणु गंदे पानी को शुद्ध करते हैं। जैव उपचार (बायोरिमेडिएशन) में जीवाणु तेल रिसाव और विषैले पदार्थों को हटाने में उपयोग किए जाते हैं।
7. उद्योग एवं जैव प्रौद्योगिकी में योगदान
जीवाणुओं से लैक्टिक अम्ल, एसीटिक अम्ल, एंजाइम तथा जैव ईंधन का उत्पादन किया जाता है। ई.कोलाई जैसे जीवाणु आनुवंशिक अनुसंधान में मॉडल जीव के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
निष्कर्ष
इस प्रकार जीवाणु मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लाभकारी भूमिका निभाते हैं। स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और पर्यावरण संरक्षण में जीवाणुओं का योगदान मानव सभ्यता के लिए अनिवार्य है।
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ख) स्वच्छ चित्र के साथ लयजनक (लाइसोजेनिक) चक्र को बताइए।
लाइसोजेनिक चक्र जीवाणुभक्षी विषाणुओं (बैक्टीरियोफेज) का एक प्रमुख प्रजनन चक्र है, जिसमें विषाणु का डीएनए जीवाणु के डीएनए में समाहित होकर निष्क्रिय अवस्था में रहता है।
1. लाइसोजेनिक चक्र की परिभाषा
जब विषाणु अपना आनुवंशिक पदार्थ जीवाणु के गुणसूत्र में जोड़कर कई पीढ़ियों तक बिना कोशिका को नष्ट किए रहता है, तो इसे लाइसोजेनिक चक्र कहते हैं। इस अवस्था में विषाणु डीएनए को प्रोफेज कहते हैं।
2. लाइसोजेनिक चक्र के चरण
संलग्नन (Attachment) – विषाणु जीवाणु की कोशिका भित्ति से जुड़ता है।
प्रवेशन (Penetration) – विषाणु अपना डीएनए जीवाणु में प्रवेश कराता है।
एकीकरण (Integration) – विषाणु डीएनए जीवाणु के डीएनए में मिल जाता है।
प्रतिलिपि निर्माण – जीवाणु के विभाजन के साथ-साथ प्रोफेज भी प्रतिलिपित होता है।
उत्प्रेरण (Induction) – प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रोफेज सक्रिय होकर लाइटिक चक्र में प्रवेश करता है।
3. लाइसोजेनिक चक्र का महत्व
यह चक्र विषाणुओं को दीर्घकाल तक जीवित रहने में सहायता करता है। यह जीवाणुओं में आनुवंशिक विविधता बढ़ाता है और कुछ रोगजनक गुणों के विकास में सहायक होता है।
सरल रेखाचित्र (पाठ्य रूप में)
विषाणु संलग्नन → डीएनए प्रवेश → डीएनए का एकीकरण
↓
प्रोफेज
↓
जीवाणु विभाजन
↓
उत्प्रेरण
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2. क) नालयुग्मी (साइफोनोगेमस) और सरचयुग्मी (जोइडोगेमस) पादपों पर एक लघु टिप्पणी लिखिए।
सरचयुग्मी (जोइडोगेमस) पादप
जोइडोगैमी में नर युग्मक गतिशील होते हैं और जल माध्यम से मादा युग्मक तक पहुँचते हैं। यह विधि शैवाल, ब्रायोफाइट और प्टेरिडोफाइट में पाई जाती है। उदाहरण—मार्चेन्टिया, फर्न। इन पौधों का निषेचन जल पर निर्भर होता है।
नालयुग्मी (साइफोनोगेमस) पादप
साइफोनोगैमी में नर युग्मक अचल होते हैं और परागनली द्वारा अंड कोशिका तक पहुँचते हैं। यह विधि जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म में पाई जाती है। उदाहरण—पाइनस, फूलदार पौधे। यह उन्नत प्रजनन विधि है।
ख) कवकमूल (माइकोराइजा) का वर्णन कीजिए। यह किस प्रकार परपोषी की सहायता करता है?
कवकमूल पौधों की जड़ों और कवकों के बीच सहजीवी संबंध को कहते हैं।
1. प्रकार
एक्टोमाइकोराइजा – कवक जड़ों के बाहर आवरण बनाता है।
एंडोमाइकोराइजा – कवक जड़ों की कोशिकाओं में प्रवेश करता है।
2. संरचना
कवक के हाइफे मिट्टी में फैलकर जल और खनिजों का अवशोषण करते हैं।
3. परपोषी को लाभ
फॉस्फोरस और जल का अवशोषण बढ़ता है। पौधों की वृद्धि तेज होती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। सूखा सहनशीलता में वृद्धि होती है।
निष्कर्ष
माइकोराइजा पौधों के पोषण, वृद्धि और पर्यावरण संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक सहजीवी तंत्र है।
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3. सायनोफाइटा के ठार ठिकाने, आकारिकी तथा परासंरचना को विस्तार से लिखिए।
सायनोफाइटा, जिन्हें सामान्यतः नीली-हरी शैवाल कहा जाता है, जैविक जगत का एक अत्यंत प्राचीन एवं महत्वपूर्ण समूह है। आधुनिक वर्गीकरण में इन्हें सायनोबैक्टीरिया कहा जाता है क्योंकि इनका कोशिकीय संगठन प्रोकैरियोटिक होता है। ये जीव पृथ्वी पर ऑक्सीजनयुक्त वातावरण के निर्माण में सहायक रहे हैं और आज भी पारिस्थितिक तंत्र में प्राथमिक उत्पादक तथा नाइट्रोजन स्थिरीकरणकर्ता के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सायनोफाइटा का ठार-ठिकाना अत्यंत व्यापक है, इनकी आकारिकी सरल किंतु विविध है तथा परासंरचना विशिष्ट एवं वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
(1) सायनोफाइटा के ठार-ठिकाने (Occurrence of Cyanophyta)
सायनोफाइटा का वितरण विश्वव्यापी है तथा ये लगभग सभी प्रकार के पर्यावरणीय परिस्थितियों में पाए जाते हैं। ये मीठे जल के स्रोतों जैसे तालाब, झील, नदियाँ, नहरें एवं जलाशयों में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। अनेक प्रजातियाँ जल की सतह पर तैरते हुए जल-पुष्प (Water bloom) का निर्माण करती हैं, जैसे Microcystis। समुद्री पर्यावरण में भी सायनोफाइटा की उपस्थिति महत्वपूर्ण है, जहाँ ये तटीय क्षेत्रों से लेकर खुले महासागर तक पाए जाते हैं और समुद्री प्राथमिक उत्पादकता में योगदान देते हैं।
स्थलीय ठार-ठिकानों में सायनोफाइटा नम मिट्टी, चट्टानों, दीवारों, वृक्षों की छाल तथा भवनों की सतह पर पपड़ी के रूप में उगते हैं। कुछ प्रजातियाँ अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रहती हैं, जैसे गर्म जलस्रोतों, मरुस्थलों, हिम क्षेत्रों एवं अत्यधिक लवणीय जल में। सायनोफाइटा का सहजीवी स्वरूप भी महत्वपूर्ण है। ये Azolla, Cycas, Anthoceros तथा लाइकेन में सहजीवी के रूप में पाए जाते हैं और वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर मेज़बान पौधों को लाभ पहुँचाते हैं। इस प्रकार, सायनोफाइटा की व्यापक उपस्थिति उनकी अनुकूलन क्षमता एवं जैविक सफलता को दर्शाती है।
(2) सायनोफाइटा की सामान्य आकारिकी (General Morphology)
सायनोफाइटा की आकारिकी अपेक्षाकृत सरल होती है तथा इनका पादप शरीर थैलसात्मक होता है। इनमें वास्तविक जड़, तना एवं पत्तियाँ नहीं होतीं। संरचनात्मक संगठन के आधार पर सायनोफाइटा को एककोशिकीय, उपनिवेशी तथा तंतुयुक्त रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है। एककोशिकीय सायनोफाइटा जैसे Chroococcus स्वतंत्र कोशिकाओं के रूप में पाए जाते हैं। उपनिवेशी रूप जैसे Gloeocapsa में अनेक कोशिकाएँ एक सामान्य जिलेटिनस आवरण में स्थित होती हैं।
तंतुयुक्त सायनोफाइटा जैसे Oscillatoria, Nostoc एवं Anabaena में कोशिकाएँ एक पंक्ति में जुड़ी होती हैं और धागेनुमा संरचना बनाती हैं। कुछ तंतुयुक्त रूपों में मिथ्या शाखन (False branching) पाया जाता है, जो कोशिकाओं के टूटने और पार्श्व वृद्धि के कारण होता है। इनका शरीर प्रायः नीले-हरे रंग का होता है, जो क्लोरोफिल-a एवं फाइकोबिलिन वर्णकों की उपस्थिति के कारण होता है।
(3) कोशिका की आकृति, आकार एवं विशेष कोशिकाएँ
सायनोफाइटा की कोशिकाएँ सूक्ष्म होती हैं और इनका आकार सामान्यतः 1 से 10 माइक्रोमीटर के बीच होता है। कोशिकाएँ गोल, अंडाकार, बेलनाकार या चपटी हो सकती हैं। कुछ प्रजातियों में विशेष प्रकार की कोशिकाएँ पाई जाती हैं, जो विशिष्ट कार्य करती हैं। हेटेरोसिस्ट ऐसी ही विशेष कोशिकाएँ हैं, जो Nostoc एवं Anabaena में पाई जाती हैं। ये मोटी भित्ति वाली, हल्के रंग की कोशिकाएँ होती हैं और इनमें नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है।
अकीनेट्स प्रतिकूल परिस्थितियों में बनने वाली मोटी भित्ति वाली विश्राम कोशिकाएँ हैं, जो पौधे को दीर्घकाल तक जीवित रहने में सहायता करती हैं। गैस रिक्तिकाएँ (Gas vacuoles) कुछ प्लवकीय प्रजातियों में पाई जाती हैं, जो कोशिका को जल में तैरने में सहायता प्रदान करती हैं। कोशिकाओं के चारों ओर म्यूसीलेजिनस आवरण भी पाया जाता है, जो सुरक्षा प्रदान करता है।
(4) सायनोफाइटा की परासंरचना (Ultrastructure of Cyanophyta)
सायनोफाइटा की परासंरचना इनके प्रोकैरियोटिक स्वभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। इनमें सच्चा केन्द्रक अनुपस्थित होता है तथा केन्द्रकीय झिल्ली नहीं पाई जाती। आनुवंशिक पदार्थ डीएनए के रूप में न्यूक्लॉयड क्षेत्र में स्थित होता है और हिस्टोन प्रोटीन का अभाव होता है। कोशिकाद्रव्य को क्रोमोप्लाज़्म एवं सेंट्रोप्लाज़्म में विभाजित किया जा सकता है। क्रोमोप्लाज़्म में प्रकाश संश्लेषण से संबंधित संरचनाएँ होती हैं, जबकि सेंट्रोप्लाज़्म में डीएनए, राइबोसोम एवं भंडारण पदार्थ पाए जाते हैं।
(5) कोशिका भित्ति, झिल्ली एवं प्रकाश संश्लेषी तंत्र
सायनोफाइटा की कोशिका भित्ति बहुस्तरीय होती है और ग्राम-ऋणात्मक जीवाणुओं के समान संरचना रखती है। इसके बाहर जिलेटिनस आवरण हो सकता है। प्लाज्मा झिल्ली के भीतर थायलाकोइड्स पाए जाते हैं, जो क्लोरोप्लास्ट में संगठित नहीं होते बल्कि कोशिकाद्रव्य में स्वतंत्र रूप से फैले रहते हैं। थायलाकोइड्स पर फाइकोबिलिसोम्स स्थित होते हैं, जिनमें फाइकोसाइनिन एवं फाइकोएरिथ्रिन वर्णक पाए जाते हैं। यही वर्णक नीले-हरे रंग के लिए उत्तरदायी होते हैं।
(6) भंडारण पदार्थ एवं राइबोसोम
सायनोफाइटा में भोजन का भंडारण सायनोफाइसीय स्टार्च के रूप में होता है, जो ग्लाइकोजन के समान होता है। पॉलीफॉस्फेट कण, लिपिड बूंदें एवं प्रोटीन कण भी पाए जाते हैं। इनमें 70S राइबोसोम होते हैं, जो प्रोटीन संश्लेषण में सहायक होते हैं। श्वसन, प्रकाश संश्लेषण एवं नाइट्रोजन स्थिरीकरण जैसी जटिल जैविक क्रियाएँ इसी सरल संरचना में संपन्न होती हैं।
निष्कर्ष
सायनोफाइटा एक प्राचीन, सरल किंतु अत्यंत सफल समूह है। इनका व्यापक ठार-ठिकाना, विविध आकारिकी तथा विशिष्ट परासंरचना इन्हें जैविक एवं पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। ये न केवल पृथ्वी पर जीवन के विकास में सहायक रहे हैं, बल्कि आज भी पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
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4. क) जिम्नास्पर्स (आवृतबीजियों) में परागण और निषेचन की क्रियाविधियों को समझाइए।
जिम्नास्पर्स में परागण का अर्थ नर शंकु से परागकणों का मादा शंकु में स्थित बीजांड तक पहुँचना है। इनमें परागण सामान्यतः वायु द्वारा होता है, जिसे वायुपरागण कहा जाता है। नर शंकु अत्यधिक मात्रा में हल्के एवं पंखयुक्त परागकण उत्पन्न करते हैं। Pinus में परागकणों पर वायुकोष (Air sacs) पाए जाते हैं, जो उन्हें वायु में तैरने में सहायता करते हैं।
मादा शंकु में बीजांड के माइक्रोपाइल से परागण बूँद स्रावित होती है। यह बूँद चिपचिपी होती है और वायु में उड़ते परागकणों को पकड़ लेती है। बाद में यह बूँद पुनः बीजांड के भीतर चली जाती है, जिससे परागकण पराग कक्ष में पहुँच जाते हैं। यह प्रक्रिया जिम्नास्पर्स की स्थलीय जीवन के प्रति अनुकूलन क्षमता को दर्शाती है।
जिम्नास्पर्स में निषेचन की क्रियाविधि
परागण के पश्चात परागकण अंकुरित होकर पराग नली बनाता है। जनरेटिव कोशिका विभाजित होकर दो नर युग्मक बनाती है। Cycas एवं Ginkgo जैसे आदिम जिम्नास्पर्स में नर युग्मक बहु-कशाभीय एवं गतिशील होते हैं, जबकि Pinus जैसे उन्नत जिम्नास्पर्स में नर युग्मक अचल होते हैं और पराग नली द्वारा अंड कोशिका तक पहुँचते हैं।
निषेचन में एक नर युग्मक अंड कोशिका से मिलकर युग्मज बनाता है। दूसरा नर युग्मक नष्ट हो जाता है। जिम्नास्पर्स में द्विगुणन निषेचन नहीं होता। निषेचन के बाद युग्मज भ्रूण में विकसित होता है, जबकि मादा गैमीटोफाइट पोषक ऊतक के रूप में कार्य करता है। अंततः बीज का निर्माण होता है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है।
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ख) विषमबीजाणुता को परिभाषित कीजिए। इसके जैविक महत्व को व्याख्या कीजिए।
विषमबीजाणुता वह अवस्था है जिसमें पौधा दो प्रकार के बीजाणु उत्पन्न करता है—सूक्ष्मबीजाणु (Microspore) एवं स्थूलबीजाणु (Megaspore)। सूक्ष्मबीजाणु से नर गैमीटोफाइट तथा स्थूलबीजाणु से मादा गैमीटोफाइट का विकास होता है। यह अवस्था सभी बीजीय पौधों तथा कुछ टेरिडोफाइट्स में पाई जाती है।
विषमबीजाणुता का जैविक महत्व
विषमबीजाणुता का सबसे महत्वपूर्ण जैविक महत्व बीज-आदत के विकास से संबंधित है। इसमें मादा गैमीटोफाइट बीजांड के भीतर सुरक्षित रहता है, जिससे भ्रूण को पोषण एवं संरक्षण मिलता है। इससे बाह्य जल पर निर्भरता कम हो जाती है और स्थलीय जीवन में सफलता बढ़ती है। विषमबीजाणुता के कारण नर एवं मादा गैमीटोफाइट में कार्यात्मक विभाजन होता है, जिससे प्रजनन दक्षता बढ़ती है। यह प्रक्रिया पौधों के विकास में एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी चरण मानी जाती है।
निष्कर्ष
जिम्नास्पर्स में परागण एवं निषेचन की क्रियाविधियाँ स्थलीय जीवन के प्रति उच्च अनुकूलन को दर्शाती हैं। विषमबीजाणुता ने बीज-आदत के विकास को संभव बनाया, जिससे पौधों की उत्तरजीविता एवं प्रसार क्षमता में वृद्धि हुई। यही कारण है कि जिम्नास्पर्स वनस्पति जगत में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
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5. क) पर्पटमय या पणिल लाइकेनों की संरचना और शरीर को संक्षेप में वर्णन कीजिए।
लाइकेन एक विशिष्ट सहजीवी (Symbiotic) जीव हैं, जिनका निर्माण एक कवक (Fungus) और एक शैवाल या सायनोबैक्टीरिया (Alga/Cyanobacteria) के परस्पर सहयोग से होता है। इस सहजीविता में कवक जल, खनिज तथा संरक्षण प्रदान करता है जबकि शैवाल भोजन का निर्माण करता है। बाह्य आकृति और संरचना के आधार पर लाइकेनों को पर्पटमय, पर्णिल तथा झाड़ीदार (Fruticose) में वर्गीकृत किया जाता है। यहाँ पर्पटमय और पर्णिल लाइकेनों की संरचना का वर्णन किया जा रहा है।
लाइकेन का सामान्य थैलस (Body Structure)
लाइकेन का शरीर थैलस कहलाता है, जिसमें वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ नहीं होतीं। थैलस में कवकीय हाइफाएँ और शैवाल कोशिकाएँ आपस में गुँथी रहती हैं। थैलस की संरचना लाइकेन के प्रकार के अनुसार सरल या जटिल हो सकती है।
पर्पटमय (Crustose) लाइकेन की संरचना
पर्पटमय लाइकेन सबसे सरल संरचना वाले लाइकेन होते हैं और ये चट्टानों, दीवारों, वृक्षों की छाल या मिट्टी पर पतली परत के रूप में चिपके रहते हैं।
•
इनका थैलस अत्यंत पतला, चपटा और सतह से दृढ़ता से जुड़ा होता है
• इन्हें सतह से अलग करने पर थैलस नष्ट हो जाता है
• इनका बाह्य रूप पपड़ी या परत जैसा होता है
• रंग सफेद, धूसर, पीला, हरा या काला हो सकता है
आंतरिक संरचना
• ऊपरी कॉर्टेक्स अनुपस्थित या अल्प विकसित होता है
• शैवाल परत कॉर्टेक्स के ठीक नीचे होती है
• मेडुला ढीली कवकीय हाइफाओं से बनी होती है
• निचला कॉर्टेक्स और राइज़िन अनुपस्थित होते हैं
• कवकीय हाइफाएँ सीधे सब्सट्रेट में प्रवेश कर चिपकाव प्रदान करती हैं
पर्णिल (Foliose) लाइकेन की संरचना
पर्णिल लाइकेन अपेक्षाकृत अधिक विकसित होते हैं और इनका थैलस पत्ती के समान चपटा तथा लोबयुक्त होता है।
•
थैलस चौड़ा, चपटा और द्विपार्श्वीय (Dorsiventral) होता है
• ये सब्सट्रेट से आंशिक रूप से जुड़े होते हैं
• इन्हें बिना क्षति के सतह से हटाया जा सकता है
• निचली सतह पर राइज़िन पाए जाते हैं
आंतरिक संरचना
• ऊपरी कॉर्टेक्स सघन कवकीय हाइफाओं से बना होता है
• शैवाल परत प्रकाश संश्लेषण करती है
• मेडुला मोटी और ढीली संरचना वाली होती है
• निचला कॉर्टेक्स उपस्थित होता है
• राइज़िन द्वारा सब्सट्रेट से जुड़ाव होता है
पर्पटमय एवं पर्णिल लाइकेनों में अंतर
पर्पटमय लाइकेन सरल, पूर्णतः चिपके हुए और कम विभेदित होते हैं, जबकि पर्णिल लाइकेन अधिक विकसित, स्पष्ट स्तरों वाले और आंशिक रूप से जुड़े होते हैं।
निष्कर्ष
पर्पटमय और पर्णिल लाइकेन संरचनात्मक विविधता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता रखते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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ख) ब्रायोफाइटों को वनस्पति का अग्रणी क्यों माना जाता है? वे मिट्टी के कटाव की रोकथाम तथा पोषकों के पुनः चक्रण में किस प्रकार सहायक हैं?
ब्रायोफाइट पौधों का एक आदिम समूह है जिसमें मॉस, लीवरवर्ट और हॉर्नवर्ट शामिल हैं। ये अवस्कुलर पौधे हैं और इन्हें वनस्पति का अग्रणी (Pioneer of Vegetation) माना जाता है।
ब्रायोफाइटों को अग्रणी मानने के कारण
•
ये नग्न चट्टानों और बंजर भूमि पर उग सकते हैं
• अल्प पोषक तत्वों में जीवित रह सकते हैं
• अत्यधिक ताप और शुष्कता सहन कर सकते हैं
• पारिस्थितिक उत्तराधिकार की शुरुआत करते हैं
मिट्टी निर्माण में भूमिका
•
चट्टानों पर उगकर जैविक अपक्षय करते हैं
• धूल और कार्बनिक पदार्थ को फँसाते हैं
• मृत ब्रायोफाइट अपघटन से ह्यूमस बनाते हैं
मिट्टी कटाव रोकथाम
•
ब्रायोफाइटों की घनी चटाइयाँ मिट्टी को ढँकती हैं
• वर्षा की सीधी मार से मिट्टी की रक्षा होती है
• राइज़ॉयड्स मिट्टी कणों को बाँधते हैं
• जल प्रवाह की गति कम करते हैं
पोषक तत्वों का पुनः चक्रण
•
वर्षा जल से खनिज अवशोषित करते हैं
• अपघटन से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस मुक्त होता है
• कुछ ब्रायोफाइट नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं
• पोषक तत्वों को अस्थायी रूप से संचित रखते हैं
निष्कर्ष
ब्रायोफाइट पारिस्थितिकी तंत्र की नींव रखते हैं। इनके बिना उच्च पादपों का विकास संभव नहीं होता।
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6. क) लाइकोफाइटा की विशेषताएँ बताइए।
लाइकोफाइटा संवहनी क्रिप्टोगैम्स का एक प्राचीन समूह है, जिसमें Lycopodium, Selaginella और Isoetes शामिल हैं।
प्रमुख विशेषताएँ
•
वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ उपस्थित
• पत्तियाँ माइक्रोफिल प्रकार की
• जाइलम और फ्लोएम विकसित
• बीजरहित संवहनी पौधे
• स्पोर द्वारा प्रजनन
• स्पोरोफिल पर स्पोरेंजिया
• स्ट्रोबिलस का निर्माण
• समबीजी या विषमबीजी
• जल पर निर्भर निषेचन
• स्पोरोफाइट प्रमुख अवस्था
विकासात्मक महत्व
लाइकोफाइटा ब्रायोफाइट और उच्च संवहनी पौधों के बीच कड़ी हैं और पादप उत्क्रांति में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
ख) पाइनस में परागण और निषेचन कैसे होता है? व्याख्या कीजिए।
Pinus एक नग्नबीजी पौधा है जिसमें पुष्प और फल नहीं होते, परंतु बीज बनते हैं।
परागण की प्रक्रिया
•
नर शंकु परागकण उत्पन्न करते हैं
• परागकणों में वायु थैलियाँ होती हैं
• पवन द्वारा परागण होता है
• परागकण माइक्रोपाइल तक पहुँचते हैं
• परागण बूंद द्वारा पराग फँसता है
निषेचन की प्रक्रिया
•
परागकण अंकुरित होकर परागनलिका बनाते हैं
• नर युग्मक निष्क्रिय होते हैं
• परागनलिका द्वारा अंडाणु तक पहुँचते हैं
• एक नर युग्मक अंडाणु से संयोग करता है
• द्वितीय नर युग्मक नष्ट हो जाता है
• युग्मन से द्विगुणित भ्रूण बनता है
• एण्डोस्पर्म हैप्लॉइड होता है
निष्कर्ष
Pinus में परागण और निषेचन जल पर निर्भर नहीं होते, जो नग्नबीजी पौधों की प्रमुख विकासात्मक विशेषता है।
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7. क) टेरिडोफाइट्स या जिम्नोस्पमर्स के आर्थिक महत्व का वर्णन कीजिए।
टेरिडोफाइट्स वे संवहनी पौधे हैं जिनमें जड़, तना और पत्तियाँ तो स्पष्ट रूप से विकसित होती हैं, परंतु इनमें पुष्प, बीज एवं फल नहीं बनते। इनमें फर्न, हॉर्सटेल और क्लब मॉस जैसे पौधे शामिल हैं। विकास की दृष्टि से ये पौधे ब्रायोफाइट्स और जिम्नोस्पर्म्स के बीच की कड़ी माने जाते हैं। यद्यपि ये पौधे कृषि-उत्पादन की दृष्टि से सीमित महत्व रखते हैं, फिर भी आर्थिक, औषधीय, पर्यावरणीय और शैक्षणिक दृष्टि से इनका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
2. सजावटी (Ornamental) महत्व
टेरिडोफाइट्स का सर्वाधिक आर्थिक महत्व उनके सजावटी उपयोग में देखा जाता है। फर्न की पत्तियाँ (fronds) अत्यंत आकर्षक, कोमल और सजावटी होती हैं। Adiantum, Nephrolepis, Pteris, Asplenium
और Polypodium जैसी प्रजातियाँ घरों, उद्यानों, कार्यालयों तथा होटल सजावट में प्रयोग की जाती हैं। ये पौधे छायादार और आर्द्र स्थानों में अच्छी वृद्धि करते हैं, इसलिए इनडोर प्लांट के रूप में अत्यंत लोकप्रिय हैं। पुष्प सज्जा में फर्न की पत्तियों का उपयोग पुष्पगुच्छ (bouquets) और पुष्पमालाओं में किया जाता है।
3. औषधीय महत्व
कई टेरिडोफाइट्स औषधीय गुणों से युक्त होते हैं। Dryopteris की कुछ प्रजातियाँ कृमिनाशक (Anthelmintic) के रूप में उपयोग की जाती हैं। Adiantum का प्रयोग खाँसी, ज्वर, ब्रोंकाइटिस और श्वसन रोगों में किया जाता है। Equisetum में सिलिका प्रचुर मात्रा में पाई जाती है, जो हड्डियों और संयोजी ऊतकों को मजबूत करने में सहायक होती है। आयुर्वेद और लोक चिकित्सा में टेरिडोफाइट्स का उपयोग मूत्र रोग, त्वचा रोग और घाव भरने के लिए किया जाता है।
4. कृषि में महत्व
Azolla नामक एक जलीय फर्न का कृषि में विशेष महत्व है। इसमें Anabaena azollae नामक नील-हरित शैवाल सहजीवी रूप से रहता है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करता है। धान के खेतों में Azolla का प्रयोग हरित खाद (Green manure) के रूप में किया जाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है।
5. पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिक महत्व
टेरिडोफाइट्स पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं। इनकी सघन वृद्धि मिट्टी के कटाव को रोकती है। ये पौधे चट्टानों को तोड़कर मिट्टी निर्माण में योगदान देते हैं। वन क्षेत्रों में ये नमी बनाए रखते हैं और सूक्ष्म जीवों के लिए उपयुक्त आवास प्रदान करते हैं।
6. औद्योगिक महत्व
Lycopodium के बीजाणु अत्यंत ज्वलनशील होते हैं और पहले फोटोग्राफी में फ्लैश पाउडर के रूप में उपयोग किए जाते थे। औषधि उद्योग में इन बीजाणुओं का उपयोग गोलियों पर लेप चढ़ाने में किया जाता है। Equisetum की सिलिका-युक्त तनों का प्रयोग लकड़ी और धातु को चमकाने के लिए किया जाता है।
7. खाद्य एवं पशु-आहार महत्व
कुछ टेरिडोफाइट्स के कोमल पत्तों का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है, जैसे Diplazium। Azolla का उपयोग मछलियों, मुर्गियों और पशुओं के आहार के रूप में किया जाता है, क्योंकि इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है।
8. शैक्षणिक एवं विकासात्मक महत्व
टेरिडोफाइट्स का प्रयोग वनस्पति विज्ञान की शिक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इनमें पीढ़ियों का प्रत्यावर्तन (Alternation of generations) स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। जीवाश्म टेरिडोफाइट्स जैसे Lepidodendron और Calamites कोयले के निर्माण और पादप विकास को समझने में सहायक हैं।
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ख) साइकस और पाइनस के नर जननांगों की तुलना कीजिए।
साइकस (Cycas) और पाइनस (Pinus) दोनों जिम्नोस्पर्म्स के अंतर्गत आते हैं, परंतु इनके नर जननांगों की संरचना में स्पष्ट अंतर पाया जाता है। यह अंतर इनके विकासात्मक स्तर और अनुकूलन को दर्शाता है।
2. साइकस में नर जननांग
साइकस में नर जननांग एक विशाल नर शंकु (Male cone या Microstrobilus) के रूप में पाया जाता है। यह तने के शीर्ष पर स्थित होता है। शंकु के केंद्रीय अक्ष पर सर्पिल क्रम में अनेक माइक्रोस्पोरोफिल लगे होते हैं। प्रत्येक माइक्रोस्पोरोफिल की निचली सतह पर सैकड़ों माइक्रोस्पोरैंजिया पाए जाते हैं। इनमें माइक्रोस्पोर बनते हैं जो आगे चलकर परागकण का निर्माण करते हैं। साइकस के परागकण बड़े होते हैं और इनमें बहुकोशिकीय, गतिशील (चलायमान) शुक्राणु बनते हैं, जो एक आदिम लक्षण है।
3. पाइनस में नर जननांग
पाइनस में नर शंकु छोटे होते हैं और शाखाओं पर समूह में पाए जाते हैं। प्रत्येक नर शंकु में एक केंद्रीय अक्ष होता है, जिस पर सर्पिल क्रम में माइक्रोस्पोरोफिल लगे रहते हैं। प्रत्येक माइक्रोस्पोरोफिल की निचली सतह पर केवल दो माइक्रोस्पोरैंजिया होते हैं। पाइनस के परागकण छोटे, पंखयुक्त (winged) होते हैं, जो वायु द्वारा परागण में सहायक होते हैं। इनमें अचल नर युग्मक बनते हैं।
4. संरचनात्मक तुलना
साइकस का नर शंकु आकार में बड़ा और अकेला होता है, जबकि पाइनस के नर शंकु छोटे और अनेक होते हैं। साइकस में माइक्रोस्पोरैंजिया की संख्या अधिक होती है, जबकि पाइनस में सीमित होती है। साइकस में गतिशील शुक्राणु पाए जाते हैं, जबकि पाइनस में नलिका-परागण (siphonogamy) होता है।
5. विकासात्मक महत्व
साइकस के नर जननांगों में टेरिडोफाइट्स जैसे आदिम लक्षण पाए जाते हैं, जबकि पाइनस के नर जननांग अधिक विकसित अवस्था को दर्शाते हैं। यह तुलना जिम्नोस्पर्म्स के विकास क्रम को समझने में सहायक है।
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8. क ) चित्रों की सहायता से पोलीसाइफोनिया लैंगिक जनन का वर्णन कीजिए।
Polysiphonia लाल शैवाल (Rhodophyceae) का एक प्रमुख वंश है, जिसमें लैंगिक जनन अत्यंत जटिल और उन्नत प्रकार का होता है। इसमें त्रिफ़ैसिक जीवन चक्र पाया जाता है, जो इसे अन्य शैवालों से विशिष्ट बनाता है।
2. पौधे का संगठन
पोलीसाइफोनिया का थैलस बहुकोशिकीय, शाखित और सूत्राकार होता है। इसमें गांठ (node) और अंतरगांठ (internode) स्पष्ट होती हैं। अधिकांश प्रजातियाँ द्विगृही (dioecious) होती हैं।
3. नर जननांग – स्पर्मेटैन्जिया
नर पौधों पर विशेष शाखाओं पर स्पर्मेटैन्जिया बनते हैं। प्रत्येक स्पर्मेटैन्जियम एक अचल नर युग्मक (spermatium) बनाता है। ये स्पर्मेटिया जल में मुक्त होकर प्रवाहित होते हैं।
4. मादा जननांग – कार्पोगोनियम
मादा पौधों पर कार्पोगोनियम पाया जाता है, जो फ्लास्क के आकार का होता है। इसके ऊपरी भाग को ट्राइकोजाइन कहा जाता है, जो स्पर्मेटियम को ग्रहण करता है। निचले फूले हुए भाग में अंड कोशिका होती है।
5. निषेचन प्रक्रिया
जब स्पर्मेटियम ट्राइकोजाइन से चिपकता है, तब उसका नाभिक ट्राइकोजाइन के माध्यम से अंड कोशिका तक पहुँचता है और निषेचन होता है। इसके परिणामस्वरूप द्विगुणित युग्मज (zygote) बनता है।
6. निषेचन के बाद परिवर्तन
युग्मज सीधे नया पौधा नहीं बनाता, बल्कि मादा पौधे पर ही कार्पोस्पोरोफाइट नामक संरचना का निर्माण करता है। कार्पोस्पोरोफाइट द्विगुणित कार्पोस्पोर बनाता है।
7. टेट्रास्पोरोफाइट का निर्माण
कार्पोस्पोर अंकुरित होकर स्वतंत्र द्विगुणित टेट्रास्पोरोफाइट बनाते हैं। इसमें टेट्रास्पोरैंजिया बनते हैं, जहाँ अर्धसूत्री विभाजन से हैप्लॉइड टेट्रास्पोर बनते हैं।
8. जीवन चक्र की पूर्णता
टेट्रास्पोर अंकुरित होकर नर और मादा गैमीटोफाइट बनाते हैं, जिससे जीवन चक्र पूर्ण होता है।
(चित्र विवरण: नर पौधे पर स्पर्मेटैन्जिया, मादा पौधे पर कार्पोगोनियम व ट्राइकोजाइन, निषेचन, कार्पोस्पोरोफाइट, टेट्रास्पोरोफाइट और टेट्रास्पोर दर्शाने वाला लेबलयुक्त चित्र।)
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ख) सिद्ध कीजिए कि जिम्नोस्पर्म के बीज में दोनों पीढ़ियों का उत्कृष्ट संयोजन होता है।
1. भूमिका
जिम्नोस्पर्म के बीज पादप जगत की एक महत्वपूर्ण विकासात्मक उपलब्धि हैं। इनमें दो भिन्न पीढ़ियों के ऊतक एक ही संरचना में पाए जाते हैं, जो इन्हें विशेष बनाते हैं।
2. बीज की संरचना
जिम्नोस्पर्म का बीज मुख्यतः तीन भागों से मिलकर बना होता है – बीजावरण, एंडोस्पर्म और भ्रूण।
3. जनक स्पोरोफाइट पीढ़ी
बीजावरण अंडप (ovule) के आवरणों से बनता है, जो मातृ स्पोरोफाइट का भाग होता है। यह द्विगुणित ऊतक होता है और भ्रूण की सुरक्षा करता है।
4. मादा गैमीटोफाइट पीढ़ी
जिम्नोस्पर्म में एंडोस्पर्म निषेचन से पहले बनता है और यह हैप्लॉइड होता है। यह मादा गैमीटोफाइट का प्रतिनिधित्व करता है और भ्रूण को पोषण प्रदान करता है।
5. नई स्पोरोफाइट पीढ़ी
भ्रूण निषेचन के बाद बने युग्मज से विकसित होता है और यह नई द्विगुणित स्पोरोफाइट पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है।
6. पीढ़ियों का सह-अस्तित्व
इस प्रकार एक ही बीज में मातृ स्पोरोफाइट, मादा गैमीटोफाइट और नई स्पोरोफाइट – तीनों संरचनाएँ पाई जाती हैं, जो दो पीढ़ियों के उत्कृष्ट संयोजन को दर्शाती हैं।
7. विकासात्मक एवं जैविक महत्व
यह संयोजन भ्रूण को सुरक्षा, पोषण और अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरण का अवसर प्रदान करता है, जिससे जिम्नोस्पर्म्स का पारिस्थितिक सफलता सुनिश्चित होती है।
8. निष्कर्ष
अतः यह सिद्ध होता है कि जिम्नोस्पर्म का बीज दो पीढ़ियों के उत्कृष्ट और सफल संयोजन का अद्वितीय उदाहरण है।
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9. क) जीवाणुओं में आनुवंशिक पुनर्योग की क्रियाविधियों का उपयुक्त चित्रों सहित वर्णन कीजिए।
आनुवंशिक पुनर्योग वह प्रक्रिया है जिसमें जीवाणुओं के बीच आनुवंशिक पदार्थ (DNA) का आदान-प्रदान होता है, जिससे नई आनुवंशिक संरचना बनती है। जीवाणुओं में वास्तविक लैंगिक जनन नहीं होता, फिर भी वे विभिन्न पैरासेक्शुअल विधियों द्वारा आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करते हैं। ये क्रियाविधियाँ जीवाणुओं को अनुकूलन, उत्क्रांति तथा औषधि प्रतिरोध प्रदान करने में सहायक होती हैं।
1. रूपांतरण (Transformation)
रूपांतरण वह प्रक्रिया है जिसमें जीवाणु अपने बाह्य वातावरण में उपस्थित मृत जीवाणुओं से निकले हुए नग्न DNA को ग्रहण कर लेते हैं। यह खोज सर्वप्रथम फ्रेडरिक ग्रिफ़िथ ने Streptococcus pneumoniae में की थी। कुछ जीवाणु स्वाभाविक रूप से सक्षम (competent) होते हैं और उनकी कोशिका भित्ति पर विशेष प्रोटीन रिसेप्टर होते हैं जो DNA को बाँध लेते हैं। DNA का यह अंश कोशिका के अंदर प्रवेश कर जाता है और यदि यह होस्ट DNA के समान (homologous) हो तो पुनर्योग के द्वारा जीनोम में सम्मिलित हो जाता है। इससे जीवाणु में नए गुण जैसे रोगजनकता या औषधि प्रतिरोध विकसित हो सकते हैं।
चित्र संकेत: मृत जीवाणु → DNA बाहर निकलता है → जीवित जीवाणु DNA को ग्रहण करता है → क्रोमोसोम से पुनर्योग।
2. ट्रांसडक्शन (Transduction)
ट्रांसडक्शन वह प्रक्रिया है जिसमें जीवाणु वायरस (बैक्टीरियोफेज) की सहायता से एक जीवाणु से दूसरे जीवाणु में DNA का स्थानांतरण होता है। इसके दो प्रकार होते हैं—सामान्य ट्रांसडक्शन और विशिष्ट ट्रांसडक्शन। सामान्य ट्रांसडक्शन में फेज के लाइटिक चक्र के दौरान गलती से जीवाणु DNA का कोई भी भाग फेज कण में पैक हो सकता है। विशिष्ट ट्रांसडक्शन में केवल वही जीन स्थानांतरित होते हैं जो प्रोफेज के पास स्थित होते हैं। यह प्रक्रिया आनुवंशिक विविधता का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
चित्र संकेत: फेज द्वारा जीवाणु संक्रमण → जीवाणु DNA फेज में पैक → दूसरा जीवाणु संक्रमित → DNA पुनर्योग।
3. संयुग्मन (Conjugation)
संयुग्मन जीवाणुओं में आनुवंशिक पुनर्योग की सबसे प्रभावी विधि है। इसमें दो जीवाणु कोशिकाएँ प्रत्यक्ष संपर्क द्वारा DNA का आदान-प्रदान करती हैं। यह प्रक्रिया F-प्लाज्मिड पर निर्भर करती है। F⁺ कोशिका सेक्स पिलस बनाकर F⁻ कोशिका से जुड़ती है और DNA का स्थानांतरण होता है। Hfr जीवाणुओं में F-प्लाज्मिड क्रोमोसोम से जुड़ा होता है, जिससे क्रोमोसोमल जीन भी स्थानांतरित हो सकते हैं।
चित्र संकेत: F⁺ जीवाणु → सेक्स पिलस → F⁻ जीवाणु → DNA स्थानांतरण।
महत्त्व
इन सभी प्रक्रियाओं से जीवाणुओं में आनुवंशिक विविधता बढ़ती है, उत्क्रांति संभव होती है तथा एंटीबायोटिक प्रतिरोध जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
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ख) उपयुक्त चित्र की सहायता से, फ्यूनेरिया में लैंगिक जनन की व्याख्या कीजिए।
Funaria एक मॉस है जो ब्रायोफाइटा वर्ग का प्रतिनिधि है। इसमें पीढ़ियों का स्पष्ट विकल्प (alternation of generations) पाया जाता है और इसका प्रमुख चरण गैमीटोफाइट होता है। फ्यूनेरिया में लैंगिक जनन ओओगैमस प्रकार का होता है।
1. लैंगिक अंगों की संरचना
नर जनन अंग को एन्थेरिडियम तथा मादा जनन अंग को आर्कीगोनियम कहते हैं। एन्थेरिडियम बहुकोशिकीय, क्लब-आकार का होता है जिसमें अनेक द्विकशाभ (biflagellate) एन्थेरोज़ॉयड बनते हैं। आर्कीगोनियम फ्लास्क-आकार का होता है जिसमें वेंटर भाग में एक अंडाणु उपस्थित होता है।
2. निषेचन की प्रक्रिया
वर्षा ऋतु में जल की उपस्थिति में एन्थेरोज़ॉयड एन्थेरिडियम से निकलते हैं और रासायनिक आकर्षण के कारण आर्कीगोनियम की ओर जाते हैं। एक एन्थेरोज़ॉयड अंडाणु से मिलकर द्विगुणित युग्मनज बनाता है।
चित्र संकेत: एन्थेरिडियम → एन्थेरोज़ॉयड → आर्कीगोनियम → निषेचन।
3. स्पोरोफाइट का विकास
युग्मनज से स्पोरोफाइट विकसित होता है, जिसमें फुट, सीटा और कैप्सूल होते हैं। कैप्सूल में अर्धसूत्री विभाजन द्वारा बीजाणु बनते हैं।
महत्त्व
फ्यूनेरिया में लैंगिक जनन आनुवंशिक विविधता, अनुकूलन और जीवन चक्र की निरंतरता बनाए रखता है।
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10. निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए
(i) कवकीय एन्टीबायोटिक्स और औषधियाँ
कवक मानव
के लिए अत्यंत उपयोगी जैविक यौगिकों का स्रोत हैं। अनेक महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक्स
और औषधियाँ कवकों से प्राप्त होती हैं।
1. पेनिसिलिन
यह Penicillium notatum से प्राप्त होती है और
जीवाणुओं की कोशिका भित्ति निर्माण प्रक्रिया को रोकती है।
2. सेफालोस्पोरिन
Cephalosporium से प्राप्त यह
एंटीबायोटिक व्यापक स्पेक्ट्रम वाली होती है।
3. ग्रिसियोफुल्विन
यह
एक एंटिफंगल औषधि है जो त्वचा रोगों में उपयोगी है।
4. साइक्लोस्पोरिन
यह
अंग प्रत्यारोपण में प्रयुक्त एक इम्यूनोसप्रेसिव औषधि है।
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10. (ii) HIV विषाणु
HIV एक
रेट्रोवायरस है जो मानव की प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करता है और AIDS का कारण
बनता है।
संरचना
इसमें
RNA, रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेस एंजाइम और प्रोटीन कवच होता है।
संक्रमण
यह
असुरक्षित यौन संपर्क, संक्रमित रक्त, सुई तथा माँ से शिशु में फैलता है।
प्रभाव
CD4 कोशिकाओं की
संख्या कम होने से शरीर संक्रमणों के प्रति कमजोर हो जाता है।
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10. (iii) जन्तुओं और मनुष्यों में कवकीय रोग
कवक
द्वारा उत्पन्न रोगों को माइकोसिस कहा जाता है।
मानव में
दाद, एथलीट फुट, कैंडिडायसिस
जैसे रोग होते हैं।
जन्तुओं में
रिंगवर्म, एस्परजिलोसिस
आदि रोग पाए जाते हैं।
महत्त्व
ये
रोग त्वचा, श्वसन तथा आंतरिक अंगों को प्रभावित करते हैं।
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10. (iv) बेसीडियोमाइसिटम में क्लैम्प सम्बन्धनों का
बनना
क्लैम्प
सम्बन्धन बेसीडियोमाइसिट्स में पाए जाने वाले विशेष हाइफल संरचनाएँ हैं।
निर्माण प्रक्रिया
हाइफा
के विभाजन के समय एक हुक-आकार की संरचना बनती है जो दो नाभिकों का समान वितरण
सुनिश्चित करती है।
चित्र संकेत: द्विनाभिकीय
हाइफा → क्लैम्प बनना → नाभिक विभाजन।
महत्त्व
यह
द्विकैरियोटिक अवस्था को बनाए रखने में सहायक होती है।
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